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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: एसआईटी जांच का आदेश, तीन महीने में रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कथित कस्टोडियल डेथ मामले में बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने जहीरुद्दीन ग्यासुद्दीन शेख की हिरासत में मौत पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है और एसआईटी को तीन महीने के भीतर अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है।

23 जुलाई 2026 को 03:14 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: एसआईटी जांच का आदेश, तीन महीने में रिपोर्ट

सौजन्य से:- Amar Ujala

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हिरासत में मौत: सुप्रीम कोर्ट ने SIT जांच का दिया आदेश, तीन महीने में मांगी रिपोर्ट; क्या है पूरा मामला?

Thu, 23 Jul 2026 06:50 PM IST

राकेश कुमार

पीटीआई, नई दिल्ली।

पीटीआई, नई दिल्ली।

Published by: राकेश कुमार

Updated Thu, 23 Jul 2026 06:50 PM IST

सार

जब रक्षक ही भक्षक बनने के आरोपों में घिरे हों, तब अदालत का रुख ही आम आदमी के भरोसे को जिंदा रखता है। तीन महीने में आने वाली एसआईटी रिपोर्ट यह तय करेगी कि कानून की चौखट पर पीड़ित परिवार को इंसाफ मिलता है या कस्टोडियल वॉयलेंस का यह पन्ना फाइलों में ही सिमट कर रह जाता है।

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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कथित कस्टोडियल डेथ मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने जहीरुद्दीन ग्यासुद्दीन शेख की हिरासत में मौत पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है। कोर्ट ने एसआईटी को तीन महीने के भीतर गुजरात की अदालत में अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि हिरासत में अप्राकृतिक मौत पर प्रारंभिक जांच जरूरी होती है। यदि कोई सबूत मिलता है, तो एफआईआर दर्ज होनी ही चाहिए। सुनवाई में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस वी राजू ने दलील दी। उन्होंने कहा कि एफआईआर की जगह केवल प्रारंभिक जांच कराई जाए। उन्होंने बताया कि मजिस्ट्रेट जांच चल रही है। साथ ही पांच डॉक्टरों की टीम ने पोस्टमार्टम किया था। इस पोस्टमार्टम में शरीर पर कोई चोट नहीं मिली थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने एएसजी की दलील को नहीं माना। पीठ ने कहा कि यह मामला शारीरिक हमले का है। मृतक का बयान बहुत महत्वपूर्ण है। अदालत ने माना कि बिना किसी का नाम लिए एफआईआर दर्ज करने का प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

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क्या हैं इस मामले के सात बड़े अपडेट?

पुलिस हिरासत में क्या हुआ था, परिवार ने क्या गंभीर आरोप लगाए?

यह याचिका मृतक के बेटे तौफिक शेख ने वकील वरिंदर कुमार शर्मा के जरिए दायर की थी। इससे पहले गुजरात हाईकोर्ट ने 29 मई को तौफिक की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) के तहत राहत मांगें। याचिका के अनुसार, वेजलपुर पुलिस ने 18 मई को जहीरुद्दीन शेख को गिरफ्तार किया था। आरोप है कि पुलिस हिरासत में उनके साथ गंभीर मारपीट की गई। इसके अलावा, पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगा है। उन्होंने जहीरुद्दीन को जबरन 30 से 40 डायबिटीज की गोलियां खिला दीं। अत्यधिक गोलियों के कारण उनकी मौत हो गई।

मृतक ने मौत से पहले दो बयान दिए थे। पहला बयान एसवीपी अस्पताल के कागजात में दर्ज है। दूसरा बयान उनके बेटे की ओर से बनाए गए दो वीडियो में है। इन बयानों में जहीरुद्दीन ने पुलिसकर्मियों के नाम बताए थे। उन्होंने मारपीट की पूरी बात बताई थी। इन सब सबूतों के बावजूद पुलिस ने केवल आकस्मिक मौत का मामला दर्ज किया था। परिवार ने पुलिस आयुक्त से भी शिकायत की थी। आरोप है कि परिवार पर समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा था।

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सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि हिरासत में अप्राकृतिक मौत पर प्रारंभिक जांच जरूरी होती है। यदि कोई सबूत मिलता है, तो एफआईआर दर्ज होनी ही चाहिए। सुनवाई में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस वी राजू ने दलील दी। उन्होंने कहा कि एफआईआर की जगह केवल प्रारंभिक जांच कराई जाए। उन्होंने बताया कि मजिस्ट्रेट जांच चल रही है। साथ ही पांच डॉक्टरों की टीम ने पोस्टमार्टम किया था। इस पोस्टमार्टम में शरीर पर कोई चोट नहीं मिली थी।

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हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने एएसजी की दलील को नहीं माना। पीठ ने कहा कि यह मामला शारीरिक हमले का है। मृतक का बयान बहुत महत्वपूर्ण है। अदालत ने माना कि बिना किसी का नाम लिए एफआईआर दर्ज करने का प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

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क्या हैं इस मामले के सात बड़े अपडेट?

- सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया।

- जांच के लिए एसआईटी बनेगी। इसमें डीसीपी रैंक के अधिकारी होंगे। उनके साथ गुजरात के पुलिस महानिदेशक की ओर से नामित दो अधिकारी शामिल होंगे।

- एसआईटी को तीन महीने के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश करनी होगी।

- यदि याचिकाकर्ता जांच से असंतुष्ट रहता है, तो वह विरोध याचिका दाखिल कर सकता है। वह आगे की जांच की मांग भी कर सकता है।

- अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त को आदेश दिया गया है। वे याचिकाकर्ता को मिल रही धमकियों की जांच करेंगे और जरूरी कार्रवाई करेंगे।

- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृतक का बयान बहुत गंभीर है। यह सीधे तौर पर हमले का मामला लगता है।

- सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के 29 मई के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया।

पुलिस हिरासत में क्या हुआ था, परिवार ने क्या गंभीर आरोप लगाए?

यह याचिका मृतक के बेटे तौफिक शेख ने वकील वरिंदर कुमार शर्मा के जरिए दायर की थी। इससे पहले गुजरात हाईकोर्ट ने 29 मई को तौफिक की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) के तहत राहत मांगें। याचिका के अनुसार, वेजलपुर पुलिस ने 18 मई को जहीरुद्दीन शेख को गिरफ्तार किया था। आरोप है कि पुलिस हिरासत में उनके साथ गंभीर मारपीट की गई। इसके अलावा, पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगा है। उन्होंने जहीरुद्दीन को जबरन 30 से 40 डायबिटीज की गोलियां खिला दीं। अत्यधिक गोलियों के कारण उनकी मौत हो गई।

मृतक ने मौत से पहले दो बयान दिए थे। पहला बयान एसवीपी अस्पताल के कागजात में दर्ज है। दूसरा बयान उनके बेटे की ओर से बनाए गए दो वीडियो में है। इन बयानों में जहीरुद्दीन ने पुलिसकर्मियों के नाम बताए थे। उन्होंने मारपीट की पूरी बात बताई थी। इन सब सबूतों के बावजूद पुलिस ने केवल आकस्मिक मौत का मामला दर्ज किया था। परिवार ने पुलिस आयुक्त से भी शिकायत की थी। आरोप है कि परिवार पर समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा था।

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