सुप्रीम कोर्ट ने CEC के फॉर्म‑6 बदलाव को अस्वीकृत, फैसलों पर रोक की संभावना
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की याचिका पर सुनवाई की, अंतरिम रोक नहीं दी और आयोग तथा केंद्र को जवाब देने का नोटिस जारी किया। कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि फॉर्म‑6 में कोई परिवर्तन कभी स्वीकृत नहीं हुआ और यदि कोई एकतरफा निर्णय कानून के विरुद्ध पाया गया तो उसे रद्द किया जा सकता है। इसके साथ ही आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए, एक सदस्य के एकाकी निर्णय को मान्य नहीं माना जाएगा।

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
- Hindi News
- National
- Supreme Court Hearing | CEC Gyanesh Kumar Controversy SIR Allegations
'चुनाव आयोग ने कानून तोड़ा तो फैसले रोक देंगे':CJI बोले- फॉर्म-6 में बदलाव को मंजूरी नहीं दी; EC ने कहा- सुप्रीम कोर्ट ने इजाजत दी थी
- कॉपी लिंक
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने उनके काम करने पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। कोर्ट ने कहा कि अगर आयोग के फैसले कानून के खिलाफ या बिना सहमति के लिए गए पाए गए, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे फॉर्म-6 में किसी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है। बेंच ने कहा- हम देखना चाहेंगे कि बदलाव किसने किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के विपरीत लिए गए आयोग के एकतरफा फैसले रद्द किए जा सकते हैं।
कोर्ट की टिप्पणी के बाद नेता विपक्ष राहुल गांधी ने X पर लिखा- अब यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म-6 में गैरकानूनी और एकतरफा बदलाव किया। हालांकि, चुनाव आयोग ने राहुल के दावे को गलत बताया। चुनाव आयोग ने कहा कि 24 जून 2025 के बिहार SIR आदेश के दौरान फॉर्म-6 के साथ एक घोषणा-पत्र जोड़ा गया था।
आयोग के मुताबिक, बिहार में SIR का आदेश आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से जारी हुआ था और सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने फैसले में इस आदेश को बरकरार रखा था। आयोग ने 26 सितंबर की प्रेस रिलीज में कहा था कि SIR से जुड़े मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 की घोषणा को सही माना था।
बता दें कि मतदाता सूची में पहली बार नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरा जाता है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं में आरोप है कि आयोग ने दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना कई फैसले लिए। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में भी दावा किया गया था कि ज्ञानेश कुमार ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना SIR से जुड़े करीब 14 फैसले लिए।
26 सितंबर: चुनाव आयोग का प्रेस नोट
सुप्रीम कोर्ट की 4 बड़ी बातें: कार्रवाई के पहले जवाब जरूरी
1. अखबार की खबर के आधार पर आदेश नहीं दे सकते: CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोई खबर 100% सही, आंशिक रूप से सही या गलत हो सकती है। इसलिए सिर्फ मीडिया रिपोर्ट के आधार पर CEC को सस्पेंड करने का अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। पहले चुनाव आयोग का जवाब और रिकॉर्ड देखना होगा।
2. फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से लिए जाने चाहिए। यानी तीन सदस्यीय आयोग में किसी एक सदस्य का अकेले फैसला पूरे आयोग का फैसला नहीं माना जा सकता।
3. अभी यह नहीं मान सकते कि सारे फैसले CEC ने अकेले लिए: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले रिकॉर्ड देखना होगा। सिर्फ आरोप के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि सभी फैसले CEC ने अकेले लिए थे।
4. रिकॉर्ड से एकतरफा फैसला साबित हुआ तो कार्रवाई संभव: सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अगर रिकॉर्ड से पता चलता है कि कोई फैसला जरूरी प्रक्रिया के बिना लिया गया था, तो उस पर रोक लगाने पर विचार किया जा सकता है।
SIR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 2 PIL
SIR के खिलाफ 2 PIL दाखिल की गई हैं। राकेश कुमार सिंह ने चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने की मांग वाली याचिका दाखिल की थी। इनकी दलीलें एडवोकेट विकास सिंह ने रखीं। वहीं दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने लगाई। इनकी ओर से सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं।
सुप्रीम कोर्ट CEC को सस्पेंड नहीं कर सकता
संविधान में सुप्रीम कोर्ट को CEC को सस्पेंड करने की कोई स्पष्ट या विशेष शक्ति नहीं दी गई है। आर्टिकल 324 के तहत चुनाव कराने और उसकी निगरानी की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, लेकिन आयोग के फैसलों की कोर्ट में जांच हो सकती है। अगर कोई फैसला कानून या संविधान के खिलाफ पाया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट उस पर रोक लगा सकता है या उसे रद्द कर सकता है।
मीडिया रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ ज्ञानेश कुमार पर विवाद
इस पूरे मामले की शुरुआत इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से हुई थी, जिसमें SIR को लेकर चुनाव आयोग के अधिकारियों के बीच मतभेदों का जिक्र था।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव पैनल के भीतर SIR प्रक्रिया को लेकर बार-बार चिंता जताई थी।
विपक्ष अगले सत्र में महाभियोग लाने की तैयारी में
विपक्ष एक बार फिर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है। अप्रैल 2026 में भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था लेकिन लोकसभा में वह प्रस्ताव खारिज हो गया था, जबकि राज्यसभा में अभी भी लंबित है।
ज्ञानेश कुमार पर एक्शन होगा या नहीं, 3 संभावनाएं
1. कार्यकाल के फैसलों पर पुलिस एक्शन नहीं हो सकता: ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 के तहत सुरक्षा मिली है। जब तक यह प्रावधान मौजूद है, उन्हें केवल पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी के जरिए हटाना, उन पर केस चलाना कानूनी रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण है।
2. भाजपा ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया: ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है, यानी अभी 2 साल कम से कम ज्ञानेश अपने पद पर रहेंगे। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी का मानना है कि ये आरोप आधारहीन हैं।
3. आखिरी रास्ता महाभियोग, लेकिन विपक्ष के पास बहुमत संभव नहीं: अनुच्छेद 324 (5) के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के तहत ही हटाया जा सकता है। महाभियोग प्रस्ताव को पेश करने के लिए लोकसभा में 100 तो राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति को यह तय करना होता है कि इसे स्वीकार किया जाए या नहीं।
मौजूदा हालात में विपक्ष को महाभियोग प्रस्ताव को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में 2/3 की जरूरत होगी। यानी लोकसभा में 362 सांसदों और राज्यसभा में 164 सांसदों का समर्थन हो। विपक्ष के पास संसद में इस वक्त इतना बड़ा समर्थन नहीं है।
----------------------
मुख्य चुनाव आयुक्त विवाद से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें…
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
सेबी की दो जांचों में ‘कोई हेरफेर नहीं’ का निष्कर्ष, फिर भी जेन स्ट्रिट को 567 मिलियन डॉलर का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट का विस्तार: क्या मिलेगा सच्चा न्याय?

