सुप्रीम कोर्ट ने महावीर जी मंदिर प्रबंधन विवाद पर फैसला सुरक्षित रखा, दोनों संप्रदायों को लिखित दलीलें देने का आदेश
राजस्थान के महावीर जी जैन मंदिर के श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के बीच चल रहे प्रबंधन झगड़े में सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सुरक्षित रख दिया। कोर्ट ने पक्षों से कहा कि भगवान को परेशान नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें आठ दिनों के भीतर लिखित दलीलें पेश करने को कहा।

सौजन्य से:- Amar Ujala
{"_id":"6aa1fdcce7850af8c9068197","slug":"supreme-court-save-decision-on-rajasthan-mahavir-ji-temple-management-dispute-2026-09-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"सुप्रीम कोर्ट: 'आप भगवान को क्यों परेशान कर रहे हो?' मंदिर प्रबंधन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
सुप्रीम कोर्ट: 'आप भगवान को क्यों परेशान कर रहे हो?' मंदिर प्रबंधन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित
Thu, 10 Sep 2026 06:16 AM IST
नितिन गौतम
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 10 Sep 2026 06:16 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के महावीर जी मंदिर प्रबंधन विवाद पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के प्रति नाराजगी भी जाहिर की और सवाल उठाते हुए कहा कि क्या इस मुकदमेबाजी से भगवान खुश होंगे?
विज्ञापन
विस्तार
यह कहते हुए कि भगवान को परेशान नहीं किया जाना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के प्रसिद्ध महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के बीच चल रहे लंबे विवाद में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने याचिकाकर्ता दिगंबर समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम और प्रतिवादी पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा। दोनों पक्षों को आठ दिनों के अंदर लिखित दलीलें पेश करने का निर्देश दिया है।
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान दीवान ने कहा कि वे मंदिर के धर्म परिवर्तन की मांग नहीं कर रहे इसलिए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 लागू नहीं होता। वहीं सुंदरम ने तर्क दिया कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही पहले ही समाप्त हो चुकी थी इसलिए हाईकोर्ट को अपील नहीं सुननी चाहिए थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने दोनों पक्षों से कहा, 'यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है। क्या आप चाहते हैं कि सुबह श्वेतांबर अपनी रीति से पूजा करें और शाम को दिगंबर भगवान के वस्त्र बदलकर अपनी पद्धति से अनुष्ठान करें? आप महान भगवान को क्यों परेशान कर रहे हो? वे इस धरती पर जन्मे सबसे महान संतों में से एक हैं। क्या इस मुकदमेबाजी से भगवान प्रसन्न होंगे?'
क्या है मामला
मामला राजस्थान सार्वजनिक न्यास अधिनियम 1959 की धारा 40 के तहत दायर आवेदन से जुड़ा है, जिसमें दिगंबर समिति के पदाधिकारियों को हटाकर श्वेतांबर प्रबंधन समिति बनाने की मांग की गई थी। 1994 में ट्रायल कोर्ट ने 1991 के अधिनियम के आधार पर कार्यवाही समाप्त कर दी थी। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की, जिसके खिलाफ दिगंबर समिति ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है।
विज्ञापन
अदालत ने साफ किया कि वह केवल 1991 अधिनियम की धारा 4 के लागू होने के सीमित सवाल पर ही विचार करेगी। जस्टिस पारदीवाला ने दोनों पक्षों से यह भी अपील की कि वे इस विवाद को सुलझाएं क्योंकि भगवान महावीर इस तरह की लड़ाई से प्रसन्न नहीं होते।
वैवाहिक दुष्कर्म के कानूनी प्रावधान की सांविधानिक जांच करने का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने वाले कानूनी प्रावधान की सांविधानिक वैधता की जांच करने का फैसला किया। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि वह इस मामले में अगले महीने से विस्तृत सुनवाई करेगी। मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अपवाद-2 को चुनौती दी गई है। इस प्रावधान के तहत किसी पुरुष और उसकी वयस्क पत्नी के बीच बिना सहमति यौन संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाता। इसी तरह का प्रावधान अब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 63 में भी मौजूद है।
पीठ ने कहा कि वह दो अहम सवालों पर विचार करेगी-पहला, क्या वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद सांविधानिक है और दूसरा, अगर यह अपवाद बरकरार रहता है तो क्या इसके बावजूद विवाह के भीतर ऐसे कृत्य के लिए अभियोजन चलाया जा सकता है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि मामला केवल सामाजिक नैतिकता का नहीं, बल्कि कानून की संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरने का है।
विज्ञापन
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान दीवान ने कहा कि वे मंदिर के धर्म परिवर्तन की मांग नहीं कर रहे इसलिए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 लागू नहीं होता। वहीं सुंदरम ने तर्क दिया कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही पहले ही समाप्त हो चुकी थी इसलिए हाईकोर्ट को अपील नहीं सुननी चाहिए थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने दोनों पक्षों से कहा, 'यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है। क्या आप चाहते हैं कि सुबह श्वेतांबर अपनी रीति से पूजा करें और शाम को दिगंबर भगवान के वस्त्र बदलकर अपनी पद्धति से अनुष्ठान करें? आप महान भगवान को क्यों परेशान कर रहे हो? वे इस धरती पर जन्मे सबसे महान संतों में से एक हैं। क्या इस मुकदमेबाजी से भगवान प्रसन्न होंगे?'
विज्ञापन
क्या है मामला
मामला राजस्थान सार्वजनिक न्यास अधिनियम 1959 की धारा 40 के तहत दायर आवेदन से जुड़ा है, जिसमें दिगंबर समिति के पदाधिकारियों को हटाकर श्वेतांबर प्रबंधन समिति बनाने की मांग की गई थी। 1994 में ट्रायल कोर्ट ने 1991 के अधिनियम के आधार पर कार्यवाही समाप्त कर दी थी। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की, जिसके खिलाफ दिगंबर समिति ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है।
विज्ञापन
अदालत ने साफ किया कि वह केवल 1991 अधिनियम की धारा 4 के लागू होने के सीमित सवाल पर ही विचार करेगी। जस्टिस पारदीवाला ने दोनों पक्षों से यह भी अपील की कि वे इस विवाद को सुलझाएं क्योंकि भगवान महावीर इस तरह की लड़ाई से प्रसन्न नहीं होते।
वैवाहिक दुष्कर्म के कानूनी प्रावधान की सांविधानिक जांच करने का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने वाले कानूनी प्रावधान की सांविधानिक वैधता की जांच करने का फैसला किया। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि वह इस मामले में अगले महीने से विस्तृत सुनवाई करेगी। मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अपवाद-2 को चुनौती दी गई है। इस प्रावधान के तहत किसी पुरुष और उसकी वयस्क पत्नी के बीच बिना सहमति यौन संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाता। इसी तरह का प्रावधान अब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 63 में भी मौजूद है।
पीठ ने कहा कि वह दो अहम सवालों पर विचार करेगी-पहला, क्या वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद सांविधानिक है और दूसरा, अगर यह अपवाद बरकरार रहता है तो क्या इसके बावजूद विवाह के भीतर ऐसे कृत्य के लिए अभियोजन चलाया जा सकता है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि मामला केवल सामाजिक नैतिकता का नहीं, बल्कि कानून की संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरने का है।
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार के अपवाद पर फैसला सुनने की दिशा में कदम बढ़ाया, पति के खिलाफ अभियोजन की कानूनी जाँच

