क्या है पैलेट गन का सच? छात्रों के संसद मार्च में पुलिस कार्रवाई की होगी जांच, सुप्रीम कोर्ट बनाएगा हाई-पावर कमेटी
रिटायर्ड जज, पूर्व चीफ जस्टिस और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी होंगे शामिल CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने बताया कि कमेटी के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज और हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड चीफ जस्टिस क…

सौजन्य से:- Navbharat Times
रिटायर्ड जज, पूर्व चीफ जस्टिस और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी होंगे शामिल
CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने बताया कि कमेटी के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज और हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड चीफ जस्टिस की सहमति मिल चुकी है। हालांकि, अदालत ने अभी दोनों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। पीठ का कहना था कि नाम सामने आने पर लोग उनके पक्ष या विपक्ष में राय बनाना शुरू कर सकते हैं।- अदालत ने यह भी बताया कि CBI के एक पूर्व डायरेक्टर और एक राज्य के पूर्व DGP ने भी कमेटी में शामिल होने के लिए सहमति दी है। पीठ ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों से पूछा कि जांच कमेटी में CBI के पूर्व निदेशक या किसी पूर्व DGP को शामिल करना ज्यादा उचित होगा या नहीं।
- सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एन. हरिहरन, वृंदा ग्रोवर, शादान फरासत और गोपाल शंकरनारायणन से मंगलवार शाम तक कमेटी के काम के दायरे यानी Terms of Reference पर अपने सुझाव देने को कहा था।
- पीठ ने कहा कि सभी सुझावों पर विचार करने के बाद बुधवार को कमेटी के गठन और उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर आदेश जारी किया जाएगा।
- अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कमेटी किसी भी पीड़ित को अपनी बात रखने का तुरंत अवसर देगी। सुप्रीम कोर्ट कमेटी की सिफारिशों का इंतजार करेगा और सभी पक्षों को सुनने के बाद जरूरत के मुताबिक अंतरिम आदेश जारी करेगा।
पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की जवाबदेही दोनों की जांच
सुप्रीम कोर्ट ने एक दूसरी याचिका पर भी नोटिस जारी किया है। इसमें प्रदर्शन के आयोजकों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। इस तरह अदालत के सामने अब दोनों पक्षों के आरोप हैं-एक तरफ प्रदर्शनकारियों पर हिंसा और पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल इस्तेमाल करने और प्रदर्शनकारियों के साथ कथित ज्यादती के आरोप लगाए गए हैं।पैलेट गन के इस्तेमाल पर भी होगी जांच
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित तौर पर पैलेट गन के गैर-कानूनी इस्तेमाल का मुद्दा उठाया। उनके मुताबिक, पैलेट लगने से दो लोग घायल हुए और उनमें से एक कलाकार है। आंख में चोट लगने के कारण उसके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। उन्होंने ऐसे पीड़ित को मुआवजा दिए जाने की मांग की।- गौर करने वाली बात यह है कि दिल्ली पुलिस की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में पैलेट गन के इस्तेमाल का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है। यह संभावना जताई गई है कि अगर पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ तो इसमें किसी दूसरी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी की भूमिका हो सकती है।
- अदालत ने संकेत दिया कि कमेटी इस पहलू की भी जांच करेगी और यह सिफारिश कर सकती है कि पीड़ितों को अंतरिम मुआवजा दिया जाना चाहिए या नहीं। पैलेट गन के कथित इस्तेमाल को लेकर RAF ने भी आंतरिक जांच के आदेश दिए थे।
वीडियो, CCTV और डिजिटल रिकॉर्ड कमेटी को सौंपे जाएंगे
