नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट होगा उत्तराखंड हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट के शिफ्ट जैसे बुनियादी ढांचे से जुड़े फैसले प्रशासनिक प्रकृति के होते हैं और इन्हें राज्य सरकार और हाईकोर्ट को आपसी परामर्श से तय करना चाहिए।

सौजन्य से:- AajTak
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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने का रास्ता साफ कर दिया है. शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने से पहले वकीलों और मुकदमेबाजों के बीच जनमत संग्रह कराने की बात कही गई थी.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. एस. मोहना की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट अपने न्यायिक अधिकार क्षेत्र (ज्यूडिशियल साइड) का इस्तेमाल करते हुए इस तरह के प्रशासनिक आदेश नहीं दे सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के शिफ्ट जैसे बुनियादी ढांचे से जुड़े फैसले प्रशासनिक प्रकृति के होते हैं और इन्हें राज्य सरकार तथा हाईकोर्ट को आपसी परामर्श से तय करना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उत्तराखंड सरकार पहले ही हल्द्वानी में हाईकोर्ट के नए परिसर के लिए करीब 26 हेक्टेयर भूमि चिह्नित कर चुकी है. इसलिए राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह छह हफ्ते के भीतर सभी आवश्यक मंजूरियां पूरी कर चिह्नित भूमि हाईकोर्ट को सौंप दे, ताकि नए परिसर के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ सके.
दरअसल, वर्ष 2020 में उत्तराखंड कैबिनेट ने हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने का प्रस्ताव मंजूर किया था. हालांकि बाद में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाते हुए कहा था कि पहले वकीलों और मुकदमेबाजों की राय ली जानी चाहिए और जनमत संग्रह के आधार पर फैसला किया जाए कि हाईकोर्ट को स्थानांतरित किया जाए या नहीं.
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राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी थी. सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि हल्द्वानी में चिह्नित भूमि के एक बड़े हिस्से में पेड़ होने के कारण पहले पर्यावरण संबंधी चिंताएं जताई गई थीं, जिसके चलते हाईकोर्ट ने उस जमीन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.
अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद हल्द्वानी में उत्तराखंड हाईकोर्ट के नए परिसर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है. अदालत ने यह भी दोहराया कि न्यायिक संस्थानों के बुनियादी ढांचे से जुड़े मामलों में न्यायिक आदेशों के बजाय प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए और राज्य सरकार व हाईकोर्ट को मिलकर ऐसे मुद्दों का समाधान करना चाहिए.
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