यूपी का गैंगस्टर एक्ट 'मरा हुआ कानून' है; सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की यह सख्त टिप्पणी?
यूपी का गैंगस्टर एक्ट 'मरा हुआ कानून' है; सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की यह सख्त टिप्पणी? कोर्ट ने मशहूर लेखक जॉर्ज ऑरवेल के कथन का जिक्र करते हुए कहा कि यह कानून हिंसा रोकने के बहाने नागरिकों पर हिंसा बढ़ा रहा. By Sumit Saxe…

सौजन्य से:- ETV Bharat
यूपी का गैंगस्टर एक्ट 'मरा हुआ कानून' है; सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की यह सख्त टिप्पणी?
कोर्ट ने मशहूर लेखक जॉर्ज ऑरवेल के कथन का जिक्र करते हुए कहा कि यह कानून हिंसा रोकने के बहाने नागरिकों पर हिंसा बढ़ा रहा.
By Sumit Saxena
Published : August 21, 2026 at 2:34 PM IST
नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के गलत इस्तेमाल पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 1986 का यह कानून "मरा हुआ (निष्प्रभावी)" है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को सिर्फ 'गैंगस्टर' का ठप्पा या टैग लग जाने की वजह से सजा नहीं दी जा सकती.
यह फैसला गुरुवार को जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया. पीठ ने अपने फैसले की शुरुआत में मशहूर अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल के एक कथन को शामिल किया, जिसमें कहा गया है, "जो लोग हिंसा का त्याग करते हैं, वे ऐसा केवल इसलिए कर पाते हैं क्योंकि दूसरे उनकी ओर से हिंसा कर रहे होते हैं."
पीठ ने इस बात पर ध्यान दिया कि भले ही इस कानून को हिंसा और संगठित अपराध पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसका इस्तेमाल उतनी ही आसानी से निर्दोष नागरिकों के खिलाफ भी किया जा सकता है. फैसले को खत्म करते हुए पीठ ने कहा- "मामले को समाप्त करने से पहले, हम शुरुआत में इस्तेमाल किए गए जॉर्ज ऑरवेल के उसी कथन का सहारा लेते हुए यह पाते हैं कि जिस कानून की हम समीक्षा कर रहे हैं, वह हिंसा को रोकने के बहाने असल में निर्दोष नागरिकों पर ही हिंसा को बढ़ावा दे रहा है."
पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश के इस कानून में जो बात साफ तौर पर गायब है, वह एक ऐसा प्रावधान है जो यह तय करे कि इस कानून के तहत कोई अपराध कैसे बनता है. पीठ ने कहा- "पहले एक गैंग को परिभाषित किया गया, जिसमें उप-धारा (i) से (xxv) के तहत आने वाले अपराध शामिल हैं, और फिर गैंगस्टर को गैंग के सदस्य, नेता या आयोजक के रूप में परिभाषित किया गया. इसके बाद, कानून द्वारा कोई नया अपराध तय किए बिना ही सीधे गैंगस्टर के लिए सजा तय कर दी गई; यही कमी इस दंडात्मक कानून को 'मरा हुआ (यानी शुरुआत से ही बेकार)' बनाती है."
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक गिरोहों के खतरे को रोका जाना चाहिए, लेकिन सिर्फ मकसद सही होने से गलत तरीका सही नहीं हो जाता, खासकर ऐसा दंडात्मक कानून बनाते समय जो नागरिकों की आजादी में दखल देता हो. पीठ ने कहा कि इस अधिनियम के प्रावधानों के कारण आरोपी को बिना मुकदमे के लंबे समय तक जेल में रखा जा सकता है, जो कि प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) के कानून जैसा ही है.
पीठ ने कहा, "यदि प्रिवेंटिव डिटेंशन के कानून के साथ तुलना करके देखा जाए, तो उत्तर प्रदेश का यह कानून न्यायिक विवेक को संतुष्ट करने में पूरी तरह नाकाम रहता है. एक न्यायिक अधिकारी के सामने चलने वाले इस मुकदमे में, मुख्य अपराध के साथ-साथ आरोपी के स्टेटस (यानी उसके गैंगस्टर होने या न होने) की भी जांच की जाती है. यह तरीका बेहद त्रुटिपूर्ण और अपर्याप्त है, क्योंकि जैसे ही किसी का स्टेटस 'गैंगस्टर' तय होता है, उसे अनिवार्य रूप से सजा दे दी जाती है."
पीठ ने ये टिप्पणियां दो वकीलों के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले को रद्द करते हुए कीं. बता दें कि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम एक विशेष राज्य कानून है. इसे संगठित अपराध करने वाले गिरोहों, आपराधिक गैंगों और लगातार अपराध करने वाले असामाजिक तत्वों पर नकेल कसने, उन्हें नियंत्रित करने और सजा देने के लिए बनाया गया था.
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