सोशल मीडिया और न्यायपालिका की छवि, जस्टिस मसीह ने क्या कहा?
जस्टिस ए.जी. मसीह ने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो अक्सर अदालतों की कार्यवाही के छोटे हिस्से दिखाते हैं, जिससे लोगों की राय अदालत के अंतिम निर्णय से पहले ही बन सकती है। इसलिए नागरिकों को विश्वसनीय समाचार स्रोतों और आधिकारिक रिकॉर्ड पर भरोसा करना चाहिए।

सौजन्य से:- Navbharat Times
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न्यायपालिका की छवि पर वायरल वीडियो का असर
- बात यह है कि ज्यादातर मामलों में सोशल मीडिया एल्गोरिद्म अक्सर विवादास्पद हिस्सों को अधिक बढ़ावा देते हैं, ताकि व्यूज बढ़े। और इसी वजह से इससे न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा होने का खतरा बढ़ सकता है।
- शीर्ष अदालत में न्यायधीश ए.जी. मसीह, कॉन्फेडरेशन ऑफ़ एलुमनाई फ़ॉर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ (CAN फ़ाउंडेशन) द्वारा आयोजित पांचवें जस्टिस HR खन्ना मेमोरियल नेशनल सिम्पोज़ियम में बोल रहे थे।
- उन्होंने कहा कि अदालत की कार्यवाही के छोटे वीडियो क्लिप पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाते। किसी सुनवाई का केवल एक अंश देखकर लोग न्यायाधीश या अदालत के बारे में राय बना लेते हैं।
- उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को समझने के लिए पूरी सुनवाई और कानूनी संदर्भ आवश्यक होता है। उन्होंने न्यायिक गरिमा और जिम्मेदार रिपोर्टिंग की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
- उनका संदेश था कि न्याय केवल दिखना ही नहीं, सही संदर्भ में समझा जाना भी जरूरी है।
अदालतों की लाइव-स्ट्रीमिंग की शुरुआत कब हुई
न्यायपालिक खुद पारदर्शी होने की पक्षधर है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वप्निल त्रिपाठी वाले फैसले में Open Justice सिद्धांत के तहत इसकी शुरुआत का मार्ग प्रशस्त किया। इसका मकसद नागरिकों को न्यायिक प्रक्रिया से जोड़ने के साथ साथ, भारत में अदालतों की लाइव-स्ट्रीमिंग का उद्देश्य न्यायिक पारदर्शिता बढ़ाना था। लेकिन समय के साथ इन वीडियो के छोटे हिस्से सोशल मीडिया पर मनोरंजन और विवाद का विषय बनने लगे। कई वीडियो में संदर्भ हटाकर केवल तीखी टिप्पणियां दिखाई जाती हैं। इससे न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता प्रभावित होती है।Airfare Regulation Case: हवाई किराए की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से दो सप्ताह में मांगे नए नियम
बिना अनुमति वीडियो साझा करने पर रोक
इसी साल जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए बिना अनुमति लाइव-स्ट्रीम की गई अदालत की कार्यवाही के वीडियो रिकॉर्ड, एडिट, पोस्ट, रीपोस्ट, मॉनेटाइज या प्रसारित करने पर रोक लगा दी। न्यायालय ने कहा कि कोर्टरूम को मनोरंजन का मंच नहीं बनाया जा सकता। इस आदेश का उद्देश्य न्यायिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना है। साथ ही यह कदम अदालतों की कार्यवाही के चयनित और भ्रामक उपयोग को रोकने के लिए उठाया गया।क्या सोशल मीडिया न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है?
देखिए एक खतरा तो है ही, ऑनलाइन ट्रायल का जो कि दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री जनमत को तेजी से प्रभावित करती है। अभी हाल में कॉक्रोच जनता पार्टी से GEN Z के तेजी से जुड़ने की एक वजह यह भी रही। यदि किसी मामले की अधूरी जानकारी वायरल हो जाए, तो लोगों की राय अदालत के अंतिम निर्णय से पहले ही बन सकती है। यही कारण है कि न्यायपालिका लगातार जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार की बात कर रही है।स्कूल में हुए यौन-शोषण की जानकारी छुपायी, तो प्रिंसिपल, हेड मिस्ट्रेस होंगे जिम्मेदार, सुप्रीम कोर्ट ने POCSO केस में दी गाईडलाईन्स
सही यही कि वायरल वीडियो देखकर राय बनाने से बचें
किसी भी अदालत की सुनवाई को केवल कुछ सेकंड के वीडियो के आधार पर समझना उचित नहीं है। न्यायिक प्रक्रिया में बहस, कानून, दस्तावेज और कई कानूनी पहलू शामिल होते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल क्लिप अक्सर पूरी कार्यवाही का केवल एक छोटा हिस्सा दिखाते हैं। इसलिए नागरिकों को विश्वसनीय समाचार स्रोतों और आधिकारिक रिकॉर्ड पर भरोसा करना चाहिए। न्यायपालिका पर विश्वास बनाए रखना लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है।मुकदमे की रफ्तार पर तो 'घोंघा' भी शर्माए, 11 साल पुराने केस पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई दिल्ली हाईकोर्ट को फटकार
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