'बंधक हाथियों की उचित देखभाल हों': शीर्ष अदालत ने क्यों कहा- उनके प्रति दैवीय सम्मान का भाव भी रखा जाना चाहिए
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सौजन्य से:- Amar Ujala
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'बंधक हाथियों की उचित देखभाल हों': शीर्ष अदालत ने क्यों कहा- उनके प्रति दैवीय सम्मान का भाव भी रखा जाना चाहिए
Tue, 18 Aug 2026 07:15 PM IST
Pavan
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Tue, 18 Aug 2026 07:15 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में कैद हाथियों की बेहतर देखभाल और नियमित स्वास्थ्य जांच के निर्देश दिए। कोर्ट ने केंद्र को विशेष एलीफेंट क्लीनिक, मेडिकल रिकॉर्ड और न्यूनतम देखभाल मानक तय करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाथियों के प्रति दिव्यता का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन का भी ध्यान रखा जाए।
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विस्तार
देश के सर्वोच्च अदालत ने देश भर में कैद या पालतू हाथियों के रखरखाव और स्वास्थ्य को लेकर मंगलवार को सख्त निर्देश दिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ एक एनजीओ की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह यह तय करने नहीं बैठा है कि मंदिरों में हाथी रखना धार्मिक अधिकार है या नहीं। उसका मुख्य उद्देश्य हाथियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर रखरखाव सुनिश्चित करना है।
यह भी पढ़ें- Supreme Court: पेपर लीक के आरोपियों की संपत्ति जब्त करने की मांग, शीर्ष अदालत ने केंद्र-राज्यों से मांगा जवाब
हाथियों के लिए विशेष क्लीनिक बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि देश में कैद हाथियों के लिए विशेष सुविधाओं वाले एलीफेंट क्लीनिक स्थापित करने की प्रभावी और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए। इन हाथियों के मालिकों के लिए समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना अनिवार्य किया जाए। कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक बंधक हाथी का उचित मेडिकल रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए। अगर किसी हाथी को इलाज की जरूरत है तो उसे नियमित रूप से उपचार उपलब्ध कराया जाए। निगरानी समिति को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि इन निर्देशों का पालन हो। अदालत ने कहा कि निजी व्यक्ति, मंदिर, वन विभाग, चिड़ियाघर और पुनर्वास केंद्र; सभी जगह रखे गए हाथियों के लिए बेहतर देखभाल की व्यवस्था होनी चाहिए।
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देशभर में कुल 2,725 बंधक हाथी
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट में 25 फरवरी के कार्यालय ज्ञापन को पेश किया। इसमें बंधक एलिफेंट्स हेल्थकेयर एंड वेलफेयर कमेटी की कार्यवाही का विवरण दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कैद हाथियों की संख्या बढ़कर 2,725 हो गई है। इनमें-
एनजीओ ने हाथियों के शोषण का मुद्दा उठाया
याचिकाकर्ता एनजीओ वाइल्डलाइफ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने कहा कि करीब 2019 से अब तक लगभग 300 हाथियों को कैद में लाया गया, जबकि करीब 200 हाथियों की मौत हो गई। उन्होंने कहा कि याचिका का उद्देश्य धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करना नहीं है। एनजीओ का मुख्य मुद्दा कैद हाथियों के साथ होने वाली शारीरिक प्रताड़ना है। उन्होंने खास तौर पर धार्मिक जुलूसों, व्यावसायिक गतिविधियों और भीख मंगवाने जैसे कामों में इस्तेमाल किए जाने वाले हाथियों की स्थिति पर चिंता जताई।
केरल के मंदिरों में हाथियों के इस्तेमाल का मुद्दा
