सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा DGP चयन में राज्य सरकार से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के नए पुलिस महानिदेशक के चयन को लेकर राज्य सरकार से कठोर प्रश्न उठाए, जिसमें CBI द्वारा दर्ज FIR के बाद वरिष्ठ आयपीएस अधिकारी सुशांत कुमार नाथ का नाम UPSC को भेजे जाने का कारण पूछा गया। अदालत ने नाथ के अखंडता प्रमाणपत्र की वापसी और दो अस्थायी DGP पदों पर किए गए प्रोन्नतियों की वैधता पर भी स्पष्टीकरण माँगा, जबकि सरकार ने अगली सुनवाई में विस्तृत उत्तर देने का आश्वासन दिया।

सौजन्य से:- Jagran
झारखंड में बाद ओडिशा में भी डीजीपी चयन पर विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के नए पुलिस महानिदेशक (DGP) के चयन विवाद में राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं। ...और पढ़ें
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा डीजीपी चयन पर राज्य सरकार से सवाल पूछे।
- सीबीआई एफआईआर के बावजूद सुसांत नाथ का नाम भेजने पर स्पष्टीकरण मांगा।
- अखंडता प्रमाणपत्र और नए डीजीपी पदों पर भी विवाद गहराया।
जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर। ओडिशा के नए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के चयन को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं। अदालत ने जानना चाहा कि जब पुलिस सब-इंस्पेक्टर (एसआई) भर्ती अनियमितता मामले में सीबीआई नवंबर 2025 में एफआइआर दर्ज कर चुकी थी, तब मई 2026 में वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी सुसांत कुमार नाथ का नाम डीजीपी चयन के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को क्यों भेजा गया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या राज्य सरकार को उस समय सीबीआई जांच और नाथ से संभावित पूछताछ की जानकारी थी। यदि जानकारी थी तो क्या यह तथ्य यूपीएससी को बताया गया था।
सुनवाई के दौरान नाथ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि सीबीआई की एफआइआर में नाथ आरोपी नहीं हैं। उन्होंने बताया कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान नाथ ओडिशा पुलिस भर्ती बोर्ड (ओपीआरबी) के पदेन अध्यक्ष थे। सीबीआई ने अब तक उनसे पूछताछ की अनुमति भी नहीं मांगी है, हालांकि भविष्य में ऐसा हो सकता है।
नंदी ने नाथ के 32 वर्षों के निष्कलंक सेवा रिकॉर्ड का भी हवाला दिया। न्यायमूर्ति बागची ने राज्य सरकार से पूछा कि नवंबर 2025 में एफआइआर दर्ज होने के बावजूद मई 2026 में नाथ का नाम यूपीएससी को भेजने का आधार क्या था। इस पर ओडिशा के महाधिवक्ता पीतांबर आचार्य ने कहा कि राज्य सरकार अगली सुनवाई में विस्तृत जवाब देगी।
अखंडता प्रमाणपत्र पर भी उठे सवाल
मामले में नाथ के अखंडता प्रमाणपत्र (इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट) को लेकर भी विवाद गहराता जा रहा है। राज्य सरकार ने पहले प्रमाणपत्र जारी किया था, लेकिन बाद में सीबीआई के पत्राचार के बाद इसे वापस लेने अथवा रोकने की कार्रवाई की गई।
अमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन ने अदालत से कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि एक पात्र अधिकारी का अखंडता प्रमाणपत्र किन परिस्थितियों में रोका गया। उन्होंने इस संबंध में राज्य सरकार से हलफनामा लेने का सुझाव दिया।
दो नए डीजीपी स्तर के पदों पर भी विवाद
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार द्वारा बनाए गए दो अस्थायी एक्स-कैडर डीजीपी स्तर के पद भी चर्चा में रहे। मूल पात्रता सूची 14 मई 2026 को यूपीएससी को भेजी गई थी। इसके बाद एडीजी स्तर के अधिकारी संजिब पंडा और वाई.के. जेठवा को डीजीपी स्तर पर पदोन्नत किया गया।
पदोन्नति के बाद दोनों अधिकारी डीजीपी चयन प्रक्रिया के लिए पात्र हो गए। अमिकस क्यूरी ने सूची में बाद में किए गए बदलावों और पदोन्नतियों के समय पर सवाल उठाए।
याचिकाकर्ता ने लगाया मिलीभगत का आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच पूर्व नियोजित मिलीभगत का आरोप लगाया। उनका कहना था कि नाथ का अखंडता प्रमाणपत्र ऐसे सीबीआई पत्र के आधार पर वापस लिया गया, जिसमें केवल भविष्य में पूछताछ की संभावना जताई गई थी।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि डीजीपी स्तर के अधिकारियों की कमी थी तो बाद में कनिष्ठ अधिकारियों को पदोन्नत कर चयन प्रक्रिया में शामिल करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों पर अभी कोई अंतिम टिप्पणी या निष्कर्ष नहीं दिया है।
अमिकस और महाधिवक्ता में तीखी बहस
सुनवाई के दौरान अमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन और महाधिवक्ता पीतांबर आचार्य के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई। अमिकस की भूमिका पर टिप्पणी किए जाने पर रामचंद्रन ने आपत्ति जताई। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि इस तरह की टिप्पणियां अदालत को अमिकस की सहायता से वंचित कर सकती हैं।
राज्य सरकार के जवाब पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से पूरे घटनाक्रम पर स्पष्ट जवाब देने को कहा है। अब अदालत के सामने प्रमुख प्रश्न यह है कि सीबीआई की एफआइआर की जानकारी राज्य सरकार को कब थी, नाथ का नाम यूपीएससी को भेजते समय सरकार के पास क्या जानकारी उपलब्ध थी।
बाद में उनका अखंडता प्रमाणपत्र रोकने अथवा वापस लेने का आधार क्या था। मामले की अगली सुनवाई में राज्य सरकार का पक्ष सामने आने के बाद आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
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