चेक बाउंस कैसे निपटेंगे दिल्ली के अदालतों में अटके मामले, यह हैं समाधान की सिफारिशें!
चेक बाउंस के राजपाल यादव के मामले ने दिल्ली की अदालतों में लंबित मामलों की समस्या को सामने लाया है। विशेषज्ञ का मानना है कि सजा के बजाय, मध्यस्थता, अनावश्यक स्थगन पर रोक, हलफनामे के आधार पर साक्ष्य और ई-फाइलिंग जैसे कदम लंबित मामलों को तेजी से कम कर सकते हैं।

सौजन्य से:- Navbharat Times
Rajpal Yadav Cheque Bounce Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने अभिनेता राजपाल यादव की सजा बरकरार रखी है। सवाल यह है कि आखिर चेक बाउंस के लाखों मामले वर्षों तक अदालतों में लंबित क्यों रहते हैं और इनका समाधान क्या है।
नई दिल्ली: बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव को चेक बाउंस के 7 मामलों में राहत नहीं मिलने के बाद एक बार फिर देश में चेक बाउंस कानून चर्चा में है। दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी सजा बरकरार रखते हुए कहा कि उन्हें बकाया रकम चुकाने के कई मौके दिए गए, लेकिन वे अपने वादे पूरे नहीं कर सके। हालांकि यह मामला सिर्फ एक अभिनेता तक सीमित नहीं है। हकीकत यह है कि देश, खासकर दिल्ली की अदालतों में लाखों लोग ऐसे मामलों के निपटारे का वर्षों से इंतजार कर रहे हैं।
राजपाल का मामला क्यों बना चर्चा का विषय
दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए राजपाल यादव की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने उन्हें तीन महीने की जेल की सजा भुगतने का आदेश दिया है। साथ ही सातों मामलों में 1.05 करोड़ रुपये प्रति मामले के हिसाब से कुल 7.35 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए उन्हें दो महीने का समय दिया गया है।
दिल्ली की अदालतों में सबसे ज्यादा बोझ चेक बाउंस मामलों का
चेक बाउंस के मामले परक्राम्य लिखत अधिनियम ( Negotiable Instruments Act ), 1881 की धारा 138 के तहत दर्ज होते हैं। दिल्ली की निचली अदालतों में लंबित करीब 15.8 लाख मामलों में से लगभग 5.5 लाख मामले केवल चेक बाउंस से जुड़े हैं। यानी हर तीन मामलों में एक मामला चेक बाउंस का है। यही वजह है कि इन मामलों की सुनवाई अक्सर वर्षों तक चलती रहती है।
हर कुछ महीने में मिलती है अगली तारीख
ऐसे मामलों में वादी और आरोपी दोनों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। कई लोगों को हर दो-तीन महीने बाद अदालत की अगली तारीख मिलती है। अदालतों में एक दिन की सुनवाई सूची में 150 से 200 तक मामले लगे होते हैं, इसलिए अधिकांश मामलों में कुछ ही मिनट सुनवाई होती है और फिर नई तारीख दे दी जाती है। जबकि कानून की मंशा है कि ऐसे मामलों का निपटारा 6 महीने के भीतर हो।
डिजिटल कोर्ट का प्रयोग भी नहीं दे पाया राहत
बढ़ते बोझ को कम करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट ने 2025 में चेक बाउंस मामलों के लिए 34 डिजिटल अदालतें शुरू की थीं, जहां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई की व्यवस्था बनाई गई। लेकिन वकीलों के विरोध, तकनीकी समस्याओं और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण यह प्रयोग सफल नहीं हो सका। कुछ ही महीनों बाद मामलों को दोबारा पारंपरिक अदालतों में ट्रांसफर करना पड़ा।
विशेषज्ञ बोले- सजा नहीं, जल्दी समझौता है सबसे बड़ा समाधान
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चेक बाउंस के अधिकांश मामलों का उद्देश्य पैसा वापस दिलाना होता है, न कि केवल आरोपी को सजा दिलाना। इसलिए मुकदमा शुरू होने से पहले मध्यस्थता (Pre-litigation Mediation), अनावश्यक स्थगन पर रोक, हलफनामे के आधार पर साक्ष्य, ई-फाइलिंग और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने जैसे कदम लंबित मामलों को तेजी से कम कर सकते हैं।
राजपाल के मामले ने बड़ी चुनौती की ओर ध्यान खींचा
राजपाल यादव का मामला भले ही हाई-प्रोफाइल हो, लेकिन इसने उस बड़ी चुनौती की ओर भी ध्यान खींचा है, जिससे हजारों आम लोग रोज जूझ रहे हैं। जब चेक बाउंस के मामले वर्षों तक अदालतों में लंबित रहते हैं, तो न केवल पीड़ित को राहत मिलने में देरी होती है, बल्कि न्याय व्यवस्था पर भी अतिरिक्त बोझ बढ़ता है। ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सजा का प्रावधान पर्याप्त नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को तेज और अधिक प्रभावी बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
लेखक के बारे मेंअशोक उपाध्यायअशोक उपाध्याय, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क पर काम करने का 12 साल का अनुभव। साल 2014 में नवभारत टाइम्स हिंदी अखबार से पत्रकारिता के सफर की शुरुआत की थी। पॉलिटिक्स और क्राइम बीट पर रिपोर्टिंग का काफी अनुभव है। अमर उजाला देहरादून में भी सेंट्रल डेस्क पर काम किया है। साथ ही कई चुनावों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की है। पिछले 6 साल से NBT डिजिटल में न्यूज डेस्क पर काम कर रहे हैं। गूगल ट्रेंड्स को पकड़ने की अच्छी समझ है।
विशेषज्ञता- राजनीति, क्राइम की खबरों पर अच्छी पकड़ के साथ करंट अफेयर्स और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अच्छा खासा अनुभव है। करंट टॉपिक पर विश्लेषण और ओपिनियन लिखने में खास रुचि है।
पत्रकारिता अनुभव: प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 12 साल से कार्यरत हैं।
JIMMC नोएडा से साल 2013 में पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इससे पहले साल 2010 में एमएमएच कॉलेज गाजियाबाद (सीसीएस यूनिवर्सिटी मेरठ) से राजनीतिक शास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की। लोक प्रशासन विषय पर खास पकड़ है। पत्रकारिता से पहले यूपीएससी और उत्तराखंड और यूपी पीसीएस एग्जाम की तैयारी के दौरान समाजशास्त्र, संविधान समेत कई विषयों का अध्ययन किया। संवेदनशील मुद्दों पर लिखने की खास कला है। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कई मार्मिक लेख लिखे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए लोगों की समस्याओं के समाधान का प्रयास किया है, कई बार सफलता भी मिली है। पत्रकारिता में आगे और बेहतर सीखने और समझने का क्रम जारी है।... और पढ़ें
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