सुप्रीम कोर्ट अधिकारियों को निर्देश देगा कि घटना से जुड़े सभी सबूत कमेटी को तत्काल उपलब्ध कराए जाएं। इनमें प्रदर्शन के वीडियो, CCTV फुटेज, डिजिटल रिकॉर्ड और दूसरे दस्तावेज शामिल हैं। अदालत पहले ही इन सबूतों को सुरक्षित रखने का निर्देश दे चुकी है। इसका मकसद यह है कि कमेटी घटनाओं के पूरे क्रम को स्वतंत्र तरीके से समझ सके और यह पता लगा सके कि किस परिस्थिति में पुलिस ने किस स्तर का बल इस्तेमाल किया और क्या वह इस्तेमाल हालात के अनुपात में था।दिल्ली पुलिस ने कहा- कानून के मुताबिक किया बल का इस्तेमाल
दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा है कि वह जांच में कमेटी का पूरा सहयोग करेगी और ऐसे सभी रिकॉर्ड उपलब्ध कराएगी, जिनसे यह साबित हो सके कि बल का इस्तेमाल क्रमबद्ध तरीके से और पूरी तरह कानून के मुताबिक किया गया था। पुलिस का कहना है कि हालात ऐसे थे कि उचित बल का इस्तेमाल किए बिना कानून-व्यवस्था बनाए रखना संभव नहीं था। पुलिस ने अपने बचाव में कहा कि उसने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने, संसद भवन और दूसरे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करने, संवैधानिक दायित्व निभाने वाले लोक सेवकों की रक्षा करने और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी पूरी की।पुलिस का दावा- 248 अधिकारी और जवान घायल हुए
पुलिस ने अपने हलफनामे में प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हुए कथित हमलों का भी विस्तार से जिक्र किया है। पुलिस का दावा है कि बड़े समूहों में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस अधिकारियों को निशाना बनाया। कई अधिकारी अपने साथियों से अलग-थलग पड़ गए और उन पर पत्थरों तथा लाठियों से हमला किया गया।- पुलिस ने कहा कि कई वीडियो में प्रदर्शनकारियों को पुलिसकर्मियों के सुरक्षात्मक उपकरण खींचते, उन्हें घसीटते, हेलमेट उतारते और उन्हें पत्थर के फुटपाथ पर धकेलते हुए देखा जा सकता है। पुलिस के मुताबिक, महिला पुलिसकर्मियों समेत कुल 248 अधिकारी और कर्मी घायल हुए।
- पुलिस ने यह भी कहा कि आमतौर पर यह माना जाता है कि छात्र इस तरह की आपराधिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे, लेकिन इस मामले में सामने आए दृश्य इसके उलट तस्वीर पेश करते हैं।
पुलिस ने याचिकाकर्ताओं के आरोपों पर उठाए सवाल
दिल्ली पुलिस ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश किए गए सबूतों पर भी सवाल उठाए हैं। पुलिस का कहना है कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप चुनिंदा तस्वीरों, अधूरे वीडियो क्लिप और ऐसी मीडिया तथा सोशल मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं, जिनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है।- पुलिस के मुताबिक, इससे घटनाक्रम की एकतरफा तस्वीर सामने आती है। इसके विपरीत पुलिस ने कहा कि वह घटना के समय तैयार हुए आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर पूरा घटनाक्रम कमेटी के सामने रखेगी।
- इन रिकॉर्ड में खुफिया जानकारी, पुलिस तैनाती से जुड़े दस्तावेज, वीडियोग्राफी, CCTV फुटेज, वायरलेस लॉग, दैनिक डायरी की एंट्री और मेडिकल रिकॉर्ड शामिल हैं।
अब कमेटी तय करेगी कि किसकी गलती कितनी
सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रस्तावित कमेटी का सबसे अहम काम यही होगा कि 20 जुलाई को हुए घटनाक्रम को आरोप-प्रत्यारोप से अलग करके सबूतों के आधार पर देखा जाए। प्रदर्शनकारियों पर हिंसा के आरोप हों या पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोप-कमेटी सभी पहलुओं की जांच करेगी।- इसके साथ ही, भविष्य में ऐसे प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों को किस परिस्थिति में कितना बल इस्तेमाल करना चाहिए, इस पर भी कमेटी अपनी सिफारिश देगी।
- अदालत के इस कदम से मामला सिर्फ 20 जुलाई की घटना की जांच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान बल प्रयोग के लिए एक व्यापक व्यवस्था और दिशा-निर्देश तैयार करने की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है।
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