सुप्रीम कोर्ट ने बनावटी विवाद पर सख्त सज़ा, वादी‑वकील से ₹5 लाख जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने एक दशक पुरानी फर्जी झगड़े में वादी और पूर्व वकील दोनों से 5-5 लाख रुपये जुर्माना लगाने का आदेश दिया, यह कहते हुए कि ऐसे मामलों में पक्षों का समय बर्बाद करना जज के ट्रायल के बराबर है। न्यायाधीश विक्रम नाथ ने बताया कि दोनों पक्षों ने सच्चाई छिपाई और अदालत से अपने पक्ष की पुष्टि की उम्मीद रखी, जबकि न्याय व्यवस्था विवादों के निपटारे के लिए नहीं है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने एक दशक से पुराने बनावटी विवाद में बहुत ही सख्त टिप्पणियां की हैं और दोनों पक्षों से अदालत का समय बर्बाद करने के लिए 5-5 लाख रुपये वसूलने का निर्देश दिया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक वादी महिला और उसके पूर्व वकील के बीच एक दशक से पुराने झगड़े के मामले में कहा है कि ऐसे केस में जिसमें पार्टियों को पहले से सबकुछ पता होता है और वे असल में अपना हिसाब बराबर करने के लिए अदालत का समय बर्बाद करते हैं, तो असल में इससे 'जज का ही ट्रायल हो जाता है।' सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में वादी और प्रतिवादी दोनों से पांच-पांच लाख रुपये वसूलने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ की अगुवाई वाली एक बेंच ने हाल ही में 15 पन्नों के अपने फैसले में यह टिप्पणी की है। द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि संबंधित विवाद में शामिल किसी भी पक्ष ने पूरी सच्चाई नहीं बताई, फिर भी उन्हें कोर्ट से खुद के सही साबित होने की पूरी उम्मीद लगी रही।
'बनावटी विवाद के निपटारे के लिए नहीं है अदालत'
जस्टिस नाथ ने कहा कि बेंच को इस केस में बहुत ही ज्यादा मेहनत करनी पड़ी क्योंकि, एक-एक तथ्य की छानबीन किया गया। क्योंकि, दोनों पक्षों ने अदालत से तथ्य छिपाए, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए और नई बातें जोड़ना तो इनके लिए आम बात थी।
न्याय-व्यवस्था कोई ऐसी सुविधा नहीं है, जिसका उपयोग पार्टी अपना हिसाब-किताब चुकता करने या अपनी वजह से ही दांव पर लगी अपनी साख बचाने या खुद के खड़े किए विवाद से लाभ उठाने के लिए करे। हम शुरू में ही यह बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं और आगे इसकी वजह भी बताएंगे कि न तो वादी और न ही प्रतिवादी, इस अदालत से साख के साथ लौटेगा।
जस्टिस विक्रम नाथ, सुप्रीम कोर्ट जज
क्या है 'बनावटी विवाद' का पूरा मामला
मामला एक दशक से भी ज्यादा पुराना है।
एक महिला ने महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पर यौन हमले का आरोप लगाया था।
महिला के मुताबिक इस केस में मौजूदा प्रतिवादी को उसने प्रोफेशनल लीगल एडवाइस के लिए बतौर वकील रखा था।
महिला का आरोप है कि वकील ने उस पुलिस अधिकारी से ही 'साठगांठ' कर ली और उसके हितों के खिलाफ काम किया।
यह भी दावा किया कि वकील ने उसकी गोपनीय जानकारी सार्वजनिक कर दी, जिससे एक वकील का अपनी क्लाइंट के प्रति प्रोफेशनल और नैतिक जवाबदेही का उल्लंघन हुआ।
महिला का आरोप था कि इससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। क्योंकि उसकी गरिमा, निजता को ठेस पहुंचा, मानसिक शांति भंग हुई और समाज में इज्जत पर भी असर पड़ा। इसकी एवज में उसने प्रतिवादी वकील से ₹2 करोड़ बतौर मुआवजे की मांग की।
'बनावटी विवाद' में आरोपी वकील की दलील
जब महिला की शिकायत पर यह मामला बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति में पहुंचा था तो आरोपी वकील ने दावा किया कि महिला ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ रेप या अन्य यौन हिंसा की शिकायत ही नहीं की थी।
