नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने के लिए तैयार है सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हत्या के आरोपी नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है, यदि कानून में दिए गए सुरक्षात्मक उपाय संतुष्ट होते हैं। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आज के बच्चे कम उम्र में ही जटिल, हिंसक व अश्लील सामग्री और वयस्कों जैसे अनुभवों के संपर्क में आ रहे हैं।

सौजन्य से:- ETV Bharat
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हत्या के आरोपी नाबालिग पर वयस्क की तरह चल सकता है केस
पीठ ने ये टिप्पणियां एक किशोर की उस अपील को खारिज करते हुए कीं, जो पटना हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की थी.
By Sumit Saxena
Published : July 21, 2026 at 8:48 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को व्यवस्था दी कि हत्या के आरोपी एक किशोर (जुवेनाइल) पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है, यदि कानून में दिए गए सुरक्षात्मक उपाय संतुष्ट होते हैं. क्योंकि किशोर न्याय कानून के तहत ऐसा अपराध एक "जघन्य अपराध" है.
शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आज के बच्चे कम उम्र में ही जटिल, हिंसक व अश्लील सामग्री और वयस्कों जैसे अनुभवों के संपर्क में आ रहे हैं. ये ऐसे बदलाव हैं जो मुख्य रूप से तकनीक और सोशल मीडिया के कारण आए हैं, जिन्होंने उनके संज्ञानात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास को बदल दिया है. कोर्ट ने आगे कहा कि अदालतों और किशोर बोर्डों को पुरानी प्रक्रियाओं से चिपके रहने के बजाय एक संतुलित और प्रगतिशील दृष्टिकोण के साथ इस वास्तविकता का जवाब देना चाहिए.
यह फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने सुनाया. पीठ ने इस बात पर विचार किया कि क्या ऐसा अपराध जिसके लिए "मृत्युदंड या आजीवन कारावास" की सजा का प्रावधान है, उसे किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (जेजे एक्ट) की धारा 2(54) के तहत "अधिकतम सात वर्ष से अधिक की अवधि के लिए कारावास, लेकिन कोई न्यूनतम कारावास नहीं" वाक्यांश के अंतर्गत आने वाला अपराध कहा जा सकता है?
पीठ ने इस बात पर भी विचार किया कि किशोर न्याय बोर्ड को जेजे एक्ट की धारा 15 के तहत प्रारंभिक मूल्यांकन करते समय किस सामग्री और अन्य कारकों को ध्यान में रखना चाहिए? फैसले में व्यवस्था दी गई कि हत्या को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत एक "जघन्य अपराध" (हेनियस ऑफेंस) के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए.
किशोर के वकील ने दलील दी कि चूंकि आईपीसी की धारा 302 में "मृत्युदंड या आजीवन कारावास" की सजा का प्रावधान है, लेकिन इसमें स्पष्ट रूप से "न्यूनतम" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है, इसलिए हत्या को "जघन्य" के बजाय "गंभीर अपराध" की श्रेणी में रखा जाना चाहिए. पीठ ने कहा, "हमारा यह सुविचारित मत है कि अपीलकर्ता की ओर से विद्वान वकील द्वारा रखा गया तर्क पूरी तरह से गलत, योग्यताहीन, अकल्पनीय है और इसे शुरुआत में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए."
पीठ ने कहा कि उसे यह स्वीकार करना होगा कि आज के बच्चे कम उम्र में ही ऐसी जटिल जानकारियों, हिंसक व अश्लील सामग्री और वयस्कों जैसे अनुभवों के संपर्क में आ रहे हैं, जो पिछली पीढ़ियों की पहुंच से बाहर थे. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि तकनीक के तेजी से प्रसार और सोशल मीडिया के व्यापक प्रभाव ने निस्संदेह बच्चों के संज्ञानात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास को बदल दिया है.
पीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में, अदालतों को एक जीवित संस्था के रूप में इस वास्तविकता के प्रति संवेदनशील होना चाहिए. कानून के उल्लंघन में शामिल बच्चे से निपटने के दौरान अदालतों या किशोर न्याय बोर्डों का दृष्टिकोण तब से स्थिर नहीं रह सकता, जब से यह कानून लागू हुआ है. पीठ ने कहा कि जुवेनाइल के बदलते स्वभाव और समाज की जायज मांगों के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना बेहद जरूरी है.
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी अपराध के लिए न्यूनतम सजा सात वर्ष या उससे अधिक है, तो वह अपराध सीधे तौर पर जेजे एक्ट (JJ Act) की धारा 2(33) के तहत जघन्य अपराध (हेनियस ऑफेंस) की श्रेणी में आता है. पीठ ने कहा कि उसे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि धारा 302 के तहत दंडनीय अपराध को उन अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जिनमें जेजे एक्ट की धारा 2(54) के तहत "गंभीर अपराध" की परिभाषा के अंतर्गत कोई न्यूनतम सजा तय नहीं की गई है.
पीठ ने ये टिप्पणियां एक किशोर की उस अपील को खारिज करते हुए कीं, जो पटना हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी. पटना हाई कोर्ट ने एक लड़के की हत्या के मामले में उस किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी. पीठ ने यह फैसला बिहार में एक लड़के का गला रेतकर कथित तौर पर हत्या करने वाले 16 साल के एक किशोर (जुवेनाइल) की अपील पर सुनाया.
हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि अपीलकर्ता पर एक वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाना चाहिए और इसी के तहत किशोर न्याय बोर्ड (जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड) को इस मामले की सुनवाई एक नियमित अदालत (रेगुलर कोर्ट) में ट्रांसफर करने का निर्देश दिया था.
शीर्ष अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से अनिवार्य होने के कारण, हत्या के लिए न्यूनतम सजा आजीवन कारावास ही है, क्योंकि अदालतें धारा 302 के तहत दोषी पाए जाने पर आजीवन कारावास से कम की सजा नहीं दे सकती हैं. शीर्ष अदालत ने कहा, "आईपीसी की धारा 302 के तहत दंडनीय अपराध, जिसमें 'मृत्युदंड या आजीवन कारावास' की सजा का प्रावधान है, उसमें आजीवन कारावास ही न्यूनतम सजा है. इसलिए, इसे 'जघन्य अपराध' की श्रेणी में रखा जाएगा."
शुरुआत में, किशोर न्याय बोर्ड ने फैसला किया था कि बच्चे पर खुद बोर्ड द्वारा ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए, लेकिन अपीलीय सत्र अदालत ने उस फैसले को पलट दिया. बाद में हाई कोर्ट ने भी किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने के इस फैसले को बरकरार रखा था.
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