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निजता के अधिकार का संतुलन: व्यभिचार मामले में पत्नी को मिली होटल वीडियो और कॉल रिकॉर्ड तक पहुंच

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पत्नी को पति के होटल वीडियो रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड हासिल करने की अनुमति देने वाले आदेश को बरकरार रखा, जस्टिस ने कहा कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है और न्याय तक पहुंच के लिए आवश्यक साक्ष्य जुटाना भी महत्वपूर्ण है।

8 जुलाई 2026 को 07:57 am बजे
निजता के अधिकार का संतुलन: व्यभिचार मामले में पत्नी को मिली होटल वीडियो और कॉल रिकॉर्ड तक पहुंच

सौजन्य से:- Navbharat Times

वैवाहिक विवादों में सबूत जुटाने के अधिकार को अहम मानते हुए पत्नी को पति के होटल वीडियो रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड हासिल करने की अनुमति देने वाले आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है

नई दिल्ली : भारत में निजता के अधिकार को अदालतों ने बार बार अपने फैसले में जगह दी है। लेकिन क्या निजता के अधिकार और न्याय तक प्रभावी पहुंच के बीच संतुलन में दूसरे पक्षका पलड़ा भारी हो जाता है। ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बनकर उभरा है। अदालत ने वैवाहिक विवाद में पत्नी द्वारा पति के होटल के वीडियो रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड मांगने की अनुमति को बरकरार रखते हुए कहा कि पारिवारिक मामलों में सत्य तक पहुंच और न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य जुटाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्यों ऐसा कहा शीर्ष अदालत ने, इसके लिए मामले की तह में जाना जरूरी है..

वैसे तो यह मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है, जिसमें पत्नी ने पति पर व्यभिचार और क्रूरता के आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की थी। पत्नी का दावा था कि पति वर्ष 2022 में जयपुर के एक होटल में दूसरी महिला के साथ ठहरा था। होटल का CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं होने के कारण उसने फैमिली कोर्ट से होटल बुकिंग रिकॉर्ड, पहचान संबंधी दस्तावेज, भुगतान विवरण और कॉल डिटेल रिकॉर्ड मंगाने की मांग की। फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्ड सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने का आदेश भी दिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस आदेश को सही ठहराया। आखिर में आदेश के खिलाफ, निजता की गुहार लगाते हुए पति सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

सुप्रीम कोर्ट ने समझाया निजता और न्याय के अधिकार का संतुलन

सुप्रीम कोर्ट में पति की अपील पर जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने सुनवाई की

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि निजता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन यह पूर्ण या निरपेक्ष अधिकार नहीं है।

यदि किसी न्यायिक विवाद के निष्पक्ष निपटारे के लिए आवश्यक साक्ष्य की जरूरत हो तो अदालत सीमित दायरे में ऐसे रिकॉर्ड मंगाने की अनुमति दे सकती है।

कोर्ट ने माना कि व्यभिचार जैसे आरोप अक्सर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से ही सिद्ध होते हैं। इसलिए यदि रिकॉर्ड केवल अदालत के समक्ष सीलबंद रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं और सार्वजनिक नहीं किए जाते, तो इससे निजता का अनावश्यक उल्लंघन नहीं माना जाएगा।

आखिर में पति की अपील खारिज करते हुए कहा शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि फैमिली कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के फैसलों में किसी दखल की कोई ज़रूरत नहीं है।

न्याय तक प्रभावी पहुंच भी संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे मामलों में न्यायालय साक्ष्य जुटाने में सहयोग कर सकता है। हां, रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं होंगे बल्कि केवल न्यायिक प्रक्रिया के लिए उपयोग किए जाएंगे।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 14 को अहम माना गया है। यह प्रावधान फैमिली कोर्ट को सामान्य सिविल या आपराधिक अदालतों की तुलना में अधिक व्यापक अधिकार देता है। इसके तहत अदालत किसी भी रिपोर्ट, दस्तावेज, सूचना या सामग्री को स्वीकार कर सकती है यदि उससे विवाद के न्यायपूर्ण समाधान में सहायता मिलती हो। जुलाई 2025 में जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने भी एक फैसले में माना थी कि पारिवारिक विवादों और तलाक की कार्यवाही में भी चुपके से रिकॉर्ड की गई बातचीत को सबूत के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है।

एक बात तो साफ हो गई है इस मामले से, कि जब न्यायिक प्रक्रिया में सत्य की स्थापना और निष्पक्ष निर्णय के लिए आवश्यक साक्ष्य की जरूरत हो, तब अदालत सीमित और नियंत्रित तरीके से निजी रिकॉर्ड मंगाने की अनुमति दे सकती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में भी पारिवारिक विवादों में साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट दिशा तो देगा ही, बहरहाल, न्याय और निजता के बीच संतुलित संवैधानिक दृष्टिकोण को भी मजबूत करता है।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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