सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील सामग्री रोकने की जिम्मेदारी सरकार की
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है जिसमें कहा गया है कि सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील सामग्री रोकने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की नहीं, बल्कि सरकार की है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मुद्दा प्रमुख सार्वजनिक महत्व का है, लेकिन यह विधिक विवाद नहीं है और इसका समाधान सरकार द्वारा नीतियों और कानूनों के माध्यम से किया जाना चाहिए।

सौजन्य से:- Navbharat Times
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अश्लील सामग्री रोकने वाली याचिका में क्या मांगें की गई थीं
- याचिका में केंद्र सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी नीति बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जिससे सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार की अश्लील सामग्री देखने पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।
- साथ ही नाबालिगों की अश्लील वेबसाइटों तक पहुंच रोकने के लिए डिजिटल सत्यापन और तकनीकी फिल्टरिंग जैसी व्यवस्था लागू करने का आग्रह किया गया।
- याचिकाकर्ता ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67, 67A और 67B का हवाला देते हुए कहा कि ये प्रावधान अश्लील सामग्री के प्रकाशन, प्रसारण और बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार को अपराध घोषित करते हैं। ऐसे में सार्वजनिक स्थानों पर भी अश्लील सामग्री देखने पर स्पष्ट प्रतिबंध के लिए अलग कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता है।
- याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि इंटरनेट के माध्यम से अश्लील सामग्री तक आसान पहुंच सामाजिक अपराधों और यौन हिंसा को बढ़ावा दे सकती है। इसी आधार पर राष्ट्रीय एक्शन प्लान और कानूनी ढांचा तैयार करने की मांग की गई थी।
यह न्यायपालिका नहीं, सरकार का विषय है - सुप्रीम कोर्ट
- सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान माना कि इंटरनेट के बढ़ते उपयोग के बीच अश्लील सामग्री और विशेष रूप से नाबालिगों की पहुंच एक गंभीर सामाजिक चिंता है।
- इसके बावजूद अदालत ने कहा कि न्यायपालिका का कार्य नीति बनाना नहीं, बल्कि कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करना है।
- पीठ ने कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा प्रमुख सार्वजनिक महत्व का है, लेकिन यह विधिक विवाद नहीं है।
- अदालत के अनुसार ऐसे मामलों में तकनीकी समाधान, डिजिटल फिल्टरिंग और विशेषज्ञ संस्थाओं की राय आवश्यक होती है। इसलिए इस विषय पर निर्णय लेने का अधिकार कार्यपालिका के पास है।
- कोर्ट ने विशेष रूप से MeitY का उल्लेख करते हुए कहा कि इंटरनेट नियमन और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े मामलों में वही सक्षम मंत्रालय है। यह फैसला संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को भी मजबूत करता है, जिसके अनुसार न्यायपालिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग हैं।
अश्लील सामग्री रोकने के मौजूदा कानून क्या कहते हैं ?
फिलहाल भारत में अश्लील सामग्री के नियमन के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67, 67A और 67B लागू हैं। धारा 67 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करने को दंडनीय बनाती है। धारा 67A यौन स्पष्ट सामग्री के प्रकाशन और प्रसारण पर कठोर दंड का प्रावधान करती है। वहीं धारा 67B बच्चों से संबंधित यौन सामग्री के प्रकाशन, प्रसारण, डाउनलोड या संग्रहण जैसे कृत्यों को गंभीर अपराध मानती है। इसके अतिरिक्त POCSO Act, 2012 बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में विशेष सुरक्षा प्रदान करता है।प्रीति जिंटा की तरह आपकी भी Deepfake गंदी फोटो वायरल हो तो क्या करें? कानूनी राह और अधिकार
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