सेना में तैनात होने से अदालत में गायब रहना नहीं है बहाना
सिविल जज ने कहा, 'यदि वादी भारतीय सेना में तैनात था तो वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से अदालत को इसकी जानकारी दे सकता था।' अदालत ने सेना के एक जवान की अर्जी खारिज कर दी जिसमें कहा जा रहा था कि सेना में कार्यरत होने और अवकाश न मिलने के कारण वह अदालत में उपस्थित नहीं हो सका।

सौजन्य से:- Amar Ujala
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Kangra News: सेना में होना अदालत से गायब रहने का बहाना, कोर्ट ने खारिज की अर्जी
Tue, 30 Jun 2026 08:29 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Tue, 30 Jun 2026 08:29 AM IST
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धर्मशाला। पालमपुर की सिविल अदालत ने एक दीवानी वाद (सिविल सूट) को बहाल करने की मांग वाली अर्जी को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वादी भारतीय सेना में तैनात था और उसे छुट्टी नहीं मिल सकी। यदि वास्तव में ऐसी स्थिति थी तो वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से भी अदालत को इसकी जानकारी दे सकता था।
सिविल जज पालमपुर प्रियंका की अदालत में सेना के एक जवान की ओर से आदेश 9 नियम 9 सीपीसी के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई हुई। वादी का कहना था कि सेना में कार्यरत होने और अवकाश न मिलने के कारण वह 18 जुलाई 2024 को अदालत में उपस्थित नहीं हो सका, जिससे उसकी गैरहाजिरी में दीवानी वाद खारिज हो गया। उसने मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला कराने के लिए वाद बहाल करने की मांग की।
प्रतिवादी पक्ष ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वादी जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) से बचने के लिए ढाई साल से लगातार गैरहाजिर चल रहा था। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि वादी को प्रतिपरीक्षण के लिए कई अवसर दिए गए थे, लेकिन उसने उनका लाभ नहीं उठाया। अदालत ने कहा कि वादी ने अपनी गैरहाजिरी का कोई ठोस और पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं किया।
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अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वादी का आचरण न्यायिक प्रक्रिया के प्रति लापरवाहीपूर्ण रहा और उसने मुकदमे को लंबा खींचकर दूसरे पक्ष को परेशान किया। न्यायालय को प्राप्त विवेकाधिकार वास्तविक कठिनाइयों से राहत देने के लिए है, न कि किसी पक्ष की जानबूझकर की गई लापरवाही, निष्क्रियता या असंवेदनशील रवैये को बचाने के लिए। इन्हीं परिस्थितियों के तहत कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी।
पालमपुर की सिविल अदालत ने एक दीवानी वाद को बहाल करने की मांग वाली अर्जी खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वादी भारतीय सेना में तैनात था और छुट्टी नहीं मिल सकी। यदि वास्तव में ऐसी स्थिति थी तो वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से अदालत को इसकी जानकारी दे सकता था।
सिविल जज पालमपुर प्रियंका की अदालत में क्षेत्र से संबंधित सेना में तैनात एक व्यक्ति की ओर से आदेश 9 नियम 9 सीपीसी के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई हुई। आवेदन में कहा गया था कि उनकी घोषणा संबंधी दीवानी वाद 18 जुलाई 2024 को उनकी गैरहाजिरी के कारण खारिज हो गई थी। वादी का कहना था कि वह भारतीय सेना में कार्यरत होने के कारण अदालत में उपस्थित नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें अवकाश नहीं मिला। उन्होंने मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला कराने के लिए वाद बहाल करने की मांग की।
प्रतिवादी की ओर से आवेदन का विरोध करते हुए कहा गया कि वादी जानबूझकर लंबे समय से अदालत में उपस्थित नहीं हो रहा था और जिरह से बचने के लिए लगातार गैरहाजिर रहता रहा। अदालत को बताया गया कि वादी के प्रतिपरीक्षण के लिए ढाई वर्ष से अधिक समय तक कई अवसर दिए गए, लेकिन उसने उनका लाभ नहीं उठाया। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि वादी को कई अवसर दिए जाने के बावजूद वह प्रतिपरीक्षण के लिए उपस्थित नहीं हुआ। इसके चलते 18 जुलाई 2024 को उसकी अनुपस्थिति के कारण वाद डिफॉल्ट में खारिज करना पड़ा। अदालत ने कहा कि वादी ने अपनी गैरहाजिरी का कोई ठोस और पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं किया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि वादी वास्तव में छुट्टी न मिलने के कारण उपस्थित नहीं हो सकता था तो उसका अधिवक्ता अदालत में उपस्थित होकर स्थिति से अवगत करा सकता था। इसके विपरीत, वादी का आचरण न्यायिक प्रक्रिया के प्रति लापरवाहीपूर्ण रहा और उसने अनावश्यक रूप से मुकदमे को लंबा खींचकर दूसरे पक्ष को परेशान किया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि न्यायालय को प्राप्त विवेकाधिकार वास्तविक कठिनाइयों से राहत देने के लिए है, न कि किसी पक्ष की जानबूझकर की गई लापरवाही, निष्क्रियता या अदालत के प्रति असंवेदनशील रवैये के परिणामों से बचाने के लिए। इन परिस्थितियों में अदालत ने वाद बहाल करने की अर्जी खारिज करते हुए उसका निस्तारण कर दिया।
