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₹20 की रिश्वत केस में 30 साल चली कानूनी लड़ाई, सुप्रीम कोर्ट ने दो कर्मचारियों को किया बरी

₹20 की रिश्वत केस में 30 साल चली कानूनी लड़ाई, सुप्रीम कोर्ट ने दो कर्मचारियों को किया बरी ट्रायल कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोनों कर्मचारियों को दोषी ठहराया और 2015 में गुजरात हाईकोर्ट ने उनकी सजा को बरकर…

20 अगस्त 2026 को 05:55 am बजे
₹20 की रिश्वत केस में 30 साल चली कानूनी लड़ाई, सुप्रीम कोर्ट ने दो कर्मचारियों को किया बरी

सौजन्य से:- ETV Bharat

₹20 की रिश्वत केस में 30 साल चली कानूनी लड़ाई, सुप्रीम कोर्ट ने दो कर्मचारियों को किया बरी

ट्रायल कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोनों कर्मचारियों को दोषी ठहराया और 2015 में गुजरात हाईकोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखा.

By Sumit Saxena

Published : August 20, 2026 at 11:02 AM IST

|Updated : August 20, 2026 at 11:33 AM IST

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 20 रुपये की रिश्वत के आरोप से शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया के तीन दशक बाद आखिरकार गुजरात के एक भ्रष्टाचार के मामले को खत्म कर दिया. इस मालमें में कोर्ट ने दो सरकारी कर्मचारियों को बरी कर दिया. यह मामला 1996 से चल रहा था.

जस्टिस उज्ज्वल भुयान और अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने बुधवार को एक तलाटी-सह-मंत्री (गाँव स्तर का रेवेन्यू अधिकारी) और उनके अधीन काम करने वाले एक चपरासी की सजा को रद्द कर दिया.

सिर्फ ए2 (चपरासी) के पास 20 रुपये का नोट होने से ही ए1 (तलाटी-सह-मंत्री) और A2 को 1988 के एक्ट की धारा 7, 12 और 13(1)(d) के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता. बेंच ने अपने फ़ैसले में कहा कि A2 का यह तर्क भी मुमकिन लगता है कि अगले दिन ईद का त्योहार था, इसलिए शिकायतकर्ता ने इनकम सर्टिफ़िकेट मिलने के बाद उसे 20 रुपये दिए थे.'

बेंच ने अपने फ़ैसले में कहा, 'A2 का यह तर्क भी मुमकिन लगता है कि अगले दिन ईद का त्योहार था, और इसलिए शिकायतकर्ता ने इनकम सर्टिफिकेट मिलने के बाद उसे 20 रुपये दिए.' बेंच ने कहा कि चपरासी से सिर्फ 20 रुपये बरामद होने के आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि रिश्वत की मांग साबित करने की बुनियादी शर्त पूरी नहीं हुई थी.

बेंच ने कहा, 'यह पाया गया है कि ए-1 के खिलाफ रिश्वत की मांग का आरोप साबित नहीं हुआ है, और साथ ही दोनों अदालतों ने यह माना है कि ए2 ने कोई मांग नहीं की थी. इसलिए यह साफ है कि अभियोजन पक्ष का मामला टिक नहीं सकता.'

बेंच ने कहा कि एक और जरूरी बात जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, वह यह है कि शिकायतकर्ता ने ए1 से इनकम सर्टिफिकेट मिलने के बाद ए-2 को 20 रुपये दिए थे. बेंच ने कहा कि यह एक और जरूरी पहलू है जिस पर विचार करने की जरूरत है, क्योंकि जिस इनकम सर्टिफिकेट के लिए रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था, वह पहले ही तैयार हो चुका था और शिकायतकर्ता को सौंप दिया गया था.

बेंच ने कहा, 'जब रिकॉर्ड पर मौजूद अभियोजन पक्ष की सामग्री के संदर्भ में इस स्थिति पर विचार किया जाता है, तो यह फिर से संदेह पैदा करता है क्योंकि इनकम सर्टिफिकेट विधिवत तैयार किया गया था और ए1 द्वारा शिकायतकर्ता को सौंप दिया गया था, जिसके बाद उसने ए-2 को 20रुपये दिए थे.'

बेंच ने आगे कहा, 'इस संबंध में लोकायुक्त पुलिस, दावणगेरे (सुप्रा) मामले के फैसले का हवाला दिया जा सकता है, जिसमें यह माना गया था कि केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि ऐसा भुगतान किसी मांग के कारण किया गया था.'

फरवरी 1996 में एक छात्र ने इनकम सर्टिफिकेट के लिए बेचरी ग्राम पंचायत कार्यालय से संपर्क किया, जिसकी जरूरत कुछ शैक्षिक रियायतें पाने के लिए थी. अभियोजन पक्ष का आरोप था कि तलाटी-सह-मंत्री ने सर्टिफिकेट जारी करने के लिए 120 रुपये की मांग की थी. 100 रुपये खुद के लिए और 20 रुपये चपरासी के लिए.

छात्र ने एंटी-करप्शन ब्यूरो से संपर्क किया, जिसने जाल बिछाया. ट्रायल कोर्ट ने 1999 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(d) के तहत दोनों कर्मचारियों को दोषी ठहराया और 2015 में गुजरात हाई कोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'ट्रायल कोर्ट का 30.11.1999 का फैसला जिसे हाईकोर्ट ने 22.01.2015 के अपने साझा फैसले में बरकरार रखा था. उसे रद्द कर दिया. अपीलकर्ताओं को 1988 के अधिनियम की धारा 7, 12 और 13(1)(d) के तहत दंडनीय अपराध करने के आरोप से बरी किया जाता है अपीलकर्ता अभी जमानत पर बाहर हैं. उनके जमानत बॉन्ड रद्द माने जाएंगे. इसके अनुसार, आपराधिक अपीलें स्वीकार की जाती हैं.'

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