सुनवाई की देरी से न्यायिक अंतरात्मा झकझोरा, 9 साल की लंबी कैद के बाद जमानत में मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने 9 साल से अधिक समय से जेल में बंद हत्या के आरोपी लियाकत अली को जमानत देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि मुकदमे में हुई लंबी देरी ने उसकी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने अनुच्छेद 32 के तहत अपनी असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए आरोपी लियाकत अली को जमानत देने का आदेश दिया। अली पिछले 9 वर्ष 2 माह से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या), 201 (सबूत मिटाना) और धारा 34 (समान आशय) के तहत दर्ज मामले में न्यायिक हिरासत में था।
'...व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन'
पीठ ने कहा, 'मुकदमे में प्रगति के बिना अनिश्चितकाल तक किसी व्यक्ति को जेल में रखना उसके त्वरित सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से सीधे प्राप्त होता है और विशेष रूप से लंबी हिरासत वाले मामलों में इसकी रक्षा की जानी चाहिए। मुकदमे में हुई लंबी देरी ने हमारी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है। जब कोई आरोपी हिरासत में हो, तब शीघ्र सुनवाई कोई विकल्प नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता है।'- अदालत ने कहा कि इस मामले की असाधारण परिस्थितियां संवैधानिक हस्तक्षेप की मांग करती हैं। साथ ही उसने आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि निर्दोष होने की धारणा (Presumption of Innocence) तथा "जमानत नियम है और जेल अपवाद" के सिद्धांत को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- रिकॉर्ड के अनुसार, अली ने शिकायत की थी कि मुकदमे की सुनवाई उसकी किसी गलती के बिना बेहद धीमी गति से चल रही है। वर्ष 2024 में उसकी जमानत याचिका पर अंतिम निर्णय हो जाने के बाद भी मुकदमे में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। अब तक अभियोजन पक्ष के 30 में से केवल 12 गवाहों की ही गवाही हो सकी है।
- अदालत ने यह भी दर्ज किया कि कथित घटना के समय अली किशोरावस्था में था और उसके खिलाफ मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर आधारित है। पीठ ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में वह इस याचिका पर विचार नहीं करती, लेकिन मुकदमे में लगातार हो रही देरी और लंबी कैद ने उसे हस्तक्षेप के लिए बाध्य किया।
- पीठ ने कहा कि यदि मुकदमा इसी गति से चलता रहा तो इसके पूरा होने में अभी और लंबा समय लगेगा। इसलिए मामले के तथ्यों को देखते हुए अनुच्छेद 32 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अली को जमानत दी जाती है। हालांकि, जमानत की उपयुक्त शर्तें संबंधित ट्रायल कोर्ट तय करेगा।
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