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के हॉस्टल हादसे को राष्ट्रीय मुद्दा बना कर सुनवाई शुरू की

हाई कोर्ट ने 'यारियां-2' के निर्माताओं को मिली बड़ी राहत, कृपाण दिखाने वाले FIR को रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल सरकार को विधायकों के विरुद्ध दर्ज मामलों को वापस लेने की स्वीकृति दी

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल‑ क्या मौजूदा क़ानून से पति‑पत्नी के यौन दुरुपयोग पर केस चल सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा: राहुल गांधी VVIP नहीं, सभी मामले समान—जल्द सुनवाई के लिए अर्जी दायर करें

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: मैरिटल रेप अपवाद के बावजूद पति पर रेप का मुकदमा चलाना संभव?

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद पर सवाल उठाया, पति पर रेप केस चलाने की संभावना पर विचार किया
ताज़ा ख़बरें
- संसद का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट नहीं: वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने का फैसला संसद पर
- सुप्रीम कोर्ट नहीं तय कर सकता मैरिटल रेप का अपराधीकरण, यह संसद का अधिकार है
- सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को मां के पैर छूकर क्षमा माँगने की सलाह दी
- सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी करने पर फटकार लगाई
- सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल: वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध न मानने वाले प्रावधान में पति पर रैप का मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है?
- सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल के सभी 65 धरना‑प्रदर्शन मामलों में अभियोजन वापस करने की मंजूरी दी
- उत्तरी प्रदेश सरकार, आकृति चौधरी के NSA रद्दीकरण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी
- सैन्य सेवा बचाव और स्वास्थ्य परीक्षा धोखाधड़ी पर कड़े कदम: नई रक्षा विधियों का परिचय

