Facial Recognition और निजता का अधिकार: CJP Protest मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने बड़ा संवैधानिक सवाल
मुजफ्फरनगर कोर्ट का रिकार्ड : 100 दिन में 22 मौत की सजा? मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बीच जज दिवाकर के फैसले की कानूनी कसौटी क्या है Facial Recognition System की निगाह अपराधियों पर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम को…

सौजन्य से:- Navbharat Times
मुजफ्फरनगर कोर्ट का रिकार्ड : 100 दिन में 22 मौत की सजा? मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बीच जज दिवाकर के फैसले की कानूनी कसौटी क्या है
Facial Recognition System की निगाह अपराधियों पर
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जंतर-मंतर पर Facial Recognition System का इस्तेमाल विशेष उद्देश्य से किया गया था, न कि प्रदर्शन में शामिल हर व्यक्ति की निगरानी के लिए। पुलिस के अनुसार सिस्टम ऐसे लोगों की पहचान करने के लिए था जिनके नाम गंभीर आपराधिक मामलों के रिकॉर्ड में मौजूद हैं। पुलिस ने यह भी कहा कि ट्रैफिक चालान जैसे छोटे अपराध से जुड़े लोगों का डेटा इस प्रक्रिया का लक्ष्य नहीं था। मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को निर्देश दिया कि चेहरे का मिलान आने के बाद कोई स्वत: दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। पहले यह वेरिफाई किया जाता है कि संबंधित व्यक्ति प्रदर्शन के दौरान कहां था और उसने क्या किया।राहुल गांधी-सोनिया गांधी ने किया वंदे मातरम् का अपमान? राष्ट्रगीत के अपमान पर क्या सजा है
2,873 लोगों की पहचान का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है?
दरअसल, दिल्ली पुलिस के अनुसार 20 से 26 जुलाई के बीच जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल पर FRS के जरिए 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई जिनके बारे में पुलिस रिकॉर्ड में आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें 92 लोग ऐसे बताए गए जिनके खिलाफ 10 से अधिक मामले थे। हालांकि किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR या लंबित मामला होना अपने-आप में उसकी दोषसिद्धि नहीं है। इसलिए ऐसे में कानूनी दृष्टि से आपराधिक रिकॉर्ड यो कोई पिछला आपराधिक इतिहास और दोषसिद्धि को एक समान मानना उचित नहीं होगा।जन्म और मृत्यु पंजीकरण कानूनों में हुआ बदलाव, इसके लिए कितने दिनों में रजिस्ट्रेशन कराना है जरुरी
सुप्रीम कोर्ट में FRT की वैधानिकता पर सीधा सवाल उठा
- पेटिशनर्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी और एन हरिहरन ने FRT के इस्तेमाल पर अलग से न्यायिक विचार की मांग की।
- उनकी दलील का केंद्र यह था कि सवाल केवल चेहरे के मिलान का था। का नहीं है। पहले लोगों की तस्वीरें या चेहरे का डेटा इकट्ठा करना और उस बाद में उस डेटा को प्रोसेस या मैच करना दोनों अलग अलग कानूनी सवाल हैं।
- यह भी सवाल उठाया गया कि क्या अधिकारियों को इस तरह का डेटा एकत्र और संसाधित करने का वैधानिक अधिकार प्र प्राप्त है।
- गुरुस्वामी ने यह भी कहा कि निजी कंपनियों द्वारा चेहरे की पहचान सामग्री के प्रसंस्करण का पहलू भी संवैधानिक जांच के दायरे में आना चाहिए।
Criminal Procedure (Identification) Act, 2022 का क्या महत्व है?
बात यह है इसके कानूनी प्रावधानों में फिंगरप्रिंट, फोटोग्राफ, आइरिस/रेटिना स्कैन, जैविक नमूने तथा व्यवहार संबंधी विशेषताएँ जैसी चीज़ें शामिल हैं। नियमों में इनको इकट्ठा करने, संग्रहीत करने और मिलान करने की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। लेकिन एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु यह यह है कि इस अधिनियम की धारा 3 में माप लेने की परिस्थितियाँ विशेष रूप से दोषसिद्ध व्यक्तियों तथा गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्तियों से संबंधित हैं। इसीलिए किसी विरोध स्थल पर मौजूद व्यक्ति की लाइव फेशियल कैप्चर और मैच करने की बात कानूनी जांच के दायरे में है।29 बड़े मामले और लंबा इंतजार! सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ के लिए बनाया नया प्लान, रोज होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने FRT पर अभी अंतिम फैसला नहीं दिया
- मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रस्तावित एक उच्च-स्तरीय समिति इस विषय पर अपनी राय दे सकती है, लेकिन अंतिम कानूनी निर्णय न्यायालय का ही होगा। ।
- न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची ने मामले को अनुपात के सिद्धांत के दृष्टिकोण से देखने की बात कही, जबकि CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि समिति मुख्यतः तथ्यों की खोज के लिए होगी और कानूनी प्रश्न न्यायालय के पास ही रहेंगे।
- इसका अर्थ है कि अभी यह निष्कर्ष निकालना यह सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के FRT के उपयोग को वैध ठहरा दिया है। अदालत के समक्ष इसकी निजता के हनन, वैधानिक प्रासंगिकता और सुरक्षा उपायों जैसे प्रश्न अभी खुले हैं, जिन पर विचार होना है।
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