सुप्रीम कोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण फैसला, इस्तीफे के बाद वापस बहाली का दावा नहीं कर सकता है कर्मचारी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई कर्मचारी स्वेच्छा से इस्तीफा देता है, उससे जुड़े सभी लाभ स्वीकार करता है और उसी इस्तीफे के आधार पर नई नौकरी हासिल कर लेता है, तो बाद में यह कहकर अपनी बहाली की मांग नहीं कर सकता कि उसके इस्तीफे को सक्षम प्राधिकारी ने स्वीकार नहीं किया था।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी स्वेच्छा से इस्तीफा देकर सभी वित्तीय लाभ और अनुभव प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेता है, तो वह बाद में बहाली का दावा नहीं कर सकता।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि अगर कोई कर्मचारी स्वेच्छा से इस्तीफा देता है, उससे जुड़े सभी लाभ स्वीकार करता है और उसी इस्तीफे के आधार पर नई नौकरी हासिल कर लेता है, तो बाद में यह कहकर अपनी बहाली की मांग नहीं कर सकता कि उसके इस्तीफे को सक्षम प्राधिकारी (कंपिटेंट अथॉरिटी) ने स्वीकार नहीं किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस्तीफे की स्वीकृति में यदि कोई तकनीकी या अधिकार संबंधी कमी हो, तो सक्षम प्राधिकारी बाद में उसका अनुमोदन (Ratification) कर उस कमी को दूर कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया दिल्ली कोर्ट का फैसला
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह फैसला दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (डीटीयू) और उसके पूर्व कर्मचारी भारत सिंह रावत के बीच विवाद का निपटारा करते हुए दिया। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट फैसले उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें रावत की पुनर्नियुक्ति का आदेश दिया गया था।
कर्मचारी बाद में नहीं कर सकता ये दावा
अदालत ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी स्वयं इस्तीफा देता है, नोटिस अवधि माफ करने का अनुरोध करता है, कार्यमुक्ति आदेश स्वीकार करता है, सभी देय लाभ प्राप्त करता है और अनुभव प्रमाणपत्र का उपयोग कर दूसरी नौकरी हासिल करता है, तो बाद में वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसका इस्तीफा कभी वैध रूप से स्वीकार ही नहीं हुआ था।
मन बदलने पर नहीं बदल सकता
शीर्ष अदालत ने कहा कि जिस कर्मचारी ने समझौते का लाभ लिया, सभी भुगतान प्राप्त किए, अनुभव प्रमाणपत्र हासिल किया और उसी प्रमाणपत्र के आधार पर दूसरी नियुक्ति प्राप्त कर ली, वह बाद में केवल इसलिए पलट नहीं सकता कि उसे नई नौकरी में निराशा हुई या उसने अपना मन बदल लिया।
क्या था पूरा मामला?
मामले के अनुसार, भारत सिंह रावत ने 19 मई 2016 को अपना इस्तीफा दिया और अनुरोध किया कि नोटिस अवधि माफ कर 31 मई 2016 से इस्तीफा प्रभावी माना जाए। कुलपति की अनुपस्थिति में अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे अधिकारी ने 25 मई 2016 को इस्तीफा स्वीकार कर लिया। इसके बाद रावत को कार्यमुक्त कर दिया गया तथा उन्हें 'नो ड्यूज', अंतिम वेतन और अनुभव प्रमाणपत्र जारी किए गए, जिन्हें उन्होंने स्वीकार भी कर लिया।
सितंबर में कर्मचारी ने वापस किया आवेदन
करीब चार महीने बाद 22 सितंबर 2016 को रावत ने इस्तीफा वापस लेने का आवेदन देते हुए कहा कि इसे विश्वविद्यालय के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट (बीओएम) जैसे सक्षम प्राधिकारी ने स्वीकार नहीं किया था। हालांकि, बीओएम ने 26 सितंबर 2016 की बैठक में पूर्व स्वीकृति का अनुमोदन कर दिया और 3 नवंबर 2016 को इस्तीफा वापस लेने का अनुरोध खारिज कर दिया।
क्या कहता है अनुमोदन का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुमोदन (Ratification) का सिद्धांत यह है कि यदि सक्षम प्राधिकारी बाद में किसी पहले किए गए अनधिकृत कार्य को मंजूरी दे देता है, तो कानून उसे प्रारंभ से ही वैध मानता है। इसलिए बाद में किया गया अनुमोदन मूल आदेश की वैधता को उसके प्रारंभिक दिनांक से प्रभावी बना देता है।
पीठ ने सुनवाई के दौरान की टिप्पणी
अदालत ने यह भी कहा कि रावत का स्वयं का आचरण उनके दावे के खिलाफ जाता है। उन्होंने न केवल इस्तीफे के सभी लाभ स्वीकार किए, बल्कि उसी अनुभव प्रमाणपत्र का उपयोग कर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) कालीकट में डिप्टी रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्ति भी प्राप्त की। ऐसे में वे एक साथ दो परस्पर विरोधी दावे नहीं कर सकते। पीठ ने टिप्पणी की, "कोई व्यक्ति एक ही समय में दोनों लाभ नहीं उठा सकता। वह जब नई नौकरी के लिए विश्वविद्यालय छोड़ना चाहता था तब इस्तीफे को वैध माने और जब वापस लौटना चाहे तो उसी इस्तीफे को अवैध बताने लगे।" इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने डीटीयू की अपील स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और कर्मचारी की पुनर्बहाली का आदेश निरस्त कर दिया
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें
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