केरल के मंदिर प्रबंधन से जुड़े निकायों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि राज्य में मंदिरों के हाथियों की अच्छी देखभाल की जाती है। उन्होंने बताया कि हाथियों को रेडियो टैग भी किया जाता है, जिससे उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। उन्होंने कहा कि हाथियों के स्वास्थ्य और रखरखाव से जुड़े नियम काफी सख्त हैं और उनका पालन किया जाता है। मंदिरों के त्योहारों में हाथियों का इस्तेमाल केरल की धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पर एनजीओ की ओर से आपत्ति जताई गई और कहा गया कि धार्मिक आयोजनों में इस्तेमाल होने वाले कई हाथी निजी लोगों के स्वामित्व में होते हैं। त्योहार खत्म होने के बाद उन्हें वापस उनके मालिकों के पास भेज दिया जाता है।
डीएनए प्रोफाइलिंग पर भी मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से देश के सभी बंधक हाथियों की डीएनए प्रोफाइलिंग की स्थिति पर भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने पूछा कि क्या निजी लोगों के पास मौजूद हाथियों से लेकर पुनर्वास केंद्रों में रखे गए हाथियों तक सभी की डीएनए प्रोफाइलिंग पूरी हो चुकी है और क्या इसका रिकॉर्ड डेटाबेस में अपडेट किया गया है। अदालत ने बंधक एलिफेंट्स हेल्थकेयर एंड वेलफेयर कमेटी को भी रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। समिति को हाथियों के आवास और रखरखाव के लिए न्यूनतम मानक तैयार करने को कहा गया है।
नए हाथियों को कैद में रखने पर पूरी रोक से कोर्ट का इनकार
एनजीओ ने मांग की थी कि भविष्य में किसी भी नए हाथी को कैद में नहीं रखा जाना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल के चाय बागानों जैसे इलाकों में अक्सर हाथी के बच्चे मिलते हैं। ऐसे बच्चे कई बार जंगल में भी पाए जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि हर नए हाथी को कैद में रखने पर पूरी तरह रोक लगाने से कई परिस्थितियों में खुद जानवर के हित प्रभावित हो सकते हैं।
यह भी पढ़ें- दाभोलकर हत्याकांड: हाई कोर्ट ने दूसरे आरोपी सचिन अंदुरे को दी जमानत, अप्रैल में पहले हत्यारोपी को मिली थी बेल
बिना दस्तावेज के हाथियों का परिवहन नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने बंधक हाथियों के परिवहन को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि हाथियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर तभी ले जाया जा सकेगा, जब संबंधित नियमों के अनुसार इसका पूरा दस्तावेजी रिकॉर्ड मौजूद हो। दस्तावेज में हाथी के स्थानांतरण की पूरी जानकारी और उसे ले जाने का उद्देश्य दर्ज होना जरूरी होगा। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक आस्था और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। मंदिरों या अन्य स्थानों पर हाथियों के इस्तेमाल को लेकर धार्मिक अधिकारों पर फैसला किए बिना भी यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि हाथियों के साथ उचित व्यवहार हो और उनके स्वास्थ्य व सुरक्षा से समझौता न किया जाए।
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हाथियों के लिए विशेष क्लीनिक बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि देश में कैद हाथियों के लिए विशेष सुविधाओं वाले एलीफेंट क्लीनिक स्थापित करने की प्रभावी और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए। इन हाथियों के मालिकों के लिए समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना अनिवार्य किया जाए। कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक बंधक हाथी का उचित मेडिकल रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए। अगर किसी हाथी को इलाज की जरूरत है तो उसे नियमित रूप से उपचार उपलब्ध कराया जाए। निगरानी समिति को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि इन निर्देशों का पालन हो। अदालत ने कहा कि निजी व्यक्ति, मंदिर, वन विभाग, चिड़ियाघर और पुनर्वास केंद्र; सभी जगह रखे गए हाथियों के लिए बेहतर देखभाल की व्यवस्था होनी चाहिए।
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देशभर में कुल 2,725 बंधक हाथी
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट में 25 फरवरी के कार्यालय ज्ञापन को पेश किया। इसमें बंधक एलिफेंट्स हेल्थकेयर एंड वेलफेयर कमेटी की कार्यवाही का विवरण दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कैद हाथियों की संख्या बढ़कर 2,725 हो गई है। इनमें-
