राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को अदालत में गवाही देने की अनुमति: क्या है कानून?
भारत में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को अदालत में गवाही देने की अनुमति है, लेकिन ऐसा करने के लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा है। राष्ट्रपति को उनके कार्यकाल के दौरान अदालत में पेश नहीं किया जा सकता है, लेकिन प्रधानमंत्री अन्य नागरिकों की तरह अदालत में पेश हो सकते हैं।

सौजन्य से:- ABP News
Court Summons: क्या राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भी कोर्ट में गवाही के लिए बुलाया जा सकता है, क्या है कानून?
Court Summons: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी अदालत में गवाही देने के लिए बुलाया जा सकता है. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
- राष्ट्रपति को कार्यकाल में अदालत में पेश नहीं किया जा सकता।
- विशेष आयोग राष्ट्रपति का बयान आधिकारिक स्थान पर दर्ज करता है।
- प्रधानमंत्री अन्य नागरिकों की तरह अदालत में पेश हो सकते हैं।
- गोपनीय सरकारी बातचीत का खुलासा अदालत में करना अनिवार्य नहीं।
Court Summons: अदालत में पेश होने के मामले में कानून राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पदों के साथ अलग-अलग व्यवहार करता है. जिस तरफ जरूरत पड़ने पर प्रधानमंत्री को गवाही देने के लिए बुलाया जा सकता है वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति को अपने कार्यकाल के दौरान विशेष संवैधानिक सुरक्षा दी जाती है और उन्हें किसी भी अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
राष्ट्रपति को अदालत में क्यों नहीं बुलाया जा सकता?
संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत भारत के राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों को उनके पद पर रहते हुए विशेष कानूनी छूट मिली होती है. इस प्रावधान के तहत राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के दौरान आधिकारिक कर्तव्यों के पालन में किए गए कामों या फिर लिए गए फैसलों के लिए किसी भी अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं होते. यही वजह है कि कोई भी अदालत राष्ट्रपति को पद पर रहते हुए व्यक्तिगत रूप से पेश होने या फिर अदालत में गवाही देने के लिए समन जारी नहीं कर सकती.
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राष्ट्रपति की गवाही कैसे दर्ज की जा सकती है?
अगर किसी खास मामले में राष्ट्रपति की गवाही जरूरी हो जाती है तो अदालत उन्हें कोर्ट रूम में पेश होने का निर्देश नहीं दे सकती. इसके बजाय राष्ट्रपति भवन या फिर किसी दूसरे आधिकारिक स्थान पर राष्ट्रपति का बयान दर्ज करने के लिए एक खास आयोग नियुक्त किया जाता है.
रिपोर्ट के मुताबिक 1970 में इस प्रक्रिया का पालन किया गया था जब सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी गिरि के चुनाव को चुनौती देने वाले मामले के दौरान एक आयोग के जरिए उनका बयान दर्ज किया था.
क्या प्रधानमंत्री को बुलाया जा सकता है?
राष्ट्रपति के उलट प्रधानमंत्री को अनुच्छेद 361 के तहत मिलने वाली खास संवैधानिक छूट नहीं दी जाती है. इस वजह से प्रधानमंत्री भी दीवानी और आपराधिक मामलों में किसी भी दूसरे नागरिक की तरह ही न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हो जाते हैं.
अगर कोई अदालत किसी भी मामले का फैसला करने के लिए प्रधानमंत्री की गवाही को जरूरी मानती है तो उसे समन जारी करने और प्रधानमंत्री को गवाह के तौर पर पेश होने के लिए कहने का अधिकार है.
विशेषाधिकार प्राप्त बातचीत क्या है?
हालांकि अदालतें प्रधानमंत्री को बुला सकती हैं लेकिन ऐसी जानकारी का खुलासा करने पर सीमाएं हैं जिन्हें सार्वजनिक किया जा सकता है. भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत प्रधानमंत्री, मंत्री परिषद और राष्ट्रपति के के बीच गोपनीय सलाह या फिर बातचीत को विशेषाधिकार प्राप्त संचार माना जाता है. ऐसी गोपनीय बातचीत कानूनी रूप से सुरक्षित होती है और साथ ही अदालतें न्यायिक कार्यवाही के दौरान इनका खुलासा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती.
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