22 साल जेल में बंद लेखजी, निर्दोष निकला, सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी
22 साल से जेल में बंद एक व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष निकालकर बरी कर दिया। यह मामला 1997 में दर्ज हुआ था, लेकिन हाई कोर्ट ने तकनीकी आधार पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिससे उसे जेल में 10 साल और बिताने पड़े।

सौजन्य से:- नवभारत टाइम्स
सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद ऐसे व्यक्ति को बरी किया जो कि 22 साल बाद निर्दोष निकला। इस मामले में ट्रायल कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक की गलती निकली। हाई कोर्ट ने तकनीकी आधार पर देरी की वजह से सुनवाई से ही इनकार कर दिया जिसके चलते उसे 10 साल और जेल में बिताने पड़े।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 22 साल से जेल में बंद एक ऐसे व्यक्ति को जेल से बरी करने का आदेश दिया जसे अदालत ने गलत आरोप में दोषी ठहरा दिया था। 22 साल बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले में व्यक्ति निर्दोष निकला। इस मामले में ट्रायल कोर्ट के सबूतों को ठीक से नहीं परखा गया था और हाईकोर्ट ने अपील दाखिल करने में देरी के तकनीकी आधार पर उसकी सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसके चलते उसे 10 साल और जेल में बिताने पड़े।
यह एक ऐसा मामला है जो दिखाता है कि कैसे न्याय के लिए लड़ रहे एक गरीब व्यक्ति को खुद न्यायपालिका से ही निराशा हाथ लगती है, जब कोर्ट तकनीकी आधार पर सुनवाई करने से इनकार कर देता है। जब उस गरीब दोषी व्यक्ति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब तक वह पहले ही 12 साल जेल में बिता चुका था।
हाई कोर्ट की गलती की वजह से 10 साल और जेल में बिताने पड़े
हाई कोर्ट ने अपील दाखिल करने में देरी के तकनीकी आधार पर उसकी सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिससे उसे 10 साल और जेल में बिताने पड़े। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी किया और यह माना कि हमारे समाज के पिछड़े वर्गों, और खासकर उनमें से दोषी ठहराए गए और जेल में बंद लोगों के लिए न्याय पाना अब भी मुश्किल है।
सुप्रीम कोर्ट के जज बोले- हम आदेश से बहुत निराश और परेशान
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि हम उस आदेश से बहुत निराश और परेशान हैं, जिसमें 3,157 दिन की देरी को माफ करने की अर्जी को खारिज कर दिया गया और इसके परिणामस्वरूप धारा 302 के तहत सज़ा (उम्रकैद) के आदेश के खिलाफ 'जेल मेमो ऑफ अपील' को भी खारिज कर दिया गया; जबकि दोषी ने विवादित आदेश के समय 12 साल और अब 10 साल और, यानी कुल 22 साल जेल में बिता लिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए था कि यह अपील जेल के जरिए की गई थी। कोर्ट को मामले को व्यावहारिक या सहानुभूतिपूर्ण नजरिए से देखना चाहिए था और कम से कम देरी को माफ कर देना चाहिए था, ताकि याचिकाकर्ता को अपनी आपराधिक अपील पर मेरिट के आधार पर बहस करने का एक मौका मिल सके।
हमें सक्रिया रवैया अपनाकर देरी को माफ कर देना चाहिए
बेंच ने कहा कि जब लोकतंत्र के तीनों स्तंभ लगातार हर नागरिक, खासकर गरीबों तक कानूनी मदद पहुंचाने की कोशिश करते हैं। तो हमें उदार रवैया अपनाने के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। सिर्फ उदार रवैया ही नहीं, बल्कि सक्रिय रवैया अपनाकर देरी को माफ करना चाहिए। चाहे देरी कितनी भी ज्यादा क्यों न हो। जब कोई दोषी व्यक्ति अदालत का दरवाजा खटखटाता है और मौजूदा मामले में यह कुछ गंभीर चिंताएँ पैदा करता है।
सिर्फ शक के आधार पर हिरासत में लिया गया था
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक व्यक्ति को सिर्फ शक के आधार पर हिरासत में लिया गया और थर्ड-डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करके उससे कबूलनामा हासिल किया गया भले ही वह कानूनी रूप से मान्य न हो। ट्रायल कोर्ट सबूतों का सही मूल्यांकन करने में नाकाम रहा और हाई कोर्ट मूकदर्शक बना रहा। नतीजा यह हुआ कि बिना किसी भरोसेमंद सबूत के एक व्यक्ति की जिंदगी के 22 साल बर्बाद हो गए।
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