59 साल की लंबी लड़ाई के बाद मिला न्याय, जमीन विवाद में अदालत का ऐतिहासिक फैसला
बिहार के औरंगाबाद में 59 साल पुराने जमीन विवाद में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें तीसरी पीढ़ी को न्याय मिला। यह मामला 1967 में शुरू हुआ था और अब जाकर इसका निपटारा हुआ है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
दादा ने शुरू की लड़ाई, पोते को मिला इंसाफ.. बिहार में 59 साल पुराने जमीन विवाद में ऐतिहासिक फैसला
बिहार की औरंगाबाद कोर्ट ने 59 साल बाद तीसरी पीढ़ी के हक में फैसला सुनाया. जानिए कब शुरू हुई थी केस की सुनवाई, पढ़ें
Published : July 21, 2026 at 10:43 AM IST
औरंगाबाद: बिहार के औरंगाबाद के खखड़ा गांव के सूबेदार यादव को आखिरकार 59 साल के लंबे इंतजार के बाद कोर्ट से न्याय मिला है. सूबेदार यादव इस दीवानी मुकदमे को लड़ने वाली अपने परिवार की तीसरी पुश्त हैं. उनके दादा जगनारायण यादव ने वर्ष 1967 में इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत की थी. वर्तमान में यह जमीन विवाद औरंगाबाद व्यवहार न्यायालय का सबसे पुराना लंबित मुकदमा बन चुका था.
1967 में केस, 2026 में इंसाफ: यह ऐतिहासिक मामला मूल रूप से 10 अगस्त 1967 को तत्कालीन गया जिले की अदालत में दर्ज हुआ था. उस समय औरंगाबाद अलग जिला नहीं, बल्कि गया का ही एक हिस्सा था. बाद में औरंगाबाद नया जिला बनने पर इस केस को यहां स्थानांतरित किया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद प्रतिवादी मुंगेश्वर यादव पक्ष पहली बार 9 दिसंबर 1967 को कोर्ट में उपस्थित हुआ था.
जगनारायण यादव बनाम मुंगेश्वर यादव?: वादी पक्ष के वकील रविकांत वर्मा ने बताया, यह पूरा कानूनी विवाद खाता नंबर 31, प्लॉट नंबर 1488 की 3 कट्ठा विवादित भूमि पर रैयती हक घोषित करने के लिए लाया गया था. दोनों पक्ष जगनारायण यादव और मुंगेश्वर यादव खुद को रानी सैयदा खातून की जमींदारी सेटलमेंट का असली रैयत बता रहे थे. इसमें वादी के पास 25 जनवरी 1946 का पैमाना था, जबकि प्रतिवादी 21 अप्रैल 1945 के पैमाने को आधार बनाकर अपना दावा पेश कर रहा था.
गवाहों और वाद बिंदुओं का लंबा सफर: रविकांत वर्मा ने आगे बताया कि, अदालत में इस जमीन विवाद पर गवाही का सिलसिला 22 मई 1972 को शुरू हुआ था. इस बेहद लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान वादी पक्ष की तरफ से 12 गवाह पेश किए गए. वहीं प्रतिवादी पक्ष की ओर से 6 लोगों ने अपनी गवाही दर्ज कराई. अदालत के इस सफर में केस के कानूनी बिंदुओं को कुल पांच बार निर्धारित किया गया और अधिकांश मूल पक्षकारों की मौत भी हो चुकी है.
जमीन की कीमत और ऐतिहासिक फैसला: वर्ष 1971 में इस विवादित जमीन की कीमत को 100 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये तय किया गया था. अब सब जज अष्टम सह एसीजीएम-VII संदीप कुमार सिंह की अदालत ने स्वत्व वाद संख्या 96/67, 78/24 में सुनवाई पूरी की है. कोर्ट ने वादी सूबेदार यादव के पक्ष में अंतिम निर्णय सुनाकर जिले के न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है.
फैसले पर वादी पक्ष में खुशी: सोमवार को आए इस ऐतिहासिक फैसले के बाद वादी संख्या 04 सूबेदार यादव भावुक हो गए. उन्होंने बताया कि इस जमीन के लिए उनके दादा जगनारायण यादव ने मुकदमा शुरू किया था और आज 59 साल बाद उन्हें न्याय मिला है. उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास था कि देर से ही सही लेकिन कोर्ट से न्याय जरूर मिलेगा. कोर्ट परिसर में इस फैसले की काफी चर्चा है.
"59 साल के बाद न्याय मिला है. हमें कोर्ट पर भरोसा था. मेरे दादा के समय से ही यह केस चल रहा था. आखिर में न्यायालय ने हमारे पक्ष में फैसला सुनाया है. रैतयी हक मिला है." - सूबेदार यादव, जगनारायण यादव के पोते
फैसले की कॉपी का इंतजार: वहीं इस पूरे मामले पर प्रतिवादी पक्ष के वकील राजेंद्र यादव ने कहा कि, कोर्ट ने वादी पक्ष में फैसला सुनाया है. फैसले की कॉपी प्राप्त करने के लिए अदालत में आवेदन दिया गया है. कॉफी मिलने के बाद आगे की कार्रवाई के बारे में फैसला लिया जाएगा.
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