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सुप्रीम कोर्ट ने उच्चाधिकार समिति के पुनर्गठन को ठुकराया

पेपर लीक विरोध के दौरान पुलिस की ज्यादतियों की जांच के लिये गठित पाँच सदस्यीय उच्चाधिकार समिति के पुनर्गठन की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बताया कि समिति कोर्ट के निगरानी में स्वतंत्र रूप से कार्य करेगी और किसी भी बदलाव को स्वीकार नहीं करेगा, जबकि याचिकाकर्ताओं ने कुछ सदस्यों में हित‑संगति के आधार पर बदलाव की माँग की थी।

10 सितंबर 2026 को 03:04 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने उच्चाधिकार समिति के पुनर्गठन को ठुकराया

सौजन्य से:- livehindustan.com

समिति का पुनर्गठन से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ज्यादतियों की जांच के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति के पुनर्गठन की मांग ठुकरा दी। सीजेआई सूर्यकांत ने समिति की स्वतंत्रता की रक्षा की और कहा कि समिति को काम करने दिया जाएगा।

नई दिल्ली। विशेष संवाददाता सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस बर्बरता और ज्यादतियों के साथ-साथ पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की जांच के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) का पुनर्गठन करने या इसमें किसी भी तरह से बदलाव करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने इस आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी के की अगुवाई में पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया था।

समिति का पुनर्गठन

देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की पीठ ने साफ कर दिया कि वह इस धारणा पर आगे नहीं बढ़ेगी कि उसके द्वारा गठित कमेटी पक्षपाती है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा ‘ समिति हमारा ही एक हिस्सा है। हम किसी भी बदलाव के लिए सहमत नहीं होंगे। यह समिति हमारे (सुप्रीम कोर्ट) देखरेख में काम करेगी। हम इसका पुनर्गठन नहीं करेंगे। इस कमेटी को काम करने दें, हम देखेंगे। हम भाग नहीं रहे हैं। अगर किसी को लगता है कि समिति ने कहीं कुछ गलत किया है, तो हमें बताएं। हम खुली सुनवाई करेंगे।’ इससे पहले समिति के पुनर्गठन की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ से समिति के सदस्यों में से एक, जो पूर्वोत्तर राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक थे, ‘हितों के टकराव’ की स्थिति में है क्योंकि वे एक उच्च अधिकारी के करीबी दोस्त थे, जिनकी जांच होने की संभावना है। वरिष्ठ एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अधिवक्ता भूषण की दलीलों का समर्थन किया। वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन ने पीठ से ‘हमारी पहली मांग यह है कि चूंकि उच्चाधिकार प्राप्त समिति को स्वतंत्र रूप से काम करना है, इसलिए इसमें एक अलग एमिकस (न्याय मित्र) और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड होना चाहिए। समिति का प्रतिनिधित्व सरकारी वकील के माध्यम से नहीं किया जा सकता है।’ केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन की इन दलीलों का विरोध किया और पीठ से ऐसे आरोपों को नज़रअंदाज करने को कहा। मेहता ने कहा ‘उनके (याचिकाकर्ता के वकीलों ) अनुसार, एक या दो लोगों को छोड़कर पूरा देश बेईमान है।’

समिति का कार्य

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा ‘हमने समिति में मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक को इसलिए चुना था क्योंकि वे पूर्वोत्तर राज्य के डीजीपीर थे और इसलिए मुख्य भूमि की राजनीतिक पार्टियों के करीब होने की संभावना कम थी।’ शीर्ष अदालत ने कहा ‘वह एक आदेश पारित करेगी जिसमें सार्वजनिक नोटिस और उस नोटिस पर प्रतिक्रिया की व्यवस्था होगी। जो कोई भी समिति के सामने पेश होना चाहता है, उसे अपना पक्ष, जानकारी, दस्तावेज या सबूत पेश करने का अधिकार होगा। समिति इस पर विचार करेगी।’ पीठ ने कहा कि समिति के सदस्य सचिव, एक तरह से, रिकॉर्ड के कस्टोडियन होंगे और पूरी सामग्री कमेटी के सामने रखेंगे। आम तौर पर, यह कोई रिटायर्ड जिला जज या कोई अन्य न्यायिक अधिकारी हो सकता है।

समिति के सदस्यों पर आपत्ति

पहले से ही पक्षपात के अनुमान लगाना, स्वीकार्य नही- जस्टिस बागची

जब वकीलों ने बार-बार समिति के पुनर्गठन पर जोर दिया तो, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने उनसे कहा ‘हम समिति के उस सदस्य के बारे में आपकी आपत्तियों पर विचार करेंगे। लेकिन यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाली और हमारे द्वारा चुनी गई समिति के किसी सदस्य के बारे में पहले से ही पक्षपात का अनुमान लगाया जाए, यह बात हमें स्वीकार्य नहीं है।’ सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादातियों और पुलिस कर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की जांच के लिए पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने समिति से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा अत्यधिक बल और हिंसा के इस्तेमाल- जिसमें पैलेट गन का इस्तेमाल भी शामिल है- के साथ-साथ पुलिस अधिकारियों और अन्य सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित बल और हिंसा के इस्तेमाल की भी जांच करे।

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