सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट शिफ्टिंग मामले में दिया बड़ा फैसला, जनमत संग्रह पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने के मामले में एक बड़ा और निर्णायक फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के 4 मई 2024 के आदेश को पूरी तरह से रद्द (सेट असाइड) कर दिया है, जिसमें हाईकोर्ट शिफ्टिंग करने के लिए एक जनमत संग्रह (रेफरेंडम) कराने की बात कही गई थी.

सौजन्य से:- ETV Bharat
उत्तराखंड हाईकोर्ट शिफ्टिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, शीर्ष अदालत ने सुनाया बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने के मामले पर हुई सुनवाई, जानिए क्या हुआ?
By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : July 15, 2026 at 8:16 PM IST
नैनीताल: सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से शिफ्टिंग करने के मामले में एक बड़ा और निर्णायक फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के 4 मई 2024 के आदेश को पूरी तरह से रद्द (सेट असाइड) कर दिया है, जिसमें हाईकोर्ट शिफ्टिंग करने के लिए एक जनमत संग्रह (रेफरेंडम) कराने की बात कही गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक स्तर पर इस तरह के जनमत संग्रह के आदेश पारित करना हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है.
हल्द्वानी में हाईकोर्ट शिफ्टिंग की मिली मंजूरी: बता दें कि नैनीताल से हाईकोर्ट को हल्द्वानी के गौलापार में शिफ्टिंग की प्रक्रिया चल रही थी. जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिल गई है. मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की खंडपीठ ने हाईकोर्ट के रुख पर कड़ी असहमति जताई. उन्होंने बेहद सख्त लहजे में कहा कि हाईकोर्ट का न्यायिक पक्ष पर इस तरह के आदेश पारित करने से कोई सरोकार या लेना-देना नहीं होना चाहिए. अदालत का काम जनमत संग्रह कराना नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले को खारिज करते हुए कहा कि बुनियादी ढांचे और स्थान परिवर्तन से जुड़े मुद्दों को सुलझाने का एक तय प्रशासनिक तरीका होता है. यह आदेश हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ऋतु बाहरी व न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की खंडपीठ ने जारी किया था. हाईकोर्ट ने तब हल्द्वानी के गौलापार में चिह्नित की गई भूमि को हाईकोर्ट के लिए अनुपयुक्त ठहराया था.
सुप्रीम कोर्ट ने इस जटिल मामले का व्यावहारिक समाधान निकालते हुए निर्देश दिया है कि अब इस पूरे विवाद को प्रशासनिक स्तर पर सुलझाया जाए. न्यायालय ने कहा कि उत्तराखंड हाईकोर्ट को अपने प्रशासनिक पक्ष पर राज्य सरकार के साथ आपसी समन्वय और परामर्श करना चाहिए. हाईकोर्ट एवं राज्य सरकार मिलकर बैठें और अदालत परिसर से जुड़े सभी ढांचागत (इन्फ्रास्ट्रक्चरल) मुद्दों व समस्याओं का एक ठोस समाधान तैयार करें.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया कि उत्तराखंड सरकार ने पहले ही हाईकोर्ट के नए भवन निर्माण के लिए हल्द्वानी में एक उपयुक्त भूमि को चिह्नित (इयरमार्क) कर लिया है. इस जानकारी को रिकॉर्ड पर लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले में तेजी लाने के आदेश दिए. अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हल्द्वानी में चिह्नित की गई इस जमीन से जुड़ी सभी आवश्यक मंजूरियां और अनापत्ति प्रमाण पत्र (क्लियरेंस) आगामी 6 हफ्ते के भीतर पूरे कर लिए जाएं.
यह पूरा मामला, तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जब हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने नैनीताल हाईकोर्ट के जनमत संग्रह कराने के फैसले के खिलाफ सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया था. बार एसोसिएशन की अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई थी और अब उसे पूरी तरह खारिज कर दिया है. अदालत ने आदेश दिया है कि सभी मंजूरियां मिलने के बाद हल्द्वानी की वो जमीन तत्काल हाईकोर्ट प्रशासन को सौंप दी जाए. ताकि, नए परिसर का निर्माण कार्य आगे बढ़ सके.
क्या होता है जनमत संग्रह? जनमत संग्रह एक प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया होती है. जिसमें किसी देश या क्षेत्र के सभी जनता या मतदाता किसी प्रतिनिधियों के बजाय किसी विशेष प्रस्ताव, कानून या फिर नीतिगत मुद्दे पर सीधे वोट करते हैं. जनमत संग्रह में लोग खुद सीधे मुद्दे पर हां या ना में वोट करते हैं यानी जनता को अपनी राय व्यक्त करने का मौका मिलता है. ऐसे में परिणाम के आधार पर ही आखिरी फैसला लिया जाता है.
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