1292 की अदालत ने सर्जन को बलात्कार के लिए दंडित किया—आज 800 साल बाद न्याय की स्थिति
इंग्लैंड में 1292 में इसाबेला प्लोमेट ने नशे में धुंधले सर्जन राल्फ डी वॉर्गन के खिलाफ यौन हमला का मुकदमा जीत कर सज़ा हासिल की, पर जुर्माना और सीमित जेल काल के साथ। आज भी भारत व विश्व के कई हिस्सों में समान मामलों में दोषसिद्धि दर बहुत कम है, जिससे महिलाओं ने हाल के हफ्तों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए हैं। यह दर्शाता है कि कई शताब्दियों बाद भी यौन हिंसा के खिलाफ न्याय प्रणाली में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ।

सौजन्य से:- ThePrint Hindi
“जिस आदमी की सर्जरी की जानी हो, उसे अलाव के पास बैठाएं और उसे यह तब तक पिलाते रहें, जब तक वह सो न जाए,” एक मध्यकालीन चिकित्सा पुस्तिका में सर्जनों के लिए निर्देश दिए गए थे. इस पेय में सूअर की पित्त की थैली से तीन चम्मच पित्त, और तीन-तीन चम्मच हेमलॉक का रस, जंगली ब्रायोनी, अफीम और हेनबेन को शराब में मिलाया जाता था. लंबे समय से पैरों के दर्द से परेशान इसाबेला प्लोमेट रॉस-ऑन-वाई में अपने सर्जन के क्लिनिक में लेटी थीं और उस हल्के नशे के असर में जाने के लिए तैयार हो रही थीं, जिसके बारे में सर्जन ने कहा था कि इससे उन्हें पूरी शांति मिलेगी. नशीली दवा के कारण वह हिलने-डुलने में असमर्थ हो गईं. बाद में उन्होंने एक कानूनी शिकायत में कहा कि इसी हालत में सर्जन ने उनके साथ बलात्कार किया.
“A drukin c**t hes na dure bar,” जैसा कि विद्वान कैरिसा हैरिस ने एक पुराने स्कॉटिश कहावत के बारे में बताया है: जो महिला खुद को नशे में जाने देती है, वह यौन हमले को बुलावा दे रही है.
1292 ईस्वी में प्लोमेट द्वारा लाए गए इस मामले का अंत अप्रत्याशित था. मध्यकालीन इंग्लैंड में महिलाओं के प्रति उस समय के नजरिए के बावजूद, जूरी के 12 पुरुषों और चार जजों ने समझा कि उनके साथ गलत हुआ था. सवाल यह था कि यह गलत कितना गंभीर था. सर्जन राल्फ डी वॉर्गन को जेल भेजने का आदेश दिया गया, लेकिन केवल तब तक, जब तक वह 13 शिलिंग और 4 पेंस का जुर्माना और 44 पेंस का कानूनी खर्च नहीं चुका देता.
यौन हिंसा के खिलाफ दशकों के संघर्ष से बहुत कम बदलाव आने के बढ़ते सबूतों से नाराज होकर, हाल के हफ्तों में दुनिया भर की महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किए हैं. इनमें उस जिला अटॉर्नी के खिलाफ प्रदर्शन भी शामिल हैं, जिसने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की एक छात्रा के कथित सामूहिक बलात्कार के मामले में सबूतों की जांच करने की भी कोशिश किए बिना मुकदमा चलाने से इनकार कर दिया था, और सार्वजनिक गुस्से के बाद ही मामले को दोबारा खोला. दिल्ली में महिलाएं अधिकारियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं, जो बलात्कारियों को सजा दिलाने में असफल रहने के बाद अब महिलाओं को शहर की सार्वजनिक जगहों से हटाने की कोशिश कर रहे हैं.
