सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर दवाओं के ऊँचे दामों को दिनदहाड़े डकैती बताया
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की आवश्यक दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत ₹27,000 और रिटेलर कीमत ₹2,700 के बीच के अंतर को ‘पूरी तरह से उपद्रव’ और ‘नरसंहार’ कहा। न्यायाधीशों ने सवाल उठाया कि क्यों एमआरपी अनलिमिटेड रखी जा रही है और रिटेलर को अधिक वसूलने का मौका मिल रहा है। सुनवाई में दवा प्राइस नियंत्रण पर सख्त कदम उठाने का भी आह्वान किया गया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं की बहुत ज्यादा कीमतों को दिनदहाड़े डकैती बताया
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की जरूरी दवाइयों को बहुत ज्यादा दामों पर बेचे जाने पर कड़ी टिप्पणी की.
By Sumit Saxena
Published : September 23, 2026 at 8:03 AM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कैंसर की दवाओं की बहुत ज़्यादा कीमतों को 'दिनदहाड़े डकैती' बताया. कोर्ट को बताया गया कि कैंसर की जरूरी दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) ₹27,000 है, जबकि रिटेलर का प्राइस (PTR) रेट ₹2,700 है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस कीमत को मरीजों के खिलाफ जबरन वसूली, 'पूरी तरह से उपद्रव' और 'नरसंहार' करार दिया और हैरानी जताई कि अधिकारी इस पर चुप क्यों हैं. बहुत ज़्यादा कीमत पर कड़ी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, 'दवा की असली कीमत से 10 गुना ज़्यादा एमआरपी छापने की इजाजत क्यों है. एमआरपी 10फीसदी या 16 फीसदी से ज़्यादा क्यों नहीं हो सकती? यह अनलिमिटेड क्यों होनी चाहिए?'
इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने की. बेंच दो पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें दवाओं से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे. इनमें दवाओं पर सख्त प्राइस कंट्रोल पक्का करना भी शामिल था. बेंच ने कहा, 'यह बहुत हैरानी की बात है कि जिन अथॉरिटीज को इस पर एक्शन लेना चाहिए था, वे चुप हैं.'
जस्टिस मेहता ने कहा कि कई मरीजों का इलाज पीएमजेएवाई या आयुष्मान भारत के तहत हो रहा है, इसलिए टैक्सपेयर्स का पैसा इस सब में जाता है और जो दवा 200 रुपये में बिकती है, वह 2000 रुपये में दी जाती है और हॉस्पिटल को रीइंबर्समेंट मिलता है. जस्टिस मेहता ने कहा, 'यह सीधे तौर पर फ्रॉड का मामला है,' और कहा कि निर्माता एमआरपी तय करता है. जस्टिस मेहता ने कहा, 'एक निर्माता कैंसर की दवा पर एमआरपी के तौर पर 27,000 रुपये लेता है, और पीटीआर (रिटेलर को कीमत) 2700 रुपये है. यह बहुत ज़्यादा है! शॉकिंग!'
बेंच को बताया गया कि ज़्यादातर रिटेलर ही ज़्यादा पैसे वसूलते हैं. बेंच ने कहा, 'दवा की असली कीमत से 10 गुना ज़्यादा एमआरपी छापने की इजाजत क्यों है... जिससे रिटेलर को अपनी मर्ज़ी से कुछ भी चार्ज करने का मौका मिलता है.' बेंच ने कहा, 'एमआरपी 10फीसदी या 16फीसीदी से ज़्यादा क्यों नहीं हो सकती? यह अनलिमिटेड क्यों होनी चाहिए?'
बेंच ने कहा कि लोग इलाज के लिए अपने घर और गहने बेच देते हैं और सवाल किया कि मरीजों को इस तरह कैसे धोखा दिया जा सकता है. बेंच ने कहा, 'सभी दवाओं को प्राइस फिक्सेशन के दायरे में लाया जाता है, हमें जेनेरिक दवा के सिस्टम की भी जरूरत नहीं पड़ सकती है. सब कुछ बराबर होगा.'
एक याचिका में केंद्र की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने कहा कि जो भी मैकेनिज्म मौजूद है, उसे कोर्ट के सामने रखा जाएगा और आगे सुधार की जांच की जाएगी. बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि 2007 के संशोधन के अनुसार सभी दवाएं जरूरी है और कहा, 'सभी दवाएं जरूरी है तो दवाओं के एक खास सेट को बाहर करने, कैटेगरी बनाने के पीछे क्या लॉजिक है.'
बेंच ने कहा कि सरकार इसे विरोध वाली याचिका नहीं मान रही है. एक पिटीशनर ने बेंच को बताया कि उनकी याचिका में रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा जेनेरिक दवाएं लिखने से जुड़ा मुद्दा भी उठाया गया है. उन्होंने कहा कि दवाओं की एमआरपी तय करना बहुत जरूरी है.
बेंच ने देखा कि कीमत तय करना एक बड़ा मुद्दा है और मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को तय की. एक पिटीशन में अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे फार्मा कंपनियों और रिटेलर्स द्वारा जरूरी दवाओं की कथित गलत तरीके से ज़्यादा कीमत वसूलने को रोककर दवा के फॉर्मूलेशन को ज़्यादा किफ़ायती बनाएं.
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