बेटे की जमानत लेने के बाद कोर्ट में गैरहाज़िर रहने वाले पिता को चार साल बाद फ़रीदाबाद पुलिस ने गिरफ्तार किया

सुप्रीम कोर्ट ने दिया कड़ा संदेश: यौन अपराध रोकना, पकड़ना नहीं समाधान

सीजेआई सूर्यकांत ने न्याय में करुणा को अनिवार्य बताया

अनिल तथा गौतम भल्ला को धनशोधन केस में 14‑दिन की न्यायिक हिरासत

मतदाता सूची से नाम हटाने के लिये नोटिस अनिवार्य, केवल मृत वोटर को छोड़कर: न्यायमूर्ति उज्जल भुयन

अदालत के आदेश पर पाँच महीने बाद दुष्कर्म मामला दर्ज
ताज़ा ख़बरें
- केन्द्र ने तीन हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में स्वीकृति दी
- सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से माँगी: रात में भी महिलाओं को सुरक्षित महसूस कराने के लिए तेज़ कदम
- सुप्रीम कोर्ट ने NDPS मामले में गिरफ्तारी के आधार न बताने पर जमानत के मुद्दे पर फैसला टाला
- कोलकाता के बैंकशाल कोर्ट में अंडे फेंकने के विरोध में वकीयों ने मार्च किया, सड़क जाम
- सीनियर पुलिस पर आरोपों में कोई ठोस सबूत नहीं – दिल्ली हाई कोर्ट ने दंगों की जाँच जारी रखने का फ़ैसला
- सुप्रीम कोर्ट में तीन प्रमुख न्यायमूर्ति पदोन्नत, सुनीता अगारवाल के साथ महिलाओं की संख्या हुई तीन
- सिंगापुर से लौटते ही नायब सैनी ने ली दो प्रमुख बैठकों की जिम्मेदारी, कानून व्यवस्था समीक्षा और निवेश पर कैबिनेट चर्चा
- सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी ज्ञानेश कुमार मामले में सरकार व आयोग को नोटिस, फ़ॉर्म‑6 टिप्पणी के बाद सवालों की बौछार

