सुप्रीम कोर्ट ने 23 वर्ष की देरी से दर्ज एफआईआर को रद्द किया, दीवानी और आपराधिक कानून का गलत फायदा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 23 वर्ष की देरी से दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि दीवानी और आपराधिक दोनों कानून का गलत फायदा नहीं उठाया जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि दीवानी न्यायालय के आदेश से संतोष नहीं होने पर आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन यह आवश्यक है कि इसके पीछे एक संतोषजनक कारण हो।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने 23 वर्ष की देरी से दर्ज कराई गई एफआईआर को रद्द कर दिया है। और यह माना कि ऐसे मामलों में देरी यह संकेत दे सकती है कि आपराधिक कानून का उपयोग केवल दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के लिए किया गया। बिना संतोषजनक कारण के इतनी लंबी देरी न्यायिक जांच का महत्वपूर्ण विषय है।
नई दिल्ली: कानून का गलत फायदा उठाना किसी नजरिए से सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी से यही जाहिर होता है। सुप्रीम कोर्ट ने 23 वर्ष की देरी से दर्ज कराई गई एफआईआर को रद्द कर दिया है। और यह माना कि ऐसे मामलों में देरी यह संकेत दे सकती है कि आपराधिक कानून का उपयोग केवल दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के लिए किया गया। बिना संतोषजनक कारण के इतनी लंबी देरी न्यायिक जांच का महत्वपूर्ण विषय है।
यह मामला नज़ीबुल रहीम खान और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य का है। इसमें उत्तर प्रदेश की लगभग 13 एकड़ कृषि भूमि से जुड़ा विवाद था। मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी बनाकर 1996 में उसकी भूमि की बिक्री कर दी गई। इसी आधार पर उसने वर्ष 2001 में दीवानी न्यायालय में बिक्री विलेख और पावर ऑफ अटॉर्नी निरस्त कराने का मुकदमा दायर किया था। इसके बावजूद उन्हीं आरोपों पर आपराधिक एफआईआर वर्ष 2024 में दर्ज कराई गई। मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि एफआईआर में संज्ञेय अपराध का उल्लेख है। फिर इस फैसले के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
कानून किसी व्यक्ति को एक ही विवाद में दीवानी और आपराधिक दोनों उपाय अपनाने से नहीं रोकता। यदि किसी मामले में धोखाधड़ी या जालसाजी के आरोप हों तो दोनों प्रकार की कार्यवाही समानांतर चल सकती हैं।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच
सुप्रीम कोर्ट में मामला और सुप्रीम सुनवाई
मामला जब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच के समक्ष पहुंचा तो तथ्यों की जांच -पड़ताल के बाद अदालत ने यह बात जाननी चाही कि शिकायतकर्ता को 2001 में ही कथित अपराध की जानकारी थी तो 23 वर्ष तक आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
न्यायालय ने कहा कि दोनों कार्यवाहियों के बीच अत्यधिक और बिना कारण का अंतर स्वीकार्य नहीं है। इतने लंबे विलंब का संतोषजनक स्पष्टीकरण आवश्यक था, जो रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था। केवल एफआईआर में लगाए गए आरोपों के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।
अदालत ने कहा कि यदि कोई पक्ष पहले दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटाता है और वर्षों बाद अचानक आपराधिक मुकदमा दर्ज कराता है तो न्यायालय को पूरे घटनाक्रम की सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए।
पीठ ने कहा कि कई बार लंबित दीवानी विवादों में एक पक्ष दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के उद्देश्य से आपराधिक मुकदमे दर्ज कराता है। यदि ऐसा प्रतीत हो कि एफआईआर केवल मुकदमे में बढ़त हासिल करने के लिए दर्ज की गई है तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
आखिर में समय के पहलू को न्यायिक परीक्षण का महत्वपूर्ण आधार मानते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए एफआईआर, चार्जशीट और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया।
गौर करने वाली बात इस मामले में यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर, चार्जशीट और उससे उत्पन्न सभी आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त कर तो दिया, लेकिन दीवानी मामलों को नहीं। फैसले में अदालत ने साफ किया कि उसने संपत्ति के स्वामित्व, फर्जी दस्तावेज या पक्षकारों के दावों पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है। ये सभी प्रश्न अभी भी संबंधित दीवानी अदालतों के समक्ष लंबित हैं। इसलिए निचली अदालतें स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों के आधार पर फैसला करेंगी। सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल आपराधिक कार्यवाही की वैधता तक सीमित रहेगा।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह बिलकुल साफ है कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उपयोग किसी दीवानी विवाद में दबाव के रूप में नहीं किया जा सकता। जैसा कि अदालत ने बताया कि दीवानी और आपराधिक उपाय साथ-साथ उपलब्ध हो सकते हैं, तो उनके प्रयोग में अनावश्यक और असाधारण देरी न्यायिक जांच का विषय बनेगी। मेरा मानना है कि भविष्य में संपत्ति विवादों और विलंब से दर्ज होने वाली एफआईआर से जुड़े मामलों में, शीर्ष अदालत का यह फैसला महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में देखा जाएगा।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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