महाराष्ट्र धर्मांतरण कानून पर बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका, मौलिक अधिकारों की रक्षा की मांग
70‑वर्षीय इस्लामी विद्वान मौलाना हलीमुल्लाह फारूक अहमद खान ने महाराष्ट्र के नए धर्मांतरण कानून को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि इसकी धारा 2(a), 6, 13 तथा 9(2) नागरिकों की धर्म और जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता पर असर डाल सकती हैं। याचिकाकार ने 60‑दिन के नोटिस, सबूत देने की ज़िम्मेदारी और लैंगिक भेदभाव जैसी चिंताएँ उठाई और कोर्ट से कानून को असंवैधानिक घोषित करने या केवल जबरदस्ती, धोखे से हुए धर्मांतरण के मामलों में ही लागू करने का आग्रह किया।

सौजन्य से:- AajTak
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महाराष्ट्र के नए धर्मांतरण कानून को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता ने कानून की कई धाराओं पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि इन प्रावधानों से लोगों की अपनी पसंद से शादी करने और धर्म चुनने की आजादी प्रभावित हो सकती है.याचिका में कहा गया है कि जीवनसाथी और धर्म चुनना हर व्यक्ति का निजी फैसला है.
दरअसल, यह याचिका 70 साल के इस्लामिक विद्वान मौलाना हलीमुल्लाह फारूक अहमद खान ने दाखिल की है. वह ठाणे जिले के भिवंडी इलाके के रहने वाले हैं. वकील मतीन शेख के जरिए यह याचिका दायर की गई है. इसमें महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट 2026 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं.
याचिका में कानून की धारा 2(a) को चुनौती दी गई है. यह धारा 'लालच' या 'प्रलोभन' से जुड़ी है. याचिकाकर्ता का कहना है कि इसमें इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों का मतलब बहुत व्यापक है.
याचिका के मुताबिक बेहतर जीवनशैली और दिव्य उपचार जैसे शब्दों का दायरा साफ नहीं है. इससे सामान्य धार्मिक शिक्षा या सामाजिक सेवा जैसे काम भी कानून के दायरे में आ सकते हैं. याचिकाकर्ता ने कहा है कि ऐसे शब्दों का गलत इस्तेमाल होने की आशंका है.
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'धर्म बदलने से पहले 60 दिन के नोटिस क्यों'
याचिका में धारा 6 पर भी सवाल उठाया गया है. इस धारा के तहत धर्म बदलने से पहले 60 दिन का नोटिस देना जरूरी है. याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे किसी व्यक्ति का निजी फैसला सार्वजनिक हो सकता है.
उनका कहना है कि कोई व्यक्ति कौन सा धर्म मानता है या बदलना चाहता है, यह उसका निजी मामला है. इसे सरकारी अधिकारियों की निगरानी में लाने से उसकी निजता और व्यक्तिगत आजादी प्रभावित हो सकती है.
याचिका में धारा 13 को भी चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता का दावा है कि इस प्रावधान के तहत सबूत देने की जिम्मेदारी आरोपी पर आ जाती है. इससे कानून की सामान्य प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत पर सवाल खड़े होते हैं.
याचिका में महिलाओं के धर्मांतरण से जुड़े प्रावधान पर भी आपत्ति जताई गई है. याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसे मामलों में ज्यादा सजा का प्रावधान किया गया है. उन्होंने धारा 9(2) को लैंगिक भेदभाव वाला बताते हुए इसे भी चुनौती दी है.
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याचिकाकर्ता ने पुलिस की कथित जल्दबाजी पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि अगर किसी धर्मांतरण या शादी में जबरदस्ती, धोखा या दबाव है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन दो बालिग लोग अपनी मर्जी से रिश्ता बनाते हैं या शादी करते हैं तो सिर्फ अलग धर्म होने की वजह से उन पर नजर नहीं रखी जानी चाहिए.
याचिका में कहा गया है कि हर व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और अपना धर्म तय करने की आजादी होनी चाहिए. यह उसकी निजी जिंदगी और व्यक्तिगत आजादी से जुड़ा मामला है.
पूरे कानून को रद्द करने की मांग
याचिकाकर्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट से इस कानून को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है. उनका कहना है कि कानून के कुछ प्रावधान लोगों के मौलिक अधिकारों पर असर डाल सकते हैं.
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याचिका में वैकल्पिक मांग भी की गई है. इसमें कहा गया है कि अगर पूरा कानून रद्द नहीं किया जाता है तो इसकी धाराओं की ऐसी व्याख्या की जाए, जिससे इनका इस्तेमाल सिर्फ जबरदस्ती, धोखे या दबाव से कराए गए धर्मांतरण के मामलों में हो.
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