- 1,678 हाथी निजी लोगों के पास हैं।
- 47 हाथी सर्कस में हैं।
- 96 हाथी मंदिरों में हैं।
- 768 हाथी वन विभागों के पास हैं।
- 63 हाथी चिड़ियाघरों में हैं।
- 332 हाथी पुनर्वास केंद्रों में हैं।
एनजीओ ने हाथियों के शोषण का मुद्दा उठाया
याचिकाकर्ता एनजीओ वाइल्डलाइफ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने कहा कि करीब 2019 से अब तक लगभग 300 हाथियों को कैद में लाया गया, जबकि करीब 200 हाथियों की मौत हो गई। उन्होंने कहा कि याचिका का उद्देश्य धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करना नहीं है। एनजीओ का मुख्य मुद्दा कैद हाथियों के साथ होने वाली शारीरिक प्रताड़ना है। उन्होंने खास तौर पर धार्मिक जुलूसों, व्यावसायिक गतिविधियों और भीख मंगवाने जैसे कामों में इस्तेमाल किए जाने वाले हाथियों की स्थिति पर चिंता जताई।
केरल के मंदिरों में हाथियों के इस्तेमाल का मुद्दा
केरल के मंदिर प्रबंधन से जुड़े निकायों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि राज्य में मंदिरों के हाथियों की अच्छी देखभाल की जाती है। उन्होंने बताया कि हाथियों को रेडियो टैग भी किया जाता है, जिससे उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। उन्होंने कहा कि हाथियों के स्वास्थ्य और रखरखाव से जुड़े नियम काफी सख्त हैं और उनका पालन किया जाता है। मंदिरों के त्योहारों में हाथियों का इस्तेमाल केरल की धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पर एनजीओ की ओर से आपत्ति जताई गई और कहा गया कि धार्मिक आयोजनों में इस्तेमाल होने वाले कई हाथी निजी लोगों के स्वामित्व में होते हैं। त्योहार खत्म होने के बाद उन्हें वापस उनके मालिकों के पास भेज दिया जाता है।
डीएनए प्रोफाइलिंग पर भी मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से देश के सभी बंधक हाथियों की डीएनए प्रोफाइलिंग की स्थिति पर भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने पूछा कि क्या निजी लोगों के पास मौजूद हाथियों से लेकर पुनर्वास केंद्रों में रखे गए हाथियों तक सभी की डीएनए प्रोफाइलिंग पूरी हो चुकी है और क्या इसका रिकॉर्ड डेटाबेस में अपडेट किया गया है। अदालत ने बंधक एलिफेंट्स हेल्थकेयर एंड वेलफेयर कमेटी को भी रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। समिति को हाथियों के आवास और रखरखाव के लिए न्यूनतम मानक तैयार करने को कहा गया है।
नए हाथियों को कैद में रखने पर पूरी रोक से कोर्ट का इनकार
एनजीओ ने मांग की थी कि भविष्य में किसी भी नए हाथी को कैद में नहीं रखा जाना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल के चाय बागानों जैसे इलाकों में अक्सर हाथी के बच्चे मिलते हैं। ऐसे बच्चे कई बार जंगल में भी पाए जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि हर नए हाथी को कैद में रखने पर पूरी तरह रोक लगाने से कई परिस्थितियों में खुद जानवर के हित प्रभावित हो सकते हैं।
यह भी पढ़ें- दाभोलकर हत्याकांड: हाई कोर्ट ने दूसरे आरोपी सचिन अंदुरे को दी जमानत, अप्रैल में पहले हत्यारोपी को मिली थी बेल
बिना दस्तावेज के हाथियों का परिवहन नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने बंधक हाथियों के परिवहन को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि हाथियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर तभी ले जाया जा सकेगा, जब संबंधित नियमों के अनुसार इसका पूरा दस्तावेजी रिकॉर्ड मौजूद हो। दस्तावेज में हाथी के स्थानांतरण की पूरी जानकारी और उसे ले जाने का उद्देश्य दर्ज होना जरूरी होगा। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक आस्था और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। मंदिरों या अन्य स्थानों पर हाथियों के इस्तेमाल को लेकर धार्मिक अधिकारों पर फैसला किए बिना भी यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि हाथियों के साथ उचित व्यवहार हो और उनके स्वास्थ्य व सुरक्षा से समझौता न किया जाए।
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