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चुनावी आयुक्त पर पुलिस कार्रवाई असंभव: कानूनी सुरक्षा और हटाने की विशेष प्रक्रिया

मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े कार्यों के लिए 2023 के अधिनियम की धारा 16 के तहत आपराधिक या दीवानी कार्रवाई से immunity मिलती है, इसलिए पुलिस द्वारा उनकी गिरफ्तारी कानूनी रूप से नहीं हो सकती। आयुक्त को हटाने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार संसद के दोनों सदनों में दो‑तिहाई बहुमत की विशेष प्रक्रिया आवश्यक है।

24 सितंबर 2026 को 10:04 am बजे
चुनावी आयुक्त पर पुलिस कार्रवाई असंभव: कानूनी सुरक्षा और हटाने की विशेष प्रक्रिया

सौजन्य से:- ABP News

क्या चीफ इलेक्शन कमिश्नर को गिरफ्तार कर सकती है पुलिस, क्या है कानून?

Gyanesh Kumar Arrest: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी को लेकर मांग बढ़ती जा रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को गिरफ्तार किया जा सकता है. जानें कानून.

- ज्ञानेश कुमार विवाद पर चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा पर बहस छिड़ी।

- अधिनियम 2023 की धारा 16 आधिकारिक कर्तव्यों को कानूनी सुरक्षा देती है।

- निजी अपराधों पर यह सुरक्षा लागू नहीं, हटाने की प्रक्रिया संसदीय है।

Gyanesh Kumar Arrest: 23 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चुनाव आयोग के अंदरूनी मतभेदों की खबरों के बाद एक राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. विपक्षी दलों ने सरकार की आलोचना तेज कर दी है और चीफ इलेक्शन कमिश्नर के इस्तीफे से लेकर उनकी गिरफ्तारी तक की मांग की है. इस विवाद के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या पुलिस मुख्य चुनाव आयुक्त को गिरफ्तार कर सकती है और भारतीय कानून के तहत इस पद को लेकर क्या कानूनी सुरक्षा मिलती है.

मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम 2023 के तहत बताए गए कानूनी ढांचे में चुनाव आयुक्त को अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए किए गए कार्यों और बयानों के संबंध में सुरक्षा मिलती है. हालांकि यह सुरक्षा उनके आधिकारिक कार्यों से जुड़ी है और जरूरी नहीं कि यह उनसे संबंधित व्यक्तिगत अपराधिक कृत्यों तक भी लागू हो.

2023 के अधिनियम की धारा 16 क्या कहती है?

मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम 2023, चीफ इलेक्शन कमिश्नर और दूसरे चुनाव आयुक्त को कानूनी सुरक्षा देता है.

धारा 16 में कहा गया है कि अदालतें मुख्य चुनाव आयुक्त या फिर चुनाव आयुक्तों के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए किए गए किसी भी काम या फिर दिए गए बयान के लिए दीवानी या फिर आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती हैं. कानून के मुताबिक यह सुरक्षा पूर्व चुनाव आयुक्तों पर भी लागू होती है, जब वे अपना पद छोड़ देते हैं.

इस प्रावधान का उद्देश्य चुनाव आयुक्तों को उनकी आधिकारिक जिम्मेदारियों के दौरान लिए गए फसलों से संबंधित कानूनी कार्यवाही से बचाना है. इन जिम्मेदारियों में चुनाव प्रशासन और चुनाव आयोग को सौंपे गए दूसरे काम भी शामिल हैं.

क्या पुलिस आधिकारिक फसलों के लिए चीफ इलेक्शन कमिश्नर को गिरफ्तार कर सकती है?

धारा 16 के तहत कानूनी सुरक्षा आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े काम और बयान से संबंधित है. इस वजह से चुनाव आयोग की प्रशासनिक जिम्मेदारियों के हिस्से के रूप में लिए गए फैसले कानून में बताई गई सुरक्षा के दायरे में ही आते हैं.

इन जिम्मेदारियों में चुनाव का प्रबंधन करना, राजनीतिक दलों से जुड़े फैसले लेना और मतदाता सूची में संशोधन करना शामिल हो सकता है. कानून के मुताबिक धारा 16 की सुरक्षा के तहत ऐसे आधिकारिक कार्यों के संबंध में चीफ इलेक्शन कमिश्नर के खिलाफ पुलिस कार्यवाही नहीं की जा सकती.

जानकारी में बताए गए कानूनी विशेषज्ञों का यह तर्क है कि क्योंकि अदालतें इस प्रावधान के दायरे में आने वाले मामलों का संज्ञान नहीं ले सकती हैं इस वजह से संरक्षित आधिकारिक आचरण के संबंध में गिरफ्तारी कानूनी रूप से संभव नहीं होगी.

मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?

पुलिस या फिर सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे पद से नहीं हटा सकती है. भारत का संविधान मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए एक खास प्रक्रिया बताता है.

अनुच्छेद 324 (5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जिससे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है. इसमें पुलिस या फिर एग्जीक्यूटिव की सीधी कार्रवाई के बजाय संसदीय कार्यवाही शामिल होती है.

हटाने का प्रस्ताव संसद के लोकसभा और राज्यसभा सदनों से पास होना चाहिए. इस प्रस्ताव के लिए खास बहुमत की जरूरत होती है जिसमें हर सदन में मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों का दो तिहाई बहुमत शामिल होना चाहिए. इससे हटाने की प्रक्रिया संवैधानिक रूप से मुश्किल हो जाती है और इसके लिए काफी संसदीय समर्थन की जरूरत होती है.

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क्या गिरफ्तारी पूरी तरह से नामुमकिन है?

चुनाव आयुक्त को मिलने वाली सुरक्षा उनके आधिकारिक का कामकाज से जुड़ी होती है. इसका मतलब यह नहीं होता कि इस पद पर बैठे व्यक्ति को किसी भी तरह की आपराधिक जांच या फिर कानूनी कार्रवाई से छूट मिली हुई है.

अगर कोई भी व्यक्ति अपनी निजी हैसियत से कोई गंभीर अपराध करता है जैसे की हत्या या फिर आधिकारिक जिम्मेदारियों से अलग भ्रष्टाचार तो स्थिति काफी अलग हो सकती है. ऐसे मामलों पर चुनाव आयोग की ड्यूटी निभाते समय लिए गए फैसलों से अलग हटकर विचार करना होगा. इस वजह से आधिकारिक हैसियत से किए गए काम और उन जिम्मेदारियों से अलग किए गए अपराधों के बीच फर्क है.

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