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MSME कारोबारों के लिए बड़ी राहत, संशोधित कानून लागू होने से भुगतान में देरी की समस्या खत्म होगी

संसद से पारित MSME संशोधन बिल के साथ, छोटे और मध्यम कारोबारों के लिए कारोबार का रजिस्ट्रेशन मुफ्त और स्वैच्छिक होने जा रहा है. इसके अलावा, वर्किंग कैपिटल तक पहुंच आसान होगी और विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता प्रक्रिया की भी शुरुआत होगी. यह संशोधन भारत में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और रोजगार पैदा करने में मदद करेगा.

8 अगस्त 2026 को 09:15 am बजे
MSME कारोबारों के लिए बड़ी राहत, संशोधित कानून लागू होने से भुगतान में देरी की समस्या खत्म होगी

सौजन्य से:- ThePrint Hindi

नई दिल्ली: राज्यसभा द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित किए जाने के कुछ दिनों बाद, लोकसभा ने भी शुक्रवार को नए कानून को मंजूरी दे दी. इसका उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम कारोबारों के लिए मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था और भुगतान व्यवस्था में सुधार करना है.

कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों ने दिप्रिंट को बताया कि यह बिल मूल रूप से दो दशक से ज्यादा पुराने 2006 के कानून में नए बदलाव करके MSME से जुड़े पुराने कानून को बेहतर बनाने की कोशिश करता है. इनमें डेवलपमेंट कमिश्नर की नियुक्ति और TReDS सिस्टम की शुरुआत शामिल है. TReDS का मतलब Trade Receivables Discounting System है. यह भारत में आरबीआई द्वारा नियंत्रित एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म है, जिसका उद्देश्य MSMEs को अपने बकाया व्यापारिक बिलों को नकद में बदलने में मदद करना है.

छोटे और मध्यम कारोबारों के लिए प्रस्तावित बदलाव तीन मुख्य क्षेत्रों में अंतर ला सकते हैं. इनमें कारोबार का रजिस्ट्रेशन, वर्किंग कैपिटल तक पहुंच और विवादों को सुलझाने के वैकल्पिक तरीके शामिल हैं. विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के सौरभ रॉय ने दिप्रिंट को यह जानकारी दी.

नए कानून का व्यापक उद्देश्य MSMEs को भुगतान में होने वाली देरी की समस्या को दूर करना और विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया को आसान बनाना है. इसके साथ ही, इसमें यह भी जरूरी किया गया है कि विवादों में मध्यस्थता की प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी हो. अगर कोई अपील छह महीने से ज्यादा समय तक लंबित रहती है, तो अदालतों को विवाद की रकम का 50 प्रतिशत MSMEs को जारी करना होगा.

करीब 20 साल पहले केंद्र ने 2006 का कानून इस उम्मीद के साथ बनाया था कि इससे MSMEs को बढ़ावा देने, उनके विकास और उनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी.

बिल में कहा गया है कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम आर्थिक विकास के मुख्य चालक हैं, रोजगार पैदा करते हैं और नए प्रयोगों को बढ़ावा देते हैं. ये कारोबार भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP), निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं.

नए कानून में क्या बदलाव होंगे?

2026 के संशोधन से होने वाले बड़े बदलावों में से एक सूक्ष्म, लघु और मध्यम कारोबारों का रजिस्ट्रेशन मुफ्त और स्वैच्छिक करना है. रॉय ने कहा कि प्रस्तावित व्यवस्था में पुराने तरीके से भी हटने की कोशिश की गई है, जिसमें नियमों के उल्लंघन को मुख्य रूप से आपराधिक न्याय व्यवस्था के जरिए देखा जाता था और अदालतों में राहत मांगी जाती थी.

हालांकि, अब नए कानून के तहत उल्लंघन, जैसे नियमों का पालन करने में विफल रहना या रजिस्ट्रेशन के समय जानबूझकर गलत जानकारी देना, प्रशासनिक प्राधिकरण की जांच के बाद मौद्रिक जुर्माने के दायरे में आएगा.

दिप्रिंट से बात करते हुए रॉय ने कहा, “इन बदलावों से Trade Receivables Discounting System (TReDS) के जरिए MSMEs के कैश फ्लो में भी सुधार हो सकता है. यह RBI द्वारा नियंत्रित एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म है, जिसके जरिए कारोबार बकाया बिलों को डिस्काउंट कर सकते हैं और उनके बदले फंड जुटा सकते हैं.”

रॉय ने समझाया, “कई बार जब ऐसे कारोबार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के साथ काम कर रहे होते हैं, तो उनके बिल अटक जाते हैं और उन्हें वर्किंग कैपिटल जुटाने में भी परेशानी होती है.” उन्होंने कहा कि नया बिल धारा 15A के तहत एक पोर्टल पर आधारित व्यवस्था बनाता है, जिसके जरिए MSMEs अंतिम भुगतान की मंजूरी का इंतजार किए बिना अपनी कारोबारी गतिविधियां जारी रख सकते हैं.