उस मध्यकालीन मुकदमे से असली समस्या के बारे में महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं. पितृसत्ता की संस्थाओं ने, और उन्हें चलाने वाले महिलाओं और पुरुषों ने, लंबे समय से यह समझा है कि सहमति यौन अपराधों के केंद्र में होती है. इसी वजह से प्लोमेट को मुआवजा दिया गया था, जो एक गाय या शायद दो दर्जन किलो ऊन की कीमत के बराबर था. बलात्कार के खिलाफ इतना कम काम होने की वजह यह है कि पुरुष इसे उतना गंभीर नहीं मानते.
बड़ी-बड़ी बातें
भारत को झकझोर देने वाले एक बर्बर बलात्कार और हत्या के 14 साल बाद भी यौन हमले से बची महिलाओं के लिए न्याय के दरवाजे बंद हैं. 2013 में बनाए गए कानूनों में बलात्कारियों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया, लेकिन सफल मुकदमों की संख्या में लगभग कोई बदलाव नहीं आया. 2012 की तरह ही, चार में से एक से भी कम मुकदमों में दोषसिद्धि होती है.
फास्ट-ट्रैक अदालतें सामान्य अदालतों की तुलना में जल्दी फैसले देती हैं, लेकिन उनकी दोषसिद्धि की दर और भी कम है. पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मामलों की संख्या इस अवधि में कम हुई है. इसका मतलब यह हो सकता है कि पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से बच रही है, या महिलाएं आपराधिक न्याय व्यवस्था पर भरोसा खो रही हैं.
अपराध होने के बाद अपराधी के पकड़े जाने की संभावना, अपराध विज्ञान के बहुत बड़े शोध के अनुसार, सजा कितनी कड़ी है इसकी तुलना में अपराध को रोकने में ज्यादा प्रभावी होती है. कनाडा ने 1976 में मृत्युदंड खत्म कर दिया था, फिर भी वहां हत्या की दर में वही रुझान रहा जो अमेरिका में देखा गया, जहां मृत्युदंड अभी भी काफी हद तक जारी है.
यह समझना मुश्किल नहीं है कि मुकदमे इतने कम क्यों सफल होते हैं. पहली बात, अपराध आमतौर पर पीड़िता के अपने जान-पहचान के लोगों के बीच होता है. ज्यादातर अपराधी रिश्तेदार, दोस्त और सहकर्मी होते हैं. इससे महिलाओं पर मुकदमा न चलाने का बहुत दबाव पड़ता है. जब वे मुकदमा करती भी हैं, तब फोरेंसिक सबूत या गवाही उपलब्ध नहीं हो सकती. बहुत कम पुलिस अधिकारियों को यौन हिंसा की जांच की ट्रेनिंग मिलती है. ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट 10 दिन का एक बुनियादी कोर्स कराता है, लेकिन उन्नत प्रशिक्षण और शोध के लिए कोई केंद्र नहीं है.
इसके बाद जल्दबाजी की समस्या है. बलात्कार के मामलों में लगभग दो-तिहाई मामलों में महिला की शिकायत के दो हफ्तों के अंदर गिरफ्तारी हो जाती है. इससे फोरेंसिक जांच के साथ गंभीर जांच करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता. कमल लोधा के बदनाम मामले ने इसका नतीजा दिखाया. वह मजदूर बलात्कार और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है, जबकि फोरेंसिक जांच में वह निर्दोष साबित हुआ था.
भारत की महिलाएं यह सब जानती हैं और सही तौर पर इसके लिए अपने आसपास की बलात्कार की संस्कृति को जिम्मेदार मानती हैं. जब भी गुरमीत राम रहीम सिंह इंसान जैसे दोषी बलात्कारी को पैरोल पर छोड़ा जाता है, तो बलात्कारियों को यह भरोसा मिलता है कि पुरुष होने के कारण उनका विशेषाधिकार सुरक्षित रहेगा. फिर भी यह साफ है कि यह समस्या सिर्फ भारतीय संस्कृति या भारतीय पुरुषों तक सीमित नहीं है.