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सिविल जज पालमपुर प्रियंका की अदालत में सेना के एक जवान की ओर से आदेश 9 नियम 9 सीपीसी के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई हुई। वादी का कहना था कि सेना में कार्यरत होने और अवकाश न मिलने के कारण वह 18 जुलाई 2024 को अदालत में उपस्थित नहीं हो सका, जिससे उसकी गैरहाजिरी में दीवानी वाद खारिज हो गया। उसने मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला कराने के लिए वाद बहाल करने की मांग की।
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प्रतिवादी पक्ष ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वादी जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) से बचने के लिए ढाई साल से लगातार गैरहाजिर चल रहा था। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि वादी को प्रतिपरीक्षण के लिए कई अवसर दिए गए थे, लेकिन उसने उनका लाभ नहीं उठाया। अदालत ने कहा कि वादी ने अपनी गैरहाजिरी का कोई ठोस और पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं किया।
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अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वादी का आचरण न्यायिक प्रक्रिया के प्रति लापरवाहीपूर्ण रहा और उसने मुकदमे को लंबा खींचकर दूसरे पक्ष को परेशान किया। न्यायालय को प्राप्त विवेकाधिकार वास्तविक कठिनाइयों से राहत देने के लिए है, न कि किसी पक्ष की जानबूझकर की गई लापरवाही, निष्क्रियता या असंवेदनशील रवैये को बचाने के लिए। इन्हीं परिस्थितियों के तहत कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी।
पालमपुर की सिविल अदालत ने एक दीवानी वाद को बहाल करने की मांग वाली अर्जी खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वादी भारतीय सेना में तैनात था और छुट्टी नहीं मिल सकी। यदि वास्तव में ऐसी स्थिति थी तो वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से अदालत को इसकी जानकारी दे सकता था।
सिविल जज पालमपुर प्रियंका की अदालत में क्षेत्र से संबंधित सेना में तैनात एक व्यक्ति की ओर से आदेश 9 नियम 9 सीपीसी के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई हुई। आवेदन में कहा गया था कि उनकी घोषणा संबंधी दीवानी वाद 18 जुलाई 2024 को उनकी गैरहाजिरी के कारण खारिज हो गई थी। वादी का कहना था कि वह भारतीय सेना में कार्यरत होने के कारण अदालत में उपस्थित नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें अवकाश नहीं मिला। उन्होंने मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला कराने के लिए वाद बहाल करने की मांग की।
प्रतिवादी की ओर से आवेदन का विरोध करते हुए कहा गया कि वादी जानबूझकर लंबे समय से अदालत में उपस्थित नहीं हो रहा था और जिरह से बचने के लिए लगातार गैरहाजिर रहता रहा। अदालत को बताया गया कि वादी के प्रतिपरीक्षण के लिए ढाई वर्ष से अधिक समय तक कई अवसर दिए गए, लेकिन उसने उनका लाभ नहीं उठाया। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि वादी को कई अवसर दिए जाने के बावजूद वह प्रतिपरीक्षण के लिए उपस्थित नहीं हुआ। इसके चलते 18 जुलाई 2024 को उसकी अनुपस्थिति के कारण वाद डिफॉल्ट में खारिज करना पड़ा। अदालत ने कहा कि वादी ने अपनी गैरहाजिरी का कोई ठोस और पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं किया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि वादी वास्तव में छुट्टी न मिलने के कारण उपस्थित नहीं हो सकता था तो उसका अधिवक्ता अदालत में उपस्थित होकर स्थिति से अवगत करा सकता था। इसके विपरीत, वादी का आचरण न्यायिक प्रक्रिया के प्रति लापरवाहीपूर्ण रहा और उसने अनावश्यक रूप से मुकदमे को लंबा खींचकर दूसरे पक्ष को परेशान किया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि न्यायालय को प्राप्त विवेकाधिकार वास्तविक कठिनाइयों से राहत देने के लिए है, न कि किसी पक्ष की जानबूझकर की गई लापरवाही, निष्क्रियता या अदालत के प्रति असंवेदनशील रवैये के परिणामों से बचाने के लिए। इन परिस्थितियों में अदालत ने वाद बहाल करने की अर्जी खारिज करते हुए उसका निस्तारण कर दिया।
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