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वाहन का घटना से होना मुआवजे का आधार नहीं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी वाहन का घटना से जुड़ा होना मुआवजे का आधार नहीं है। मौत और वाहन के बीच सीधा कनेक्शन जरूरी है।

23 जुलाई 2026 को 07:14 pm बजे
वाहन का घटना से होना मुआवजे का आधार नहीं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम पर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल कार या वाहन का घटना में जिक्र होने से मुआवजा नहीं दिया जा सकता।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी वाहन का घटना से जुड़ा होना एमएसीटी के तहत मुआवजे का आधार नहीं है। मौत और वाहन के बीच सीधा कनेक्शन जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने की टिप्पणी अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की मौत की घटना में केवल मोटर वाहन का शामिल होना ही मुआवजा देने के लिए पर्याप्त नहीं है। जब तक वाहन के उपयोग और मौत के बीच स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष (प्रॉक्सिमेट) संबंध स्थापित न हो, तब तक वाहन मालिक या बीमा कंपनी को मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

मुआवजे की मांग करते हुए किया दावा

मृतक की पत्नी और बच्चों ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग करते हुए दावा किया था कि मृतक की हत्या कार के अंदर की गई थी। अदालत ने पाया कि कथित हत्या और वाहन के बीच ऐसा कोई प्रत्यक्ष संबंध साबित नहीं किया गया।

निचली अदालत के फैसले से लगता है ऐसा

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के फैसलों को रद्द करते हुए वाहन मालिक को राहत दी। अदालत ने कहा कि निचली अदालतों ने बिना पर्याप्त साक्ष्य के यह मान लिया था कि मृतक को चोटें वाहन के अंदर लगी थीं। बेंच ने कहा कि निचली अदालतों के फैसलों से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने यह मान लिया कि मृतक को चोटें कार के अंदर लगी थीं। वे इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे, यह वही बेहतर जानते हैं।

क्या था मामला?

मामले के अनुसार, 29 नवंबर 2009 को मृतक अपने परिचित और अपीलकर्ता के साथ कार में बैठा था। तीन दिन बाद, 2 दिसंबर 2009 को उसका शव एक गांव के पास मिला। मृतक की पत्नी की शिकायत पर अपीलकर्ता और दो अन्य लोगों के खिलाफ अपहरण, हत्या और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया था, लेकिन वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 'लास्ट सीन' सिद्धांत साबित नहीं होने के आधार पर उसे बरी कर दिया।

मृतक की पत्नी का दावा हत्या कार के अंदर हुई थी

इस बीच, मृतक की पत्नी और बच्चों ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग करते हुए दावा किया कि मृतक की हत्या कार के अंदर की गई थी। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 5.64 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे हाईकोर्ट ने बढ़ाकर 8.60 लाख रुपये कर दिया। इसके खिलाफ वाहन मालिक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मृतक की मौत और वाहन के उपयोग के बीच प्रत्यक्ष संबंध था। अदालत ने कहा, "दावेदारों के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं कि चोट किस प्रकार लगी, लेकिन केवल इसलिए कि घटनाक्रम में किसी कार का कहीं न कहीं जिक्र है, मोटर वाहन अधिनियम स्वतः लागू नहीं हो जाएगा। वाहन और मौत के बीच किसी न किसी प्रत्यक्ष संबंध का स्थापित होना आवश्यक है।

SC ने पुराने फैसले का दिया हवाला

अदालत ने अपने पुराने फैसले रीता देवी बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2000) का हवाला देते हुए कहा कि उस मामले में वाहन की चोरी ही अपराध का मुख्य उद्देश्य था और उसी से जुड़ी घटना में मौत हुई थी। इसलिए वहां वाहन और मौत के बीच सीधा संबंध था। हालांकि, वर्तमान मामले में अदालत ने पाया कि कथित हत्या और वाहन के बीच ऐसा कोई प्रत्यक्ष संबंध साबित नहीं किया गया। इसलिए मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने वाहन मालिक की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट और अधिकरण के आदेश रद्द कर दिए और वाहन मालिक पर डाली गई मुआवजे की जिम्मेदारी समाप्त कर दी।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें

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