‘न्याय पाने लायक पीड़िता’
अंग्रेज जज और धर्मगुरु हेनरी डी ब्रैक्टन की किताब De legibus et consuetudinibus Angliae (इंग्लैंड के कानूनों और रीति-रिवाजों के बारे में) से, जो संभवतः 13वीं सदी में लिखी गई थी, हमें पता चलता है कि बलात्कार को भयावह अपराध माना जाता था. बलात्कारी की आंखें निकाल देने की बात कही गई थी, ताकि वह किसी खूबसूरत महिला को देखकर दोबारा आकर्षित न हो सके, और उसका बधियाकरण करने की बात भी थी. लेकिन अगर वह पीड़िता से शादी कर लेता, तो उसकी नई पत्नी उसके अंडकोष को “अपनी संपत्ति” मान सकती थी. ब्रैक्टन के अनुसार, रोमनों, फ्रैंकों और अंग्रेजों के कानूनों में यह भी कहा गया था कि अपराधी के घोड़े या कुत्ते की पूंछ भी काट दी जाए, अगर उसके पास ऐसा कोई जानवर हो. उसके बाज की चोंच, पंजे और पूंछ भी काट दी जाए.
लेकिन महिलाओं को न्याय पाने के लायक मानने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी पड़ती थीं. महिला का कुंवारी होना जरूरी था. बलात्कार के समय उसे जोर-जोर से मदद के लिए चिल्लाना चाहिए था. उसे अपने घाव अच्छे चरित्र वाले पुरुषों को दिखाने होते थे, साथ ही स्थानीय इलाके के अधिकारी और शेरिफ को भी दिखाने होते थे.
कॉर्नेल की छात्रा की गवाही से साफ है कि वह ब्रैक्टन की कठोर नजर में भी, और आज के अमेरिकी अभियोजकों की नजर में भी, शायद न्याय पाने लायक पीड़िता नहीं मानी जाती. छात्रा ने एक विश्वविद्यालय की फ्रैटर्निटी में जाने से पहले 10 ड्रिंक ली थीं. वहां उसने कहा कि वह डिसोसिएटिव एनेस्थेटिक केटामाइन लेने और दो पुरुषों के साथ सहमति से सेक्स करने के लिए तैयार हुई थी. जैसा कि छात्रा के वकील ने बताया है, उस समय उसके लिए सहमति देना लगभग निश्चित रूप से संभव नहीं था. हालांकि, यौन हमले से बची महिलाएं अक्सर अपने साथ हुए सदमे को कम समझने की कोशिश करती हैं और दोस्तों या करीबी लोगों के हिंसक व्यवहार को किसी तरह सामान्य मान लेती हैं.
भले ही पुलिस और अभियोजकों ने अपनी सोच को लिखित रूप में नहीं बताया हो, लेकिन मामले में उनकी रुचि की कमी से लगता है कि उन्होंने उसकी संदिग्ध सहमति को इस बात के रूप में देखा कि वह पीड़िता के लिए तय मानकों के बाहर थी. उसने एक दोस्त से बातचीत में खुद को यौन रूप से बहुत सक्रिय बताया था और अपने लिए एक अपमानजनक शब्द इस्तेमाल किया था, जो शर्म की गहरी भावना को दिखाता है.
भारत में भी इसी तरह की सोच दिखाई देती है. तरुण तेजपाल की शिकायतकर्ता का मामला सुनने वाले जज ने उसके पुराने यौन व्यवहार पर सवाल उठाए. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सामूहिक बलात्कार से बची एक महिला को चरित्रहीन बताया. और फिल्म निर्माता महमूद फारूकी के खिलाफ बलात्कार के आरोप की सुनवाई करने वाले जज ने लिखा कि महिला का “कमजोर ना, हां का मतलब हो सकता है”.
