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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 की संवैधानिकता पर चुनौती, सरकार को दिया गया 3‑सप्ताह का उत्तर अवधि

वी.एन. प्रसाद राव आदि द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि नया अधिनियम धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, क्योंकि इसमें धर्म परिवर्तन पर सार्वजनिक प्रकाशन, अनिवार्य पंजीकरण और कठोर दंड जैसे प्रावधान शामिल हैं। कोर्ट ने मामले की अंतरिम राहत पर सरकार से अपना पक्ष रखने के लिए तीन सप्ताह का समय प्रदान किया है।

7 अक्टूबर 2026 को 06:04 pm बजे
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 की संवैधानिकता पर चुनौती, सरकार को दिया गया 3‑सप्ताह का उत्तर अवधि

सौजन्य से:- ETV Bharat

छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती, अदालत ने साय सरकार से मांगा जवाब

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में धर्म स्वतंत्रता अधिनियम को लेकर याचिका दायर हुआ है. संजय कुमार यादव की रिपोर्ट

By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : October 7, 2026 at 10:49 PM IST

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की युगल पीठ के समक्ष छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 एवं छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता नियम 2026 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई हुई. यह याचिका वीएन प्रसाद राव एवं अन्य की ओर से उनके अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी के माध्यम से दाखिल की गई है.

माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की युगल पीठ के समक्ष मामले की वर्चुअल सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ एस मुरलीधर एवं अन्य ने पक्ष रखा. वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने न्यायालय के समक्ष दलील दी कि यह नया अधिनियम नागरिकों के अंतःकरण की स्वतंत्रता, धार्मिक अधिकार और निजता से जुड़े मौलिक अधिकारों का सीधा हनन करता है. संविधान के तहत किसी भी व्यक्ति का धर्म उसकी व्यक्तिगत गरिमा और निजी जीवन का अभिन्न अंग है, जिसे सार्वजनिक मंचों या प्रशासनिक अनुमतियों के अधीन नहीं किया जा सकता.

याचिका में उठाए गए प्रमुख बिंदु

अत्यधिक और जटिल प्रशासनिक हस्तक्षेप: अधिनियम के तहत यदि कोई नागरिक स्वेच्छा से भी धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे इसका सार्वजनिक प्रकाशन कराना होगा तथा कई प्रशासनिक विभागों व सरकारी अधिकारियों से स्वीकृतियां लेनी होंगी, जिसमें कम से कम 200 दिनों का समय लगता है.

अनिवार्य पंजीकरण का दबाव: धर्मांतरण कराने वाले किसी भी व्यक्ति या पुरोहित के लिए सरकार के पास अनिवार्य रूप से स्वयं को पंजीकृत कराना अनिवार्य किया गया है.

अति-कठोर दंडात्मक प्रावधान: नियमों की जटिलता के कारण स्वैच्छिक धर्मांतरण की स्थिति में भी धर्मांतरण करने वाले और कराने वाले दोनों को कई परिस्थितियों में उलझाकर आरोपी बनाए जाने का खतरा है. इसमें न्यूनतम 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तथा 10 लाख रुपये तक के भारी अर्थदंड के कठोर प्रावधान शामिल हैं.

धार्मिक स्थलों पर गैर-कानूनी कार्रवाई: अधिनियम के अस्पष्ट प्रावधानों की आड़ में प्रशासन द्वारा धार्मिक एवं पवित्र स्थलों को अवैध रूप से बंद कराया जा रहा है, जिससे आम नागरिक अपनी आस्था के अनुसार स्वतंत्र रूप से उपासना करने से वंचित हो रहे हैं.

मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की युगल पीठ ने अंतरिम राहत संबंधी आवेदन पर छत्तीसगढ़ सरकार से जवाब मांगा है. अदालत ने सरकार से अपना पक्ष और जवाब दाखिल करने के लिए 3 सप्ताह का समय दिया है.

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