इस बात को एक उदाहरण से समझाते हुए उन्होंने कहा, “मान लीजिए मैंने किसी PSU को सामान सप्लाई किया है, जिसने TReDS सिस्टम पर एक बिल अपलोड किया है. मेरे मौजूदा बिलों से पता चलता है कि मुझे पैसे मिलने हैं, इसलिए अब मैं उस बकाया रकम के आधार पर ज्यादा क्रेडिट का दावा कर सकता हूं, क्योंकि पोर्टल दिखाता है कि मेरे खाते में कुछ रकम है. फिलहाल MSMEs को वर्किंग कैपिटल जुटाने में परेशानी होती है, इसलिए इससे उन्हें बहुत मदद मिलती है.” उन्होंने कहा कि यह प्रावधान MSMEs के लिए काफी मददगार होगा.

इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलावों में से एक डेवलपमेंट कमिश्नर की नियुक्ति है. विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के चर्खा (Vidhi Centre for Legal Policy) की सीनियर रेजिडेंट फेलो मयूरी गुप्ता ने दिप्रिंट को बताया कि यह अधिकारी MSMEs और राज्य के बीच एक समर्पित संपर्क के रूप में काम करेगा.

डेवलपमेंट कमिश्नर की भूमिका

नए कानून में बार-बार जिस अधिकारी का जिक्र किया गया है, वह “डेवलपमेंट कमिश्नर” है. धारा 2 (da) के तहत इसे MSME मंत्रालय के भीतर डेवलपमेंट कमिश्नर के कार्यालय के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में परिभाषित किया गया है.

मुख्य रूप से, कमिश्नर के कामों में जुर्माना और आर्थिक दंड लगाने के लिए निर्णायक प्राधिकारी के रूप में काम करना शामिल है.

गुप्ता ने दिप्रिंट को बताया, “बिल में सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलावों में से एक डेवलपमेंट ऑफिसर की नियुक्ति है, जो MSMEs और राज्य के बीच एक समर्पित संपर्क के रूप में काम करेगा.”

उन्होंने यह भी बताया कि इस कदम से सरकारी मदद तक पहुंच आसान हो सकती है. इससे जानकारी की कमी कम होगी, अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल बेहतर होगा और छोटे कारोबारों को मौजूदा योजनाओं और नियमों का पालन करने में मदद मिलेगी.

हालांकि, गुप्ता ने कहा कि नया कार्यालय बनाना समाधान का सिर्फ एक हिस्सा है. उन्होंने कहा कि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इस पद पर पर्याप्त कर्मचारी हों, उसे पर्याप्त अधिकार दिए जाएं और जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, ताकि MSMEs और सरकार के बीच बातचीत आसान हो सके. ऐसा नहीं होना चाहिए कि यह कानून के तहत प्रशासन की एक और अतिरिक्त परत बनकर रह जाए.

विवादों को सुलझाने की व्यवस्था

संशोधन में मध्यस्थता और आर्बिट्रेशन के लिए समय-सीमा तय करके विवादों के निपटारे को अधिक स्पष्ट और तय समय में करने की कोशिश की गई है. प्रस्तावित व्यवस्था में मध्यस्थता के लिए 90 दिन, इसके बाद मामले के आर्बिट्रेशन में जाने से पहले 30 दिन और आर्बिट्रल अवॉर्ड देने के लिए 90 दिन का समय दिया गया है.

एक और बदलाव मध्यस्थता और आर्बिट्रेशन के बीच प्रक्रिया को ज्यादा स्पष्ट रूप से अलग करना है. रॉय ने कहा कि 2006 के कानून में यह स्पष्ट नहीं था और सुप्रीम कोर्ट ने भी 2021 में इस मुद्दे को उठाया था. उन्होंने इसे “प्रगति की दिशा में एक बड़ा कदम” बताया.

संशोधन में ऑनलाइन विवाद समाधान की व्यवस्था भी शुरू की गई है. इसके तहत सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मध्यस्थता और विवादों के समाधान की सुविधा दे सकेगी.

यह छोटे कारोबारों के लिए खास तौर पर उपयोगी हो सकता है, जिन्हें अन्यथा विवादों को भौतिक सुनवाई के जरिए आगे बढ़ाने में काफी समय और संसाधन खर्च करने पड़ सकते हैं. रॉय ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऑनलाइन वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था के ज्यादा इस्तेमाल पर जोर दिए जाने के संदर्भ में भी यह कदम महत्वपूर्ण है.

अंत में, प्रस्तावित व्यवस्था के तहत माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज फैसिलिटेशन काउंसिल (MSEFC) को भी मजबूत किया गया है. माइक्रो और छोटे उद्यमों से जुड़े भुगतान विवादों को सुलझाने के लिए यह काउंसिल अक्सर पहला मंच रही है. बदलावों के तहत एक अतिरिक्त मध्यस्थता सेवा प्रदाता का प्रावधान किया गया है. इससे शिकायत रखने वाले पक्ष को MSEFC और किसी वैकल्पिक सेवा प्रदाता में से किसी एक को चुनने का विकल्प मिलेगा.

संक्षेप में, 2006 के कानून में किए गए बदलाव ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ने का संकेत देते हैं, जिसमें आसान रजिस्ट्रेशन, वर्किंग कैपिटल तक पहुंच और विवादों को सुलझाने के लिए तेज और ऑनलाइन तरीकों पर ध्यान दिया गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

यह भी पढ़ें: मोदी-सुखबीर बादल की मुलाकात: 2027 के पंजाब चुनावों पर नज़र, पुराने गठबंधन को शुरू करने की कोशिश

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