दिल्ली रिक्शा गैंगरेप केस के दोषी को उम्रकैद की सजा से मुक्ति मिली: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली रिक्शा गैंगरेप केस के दोषी की सजा को कम करते हुए 20 साल की सजा सुनाई है, जिसमें वह छूट का लाभ भी पाएगा.

सौजन्य से:- ETV Bharat
दिल्ली रिक्शा गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, उम्रकैद की सजा घटाकर की 20 साल
कोर्ट ने दोषी की कम उम्र और अच्छे आचरण को देखते हुए राहत दी, साथ ही महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर टिप्पणी भी की.
By Sumit Saxena
Published : July 20, 2026 at 8:39 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सामूहिक दुष्कर्म के एक दोषी की सजा को कम कर दिया है. कोर्ट ने उसे 'बाकी बची पूरी जिंदगी जेल में काटने' की सजा की जगह 'छूट के साथ 20 साल के कारावास' की सजा सुनाई है. हालांकि, कोर्ट ने इस फैसले के साथ एक सख्त चेतावनी भी दी कि पुरुष-प्रधान (पितृसत्तात्मक) सोच आज भी महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों की मुख्य वजह बनी हुई है.
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, "पुरुष-प्रधान सोच की बेड़ियों को तोड़ने के लिए सामाजिक और मानसिक स्तर पर काफी बदलाव आने के बावजूद, इस तरह की घटनाएं आज भी बिना किसी डर या शर्म के लगातार हो रही हैं."
पीठ ने आगे कहा, "कानून में पिछले कुछ वर्षों में कई तरह के सुधार और संशोधन किए गए हैं, और भले ही उनका कुछ हद तक सकारात्मक असर पड़ा हो, लेकिन ऐसे अपराधों को जड़ से खत्म करने की तत्परता को थोड़ा भी कम नहीं किया जा सकता. हमें तब तक प्रयास जारी रखने होंगे जब तक कि ये घटनाएं केवल इतिहास का हिस्सा न बन जाएं और पूरा समाज इन्हें नफरत की नजर से न देखने लगे."
पीठ ने अपराध की गंभीरता को बरकरार रखते हुए, 2016 के सामूहिक दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए याचिकाकर्ता की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया. पीठ ने कहा, "ऊपर चर्चा किए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए और दोषी-अपीलकर्ता के पक्ष में पहले नोट किए गए कारणों पर विचार करते हुए, हम उसकी सजा को बदलकर छूट के लाभ के साथ 20 साल करना उचित समझते हैं. इस प्रकार, याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है."
अपने फैसले में, शीर्ष अदालत ने 'आनुपातिकता के सिद्धांत' का हवाला दिया और कहा कि सजा ऐसी होनी चाहिए जो अपराध को रोकने, समाज की सुरक्षा करने और दोषी के सुधरने की संभावना के बीच एक सही संतुलन बनाए रखे. पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि इस मामले में दोषी का पहले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है. जब यह अपराध हुआ तब उसकी उम्र केवल 25 साल थी. इतनी कम उम्र होने के कारण उसके सुधरने की पूरी गुंजाइश है.
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो कि इस व्यक्ति का सुधरना नामुमकिन है. साथ ही, सरकार दोषी की इस दलील को भी नहीं काट सकी कि जेल में बिताए गए पिछले लगभग 10 सालों (छूट मिलाकर) के दौरान उसका आचरण और व्यवहार बेहद अच्छा रहा है.
पीठ ने कहा कि चाहे जो भी हो, वह इस तथ्य से आंखें नहीं मूंद सकती कि यह अपराध, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, बेहद जघन्य है और यह न केवल पीड़िता के खिलाफ बल्कि पूरे समाज के खिलाफ है. पीठ ने कहा कि यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि जिस धारा (आईपीसी की धारा 376D) के तहत अपीलकर्ता को सजा सुनाई गई है, उसे 2013 के आपराधिक कानून संशोधन (2013 का अधिनियम 13) के जरिए बदला गया था. यह सख्त कानून राजधानी की सड़कों पर हुई भयावह 'निर्भया' घटना के बाद लाया गया था.
पीठ ने स्पष्ट किया कि इस अपराध के लिए न्यूनतम सजा बीस साल है, और अधिकतम सजा वही है जो इस अपीलकर्ता-दोषी पर लगाई गई थी यानी उसकी बची हुई पूरी प्राकृतिक जिंदगी के लिए आजीवन कारावास.
अदालत ने कहा, "यह बिल्कुल साफ तौर पर दिखाई देता है कि अपराध की प्रकृति को देखते हुए, विधायिका (संसद) ने पहले तो इसे एक स्वतंत्र अपराध बनाया और फिर इसके लिए एक न्यूनतम सजा का प्रावधान भी किया. इसलिए, अदालत के पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है और दोषी ठहराए जाने पर उसे कम से कम न्यूनतम सजा तो देनी ही होगी."
शीर्ष अदालत ने दोहराया कि सजा का उद्देश्य दंडात्मक, अपराध रोकने वाला और सुरक्षात्मक होना चाहिए. लेकिन यह जाति, धर्म या सामाजिक स्थिति जैसे अप्रासंगिक विचारों से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हो सकती.
नई दिल्ली के आई.पी. एस्टेट थाने में एक फोन आया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि दो आरोपियों ने पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया है. पीड़िता ने रात के समय दिल्ली रेलवे स्टेशन से इस भरोसे पर एक रिक्शा लिया था कि ड्राइवर उसे उसके घर छोड़ देगा. लेकिन ऐसा करने के बजाय, वह उसे एक सूनसान जगह पर ले गया जहां एक दूसरा व्यक्ति पहले से मौजूद था. फिर उन्होंने मिलकर बलात्कार के इस अपराध को अंजाम दिया.
इस मामले में 7 सितंबर 2016 को एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थी. इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने दोषी को उसकी बची हुई पूरी प्राकृतिक जिंदगी के लिए कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. पीड़िता को 25,000 रुपये का जुर्माना देने का भी निर्देश दिया था. दिल्ली हाई कोर्ट ने भी निचली अदालत के इस फैसले को बरकरार रखा था.
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