हिमाचल हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: कानून सिर्फ जागरूककर्ता की मदद करता है, मूकदर्शक की नहीं
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक और संबद्ध सेवा परीक्षा (एचएएस) की मेरिट सूची में बदलाव पर याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि कानून का लाभ सिर्फ उन्हीं को मिलता है जो समय पर कोर्ट जाते हैं, न कि जो मूकदर्शक बने रहते हैं।

सौजन्य से:- अमर उजाला
हिमाचल हाईकोर्ट की टिप्पणी: कानून सिर्फ जागरूक की मदद करता है, मूकदर्शक की नहीं
प्रदेश हाईकोर्ट ने साल 2013 की हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक और संबद्ध सेवा परीक्षा (एचएएस) की मेरिट सूची में सुधार कर नियुक्ति की मांग करने वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने साल 2013 की हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक और संबद्ध सेवा परीक्षा (एचएएस) की मेरिट सूची में सुधार कर नियुक्ति की मांग करने वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी मुख्य कानूनी फैसले का आर्थिक या प्रशासनिक लाभ केवल उन्हीं जागरूक याचिकाकर्ताओं को मिलेगा, जो समय पर अपने हक के लिए कोर्ट पहुंचे थे, न कि उन्हें जो वर्षों तक सोते रहे और मूकदर्शक बने रहे। साथ ही न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग को भी कड़ा आदेश दिया कि वह इस मामले में याचिकाकर्ता के किसी भी प्रतिवेदन पर कोई आदेश पारित न करे।
यह है पूरा मामला
यह पूरा मामला 2013 की प्रशासनिक परीक्षा में आरक्षण के नियमों से जुड़ा है। मुख्य विवाद यह था कि क्या आरक्षित वर्ग के वे उम्मीदवार, जिन्होंने प्रारंभिक परीक्षा पास करने के लिए अंकों में सरकारी छूट का फायदा लिया था, वे बाद में मुख्य परीक्षा के कुल अंकों के आधार पर सामान्य वर्ग की सीटों पर माइग्रेट (कब्जा) कर सकते हैं या नहीं। इस पर 29 मई 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मोहित गुप्ता बनाम राज्य मामले में फैसला सुनाया था। खंडपीठ ने माना था कि प्रारंभिक परीक्षा में छूट का लाभ लेने वाले उम्मीदवार सामान्य वर्ग की सीटों पर नहीं जा सकते। हालांकि, जो लोग पिछले 10 साल से नौकरी कर रहे थे, उन्हें मानवीय आधार पर न हटाने का आदेश देते हुए कोर्ट ने सिर्फ मामले के मूल याचिकाकर्ताओ के दावों की जांच करने के निर्देश लोक सेवा आयोग को दिए थे।
सोए हुए उम्मीदवारों को कोई राहत नहीं दी जा सकती: अदालत
इसी फैसले की आड़ में याचिकाकर्ता ने भी अपने लिए नियुक्ति की मांग की थी। अदालत ने कहा कि खंडपीठ इस बात से वाकिफ थी कि मामला अगर पूरी तरह खोल दिया गया, तो कई नए कानूनी विवाद खड़े हो जाएंगे। इसलिए खंडपीठ ने अपने फैसले का लाभ केवल उन्हीं जागरूक उम्मीदवारों तक सीमित रखा था, जो समय पर अपीलकर्ता बनकर अदालत के समक्ष मौजूद थे। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब पिछले कई वर्षों से यह मुकदमा चल रहा था, तब याचिकाकर्ता को स्वतंत्र याचिका दायर करने या उस मुकदमे में एक पक्ष बनने से किसी ने नहीं रोका था। लेकिन याचिकाकर्ता उस समय मूकदर्शक बना रहा। अब जब खंडपीठ ने एक फैसला सुना दिया, तो वह सोकर उठा और अदालत से अपने पक्ष में आदेश जारी करने की मांग करने लगा। ऐसे सोए हुए उम्मीदवारों को कोई राहत नहीं दी जा सकती।
न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत
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