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हाई कोर्ट ने 'यारियां-2' के निर्माताओं को मिली बड़ी राहत, कृपाण दिखाने वाले FIR को रद्द किया

पंजाब‑हरियाणा हाई कोर्ट ने फिल्म ‘यारियां‑2’ के निर्देशक, सह‑निर्देशक और निर्माता पर दायर आईपीसी धारा 295‑ए के तहत FIR को खारिज कर दिया। न्यायाधीश शालिनी सिंह नागपाल ने कहा कि धार्मिक प्रतीक का अनजाने में कलात्मक चित्रण अपराध नहीं बनता, जब तक इसे जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण मंशा से नहीं किया गया हो। इस कारण शिकायतकर्ता की याचिका को अस्वीकार कर सभी कार्यवाही रद्द कर दी गई।

10 सितंबर 2026 को 02:04 am बजे
हाई कोर्ट ने 'यारियां-2' के निर्माताओं को मिली बड़ी राहत, कृपाण दिखाने वाले FIR को रद्द किया

सौजन्य से:- Jagran

यारियां-2 के कृपाण विवाद में निर्देशक-निर्माता को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने FIR की रद; जानें अदालत ने क्या कहा

यारियां-2 के गाने में गैर-अमृतधारी अभिनेता को कृपाण दिखाने पर दर्ज FIR हाई कोर्ट ने रद कर दी। अदालत ने ...और पढ़ें

HighLights

- हाई कोर्ट ने यारियां-2 के निर्माताओं को कृपाण विवाद में राहत दी।

- अदालत ने फिल्म के निर्देशक, सह-निर्देशक और निर्माता पर दर्ज FIR रद्द की।

- धार्मिक प्रतीक का अनजाने में चित्रण भावनाएं आहत करने का अपराध नहीं।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। फिल्म ‘यारियां-2’ के एक गाने में गैर-अमृतधारी अभिनेता को कृपाण पहने दिखाने के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने फिल्म के निर्देशक, सह-निर्देशक और निर्माता को बड़ी राहत दी है। अदालत ने कहा कि किसी धार्मिक प्रतीक का अनजाने में कलात्मक चित्रण अपने आप में धार्मिक भावनाएं आहत करने का अपराध नहीं बन जाता।

इसके लिए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की मंशा साबित होना जरूरी है। हाई कोर्ट ने मामले में दर्ज प्राथमिकी और उससे जुड़ी पूरी कार्यवाही रद कर दी।

मामला फिल्म ‘यारियां-2’ के एक गाने से जुड़ा था। शिकायतकर्ता हरप्रीत सिंह ने आरोप लगाया था कि गाने में अभिनेता नीजान जाफरी को श्री साहिब यानी कृपाण पहने दिखाया गया। शिकायत के मुताबिक सिख परंपरा के अनुसार कृपाण अमृतधारी सिख ही धारण कर सकते हैं।

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निर्देशक व टीम पर लगाए थे आरोप

आरोप लगाया गया कि निर्देशक राधिका राव, सह-निर्देशक विनय सप्रू और निर्माता भूषण कुमार ने यह चित्रण जानबूझकर किया, जिससे सिख समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।इस आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह भी दलील दी गई कि इसी गाने और आरोपों को लेकर अमृतसर में भी प्राथमिकी दर्ज की गई थी, इसलिए दूसरी प्राथमिकी कायम नहीं रह सकती।

हालांकि अदालत ने पाया कि मौजूदा प्राथमिकी 30 अगस्त 2023 को दर्ज हुई थी, जबकि अमृतसर वाली प्राथमिकी 31 अगस्त 2023 को दर्ज की गई। इसलिए मौजूदा मामला दूसरी प्राथमिकी नहीं था।

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दुर्भावनापूर्ण मंशा साबित करना जरूरी

जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने धारा 295-ए के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि अपराध के लिए केवल किसी धार्मिक प्रतीक का चित्रण पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह भी दिखाना होगा कि चित्रण जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण मंशा से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए किया गया था।

अदालत ने कहा कि गाने में गैर-अमृतधारी सिख को कृपाण पहने दिखाना सिख धर्म का अपमान नहीं माना जा सकता। यह रचनात्मक स्वतंत्रता और कलात्मक अभिव्यक्ति के दायरे में आता है। अनजाने में हुई प्रस्तुति को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए किया गया जानबूझकर कृत्य नहीं माना जा सकता।

हाई कोर्ट ने रद्द की कार्यवाही

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि विवाद सामने आने के बाद फिल्म से संबंधित आपत्तिजनक दृश्य हटा दिए गए थे। याचिकाकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं होने का आश्वासन भी दिया था। हाई कोर्ट ने कहा कि एक व्यक्ति की शिकायत को पूरे सिख समुदाय की सामूहिक धार्मिक भावना के रूप में नहीं माना जा सकता।

अदालत ने मामले को उन परिस्थितियों में पाया, जहां आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने के बावजूद अपराध के आवश्यक तत्व सामने नहीं आते। इसी आधार पर प्राथमिकी और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही याचिकाकर्ताओं के संबंध में रद कर दी गई।

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