दुनिया भर के मामलों से हमें पता चलता है कि बड़ी संख्या में पुरुष मानते हैं कि उन्हें बलात्कार करने का अधिकार है. इसे समझाने का कोई और तरीका नहीं है कि 50 किलोमीटर के दायरे में दर्जनों पुरुष गिजेल पेलिकोट के साथ बलात्कार करने के लिए तैयार हो गए. और यह अपनी तरह का अकेला मामला नहीं है. चीन के छात्रों का एक जर्मन टेलीग्राम नेटवर्क था, जहां वे अपने साथियों और दोस्तों को नशीली दवा देकर सामूहिक बलात्कार करने की चर्चा करते थे. लंदन में भी एक ऐसा गिरोह था, जो नशीली दवाओं की मदद से किए गए बलात्कार के वीडियो अपने सदस्यों के साथ दुनिया भर में साझा करता था.
अमेरिका में हर चार में से एक महिला छात्रा अपने विश्वविद्यालय के दौरान यौन हिंसा का सामना करती है, लेकिन कॉलेज प्रशासन ने अमीर परिवारों से आने वाले श्वेत पुरुष अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने में हिचकिचाहट दिखाई है.
एक अंतहीन संघर्ष
मध्यकालीन इंग्लैंड में बहुत कम महिलाओं को इस बात का भ्रम रहा होगा कि Eyre में उनके साथ क्या होने वाला था: 1244 के एक फैसले में लिखा गया था, “एक महिला केवल अपनी कुंवारी होने की इज्जत के साथ हुए बलात्कार और अपनी बाहों में अपने पति की मौत की शिकायत कर सकती है.” जो महिलाएं ऐसे मामले लेकर आती थीं जिनमें उन्हें सफलता नहीं मिलती थी, उन्हें सजा भी मिल सकती थी और मिलती भी थी. यहां तक कि जब महिलाओं की बताई हुई बातों में सभी जरूरी शर्तें पूरी होती थीं, तब भी विद्वान मारिया कूपर के शोध से पता चलता है कि उनकी बातों को हमेशा खारिज कर दिया जाता था. 1274 में एक जूरी ने माना कि दो पुरुषों ने मार्गरी ले फीवर के साथ बलात्कार किया था, लेकिन उसने निष्कर्ष निकाला कि उसके सामने जिस पुरुष पर मुकदमा चल रहा था, वह दूसरा पुरुष था और इसलिए उसकी कुंवारी होने की इज्जत जाने के लिए वह जिम्मेदार नहीं था.
अदालतें महिलाओं को दूसरे तरह के गलत कामों के लिए आर्थिक मुआवजा पाने का कम मौका देती थीं. उदाहरण के लिए, ब्रिडनॉर्थ की विधवा क्रिश्चियन प्रूडोम ने एक सुनार से हर्जाने की मांग की. उस सुनार ने उस पर चोरी का आरोप लगाया था और फिर उसके कपड़े उतरवाकर उसकी तलाशी ली थी.
प्लोमेट के मामले के 700 साल से ज्यादा समय बाद, सेंट लुइस की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में पहले साल की एक छात्रा अपनी एक दोस्त के साथ बैठकर शराब पी रही थी. दोनों पिंक फ्लॉयड के गाने साथ-साथ गा रहे थे और दोस्त उसके लिए ड्रिंक बना रहा था.
छात्रा ने लिखा, “एक समय पर मुझे महसूस हुआ कि मैं न तो हिल सकती थी और न ही अपना सिर उठा सकती थी.” “जब उसने मेरे साथ हमला करना शुरू किया, तो मेरे अंदर अचानक ठंड और बीमार कर देने वाला डर और हैरानी भर गई.”
वह छात्रा हैरिस थी, वही साहित्य की विद्वान जिसने प्लोमेट के मामले पर बहुत महत्वपूर्ण शोध किया है. कई दूसरी महिलाओं की तरह, उसने विश्वविद्यालय में शिकायत की, लेकिन उसे कैंपस में शराब पीने के लिए ही सजा दे दी गई.
“मैं अपने साथ अपराधबोध और शर्म को ऐसे लेकर घूमती रही जैसे पत्थरों से भरा कोई बैग हो, जिसे मैं नीचे नहीं रख सकती थी. सब कुछ होने के बावजूद, आज भी मैं ऐसा ही महसूस करती हूं.”
प्रवीण स्वामी ‘दिप्रिंट’ में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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