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शराबबंदी से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने दी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी, ब्रेथ एनालाइजर को शराब पीने का सबूत नहीं समझा

पटना हाईकोर्ट ने शराबबंदी के एक मामले में ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट को शराब पीने का अंतिम सबूत नहीं माना, रक्त और मूत्र की जांच का उल्लेख किया। इससे पहले निचली अदालत में जवान द्वारा मुकदमा लड़ा गया था लेकिन कोई राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने कानूनी बारीकियों और वैज्ञानिक साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए जवान को राहत दी है।

26 जून 2026 को 06:23 am बजे
शराबबंदी से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने दी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी, ब्रेथ एनालाइजर को शराब पीने का सबूत नहीं समझा

सौजन्य से:- ETV Bharat

'ब्रेथ एनालाइजर शराब पीने की पुष्टि नहीं करता', 10 साल बाद BMP जवान को हाईकोर्ट ने दी राहत

पटना हाईकोर्ट ने कहा, ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट शराब पीने का अंतिम सबूत नहीं है. इसके लिए रक्त और मूत्र की वैज्ञानिक जांच जरूरी है.

Published : June 26, 2026 at 11:18 AM IST

पटना: बिहार सरकार ने अप्रैल 2016 में पूरे राज्य में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू कर दिया था. इसके तहत शराब बेचने, पीने और इसके कारोबार से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान बनाया गया है. इसी कानून के तहत समय-समय पर पुलिस छापेमारी और गिरफ्तारियां करती है.

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: शराबबंदी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है. कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट को किसी व्यक्ति द्वारा शराब सेवन का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता है. इस टेस्ट के वैज्ञानिक आधार पर कोर्ट ने सवाल उठाए हैं.

खून और यूरिन टेस्ट जरूरी: माननीय न्यायालय ने एक पुराने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति ने शराब का सेवन किया है या नहीं, इसे पूरी तरह साबित करने के लिए उसके रक्त और मूत्र की भी वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए. इन दोनों जांचों के बिना आरोप को अंतिम नहीं माना जा सकता.

दस साल पुराना मामला: यह पूरा मामला 24 नवंबर 2016 का है, जब बीएमपी 6 के पास तैनात जवान मनोज ठाकुर को नशे की हालत में हंगामा करने के आरोप में पकड़ा गया था. उस समय उत्पाद विभाग की टीम ने उसकी ब्रेथ एनालाइजर जांच की थी, जिसमें उसके शराब पीने की पुष्टि दिखाई गई थी.

निचली अदालत से झटका: पकड़े जाने के बाद जवान मनोज ठाकुर के विरुद्ध स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी. मनोज मुख्य रूप से बेगूसराय के गोशाला रोड का रहने वाला है. इस मामले की कानूनी लड़ाई पहले निचली अदालत में लड़ी गई, लेकिन वहां से जवान को कोई राहत नहीं मिल सकी थी.

हाईकोर्ट में की अपील: निचली अदालत से राहत नहीं मिलने पर पीड़ित जवान ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपील दायर की. हाईकोर्ट ने मामले के सभी पहलुओं पर गहन सुनवाई की. कोर्ट ने दोहराया कि ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट किसी भी व्यक्ति द्वारा शराब पीने का अंतिम और अचूक सबूत नहीं हो सकती.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला: पटना हाईकोर्ट ने अपने इस महत्वपूर्ण फैसले के दौरान देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों के पुराने आदेशों का हवाला दिया. कोर्ट ने कहा कि पुराने फैसलों से भी यह स्पष्ट है कि आरोपी के रक्त और मूत्र के नमूने की जांच कानूनी रूप से आवश्यक है.

दस साल बाद मिली राहत: अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ब्रेथ एनालाइजर के साथ-साथ रक्त और मूत्र की जांच रिपोर्ट मैच होने पर ही सजा का निर्धारण होना चाहिए. इस प्रकार कानूनी बारीकियों और वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए पटना हाईकोर्ट ने दस साल पुरानी इस लंबी लड़ाई के बाद जवान को बड़ी राहत दी है.

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