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सुप्रीम कोर्ट ने मां को बच्चों को यूके ले जाने की मंजूरी, करियर के अधिकार को मान्यता

सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को उलटते हुए मां को दोनों बच्चों को यूके ले जाकर वहाँ की स्कूलों में दाखिला कराने की अनुमति दी, साथ ही छह सप्ताह में स्कूलिंग की जानकारी हलफनामे में दर्ज करने को कहा। अदालत ने मां के करियर को बच्चों के भविष्य के प्रयास के रूप में माना और बच्चों की इच्छाओं तथा पैरेंटल एलाइनमेंट के प्रभाव को भी ध्यान में रखा। यह अंतरिम आदेश जनवरी 2027 में आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

24 सितंबर 2026 को 11:05 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने मां को बच्चों को यूके ले जाने की मंजूरी, करियर के अधिकार को मान्यता

सौजन्य से:- Navbharat Times

मां के दिल की नहीं सुनी गई, न फैमिली कोर्ट में न हाई कोर्ट में

इन मामले मां ने 2018 में वैवाहिक घर छोड़ा था और इसके बाद बच्चों की देखभाल उसके पास ही रही। मां ने आईआईटी जोधपुर, वीआईटी विजयवाड़ा और बेंगलुरु में शिक्षक के पदों पर काम करने के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ हॉल, यूके में लेक्चरर की नौकरी हासिल की थी। बच्चों की कस्टडी का विवाद होने पर फैमिली कोर्ट ने 1 जुलाई 2024 को पिता को बच्चों का एकमात्र संरक्षक घोषित किया था और मां को मिलने का अधिकार और अंतरिम कस्टडी दी थी। फिर दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और मां की ब्रिटेन जाकर रहने की मांग भी स्वीकार नहीं की। इसके बाद मां ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां अपीलों पर 2026 में सुनवाई हुई।सुप्रीम सुनवाई और मां के हक में फैसला

- जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने बच्चों से व्यक्तिगत बातचीत और बाद की मुलाक़ात की व्यवस्था को भी अपने निर्णय में महत्वपूर्ण माना।

- निचली अदालतों ने मां द्वारा अलग-अलग स्थानों पर नौकरी करने और रहने को बच्चों की स्थिरता के संदर्भ में देखा। सुप्रीम कोर्ट ने इससे असहमति जताते हुए कहा कि मां का काम तलाशना उसके करियर को स्थापित करने और बच्चों के लिए बेहतर भविष्य तय करने के प्रयास के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

- सुप्रीम कोर्ट ने मां को फिलहाल दोनों बच्चों को UK ले जाने और वहां अच्छे स्कूल में दाखिला कराने की अनुमति दी। ऐसे में मां को छह सप्ताह के भीतर बच्चों की स्कूलिंग की जानकारी हलफनामे के जरिए रिकॉर्ड पर रखने को कहा गया है। उसे यह वादा करना होगा कि किसी सक्षम अदालत के निर्देश पर वह बच्चों को पेश भी करेगी।

- फैसला बच्चों के कल्याण, प्राथमिक देखभालकर्ता, माता-पिता का अलगाव और हिरासत के सवालों पर आधारित है। इससे जुड़ी अपीलों को जनवरी 2027 में आगे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

बच्चों की इच्छा और ‘Parental Alienation’ भी बनी अहम कड़ी

दरअसल मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में माता-पिता और दोनों बच्चों से निजी चैंबर में बातचीत की थी। आदेश के अनुसार बेटे ने पिता के साथ रहने को लेकर बेहद अनिच्छा दिखाई और कोर्ट ने उसकी प्रतिक्रिया को अपने विचार में शामिल किया। बाद में मई 2026 में पिता के लिए मुलाक़ात की व्यवस्था की गई, जिसके दौरान भी बच्चों के व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को काउंसर की रिपोर्ट के जरिए रिकॉर्ड किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लंबे समय से चल रहे विवाद और मुकदमों ने बच्चों को दोनों माता-पिता से प्रभावित किया है।'सलवार खींचना, ब्रेस्ट दबाना रेप की कोशिश नहीं !' पटना HC के विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का Suo Motu एक्शन, होगी सुनवाई

शीर्ष अदालत के नजरिए और फैसले की बड़ी बातें

- दरअसल, इस केस D v. S, 2026 INSC 1043 के फैसले का मुख्य संदेश यह है कि बच्चे की कस्टडी के मामलों में माता-पिता के पेशेवर करियर या स्थान बदलने को बच्चों के कल्याण से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

- सुप्रीम कोर्ट ने मां के लगातार रोजगार प्रयासों को अस्थिर जीवन शैली का प्रमाण मानने के बजाय मामले की वास्तविक परिस्थितियों, बच्चों के साथ उनकी देखभाल का रिश्ता, बच्चों की प्रतिक्रियाओं और उपलब्ध भविष्य की व्यवस्था को ज्यादा महत्व दिया।

- साथ ही कोर्ट ने विदेश में बसने को बच्चों के सांस्कृतिक मूल्यों के नुकसान का आधार मानने से इनकार किया। मामले में यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह आदेश फिलहाल परिस्थितियों के आधार पर दिया गया है और मामले की आगे सुनवाई जनवरी 2027 में होनी है।

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