वकील का कहना था कि यह मामला सिर्फ ड्यूटी ठीक से नहीं निभाने का था।
वकील ने यह भी दावा किया कि महिला एक रियलिटी टीवी शो में आना चाहती थी और पब्लिसिटी पाने और करियर चमकाने के लिए मामले को सनसनीखेज बनाने की कोशिश कर रही थी।
हालांकि बार काउंसिल ने वकील को दो साल के लिए रोल से हटा दिया और जुर्माना देने का आदेश दिया।
इस बीच एक अलग कार्रवाई में संबंधित पुलिस अधिकारी को उसपर लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में कैसे पहुंचा 'बनावटी विवाद' का मामला
महिला अपनी उस वकील को बार काउंसिल से मिली सजा बढ़ाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। वहीं वकील का कहना था कि उसपर लगे पेशेवर कदाचार के आरोप टिकने लायक नहीं हैं।
'ड्रामा उसके मेरिट का पैमाना नहीं होता'
जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, 'इस तरह के मुकदमों में एक खास तरह का मोह होता है, और हम इससे इनकार नहीं करते। लेकिन, अदालत कोई ऑडिटोरियम नहीं होती और किसी केस का ड्रामा उसके मेरिट का पैमाना नहीं होता।'
अगर इस पूरे नाटक को अलग रखकर देखें तो इन कार्यवाही से एक ऐसा विवाद सामने आता है, जिसे दो पक्षों ने आपस में ही बनाया, लंबा खींचा और देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचाया। सभी पक्षों को लगा कि हम इस तमाशे में इस तरह से उलझ जाएंगे कि इसे पैदा करने में उनके अपने रोल की ओर ध्यान ही नहीं दें पाएंगे। हमने ऐसा नहीं होने दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ, सुप्रीम कोर्ट
अदालत का समय जाया करने के लिए ₹5-5 लाख की वसूली
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दोनों पक्षों से न्यायपालिका का समय बर्बाद करने के लिए 5-5 लाख रुपये वसूलने का निर्देश दिया,जो समय उन लोगों के लिए था, जिन्हें सही मायने में न्यायपालिका के समय की जरूरत थी।
लेखक के बारे मेंअंजन कुमारअंजन कुमार, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में असिस्टेंट एडिटर हैं और पिछले 24 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता कर रहे हैं। अंजन अप्रैल 2025 में नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से जुड़े और बीते 10 वर्षों से डिजिटल मीडिया में राजनीति,चुनाव, जुडिशरी, डिफेंस, विदेश,करेंट अफेयर्स और बिजनेस जैसे विषयों पर लिख रहे हैं। डिजिटल मीडिया से जुड़ने के शुरुआती वर्षों में ये देश की एक टॉप लीडरशिप के आधिकारिक और राजनीतिक भाषणों और उनके पुस्तकों के संपादन कार्यों में भी योगदान दे चुके हैं। इन्होंने करियर का आरंभ टेलीविजन पत्रकारिता से किया और 14 वर्षों तक विभिन्न टीवी न्यूज चैनलों में सेवाएं दीं। इस कार्यकाल में इन्होंने सहारा समय नेशनल न्यूज चैनल पर 2006 में कन्या भ्रूण हत्या पर किए गए एक ऐतिहासिक स्टिंग ऑपरेशन पर बने'कोख में कत्ल' प्रोग्राम सीरीज को प्रोड्यूस किया, जो उन दिनों भारतीय संसद में भी छाया रहा। यहीं पर इन्होंने अगले ही साल पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम आंदोलन से जुड़े कार्यक्रमों पर न्यूज सीरीज बनाए, जिसकी देश की मीडिया में काफी चर्चा हुई। आगे के वर्षों में इसी चैनल पर 'मुर्दा, मवेशी, माफिया' प्रोग्राम सीरिज को भी पेश किया, जो दिल्ली-एनसीआर में मरे हुए मवेशियों का मांस बेचने वाली माफिया के खतरनाक स्टिंग ऑपरेशन पर आधारित था। ये 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव और 2004 के आम चुनावों से लेकर 2024 के आम चुनावों और 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव तक को टीवी और डिजिटल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म के लिए कवर कर चुके हैं।... और पढ़ें
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