सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस को लेकर याचिका खारिज की, कहा - देश को डॉक्टरों की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने स्व-वित्तपोषित (प्राइवेट) संस्थानों की फीस को लेकर एक याचिका खारिज कर दी, लेकिन डॉक्टरों की जरूरत पर जोर दिया। अदालत ने छात्रों को याद दिलाया कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए स्कॉलरशिप (छात्रवृत्ति) का विकल्प हमेशा खुला रहता है।

सौजन्य से:- Jagran
सुप्रीम कोर्ट का प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस में दखल देने से इनकार, कहा- देश को डॉक्टरों की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस में दखल देने से इनकार किया, लेकिन देश में डॉक्टरों की जरूरत पर जोर दिया। ...और पढ़ें
HighLights
- निजी मेडिकल कॉलेज फीस पर सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार।
- कोर्ट ने डॉक्टरों की जरूरत और छात्रवृत्ति का विकल्प बताया।
- सरकारी डॉक्टरों की विशेषज्ञता को जनहित के लिए महत्वपूर्ण माना।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चिकित्सा शिक्षा का सपना देखने वाले युवाओं के संघर्ष और सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट से दो बड़े संदेश सामने आए हैं।
देश में डॉक्टरों की कमी और चिकित्सा शिक्षा की सुलभता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद मानवीय और व्यावहारिक रुख अपनाया है। एक तरफ जहां कोर्ट ने प्राइवेट मेडिकल कालेजों की फीस तय करने में दखल देने से मना कर दिया, वहीं दूसरी तरफ सरकारी सेवा में कार्यरत डाक्टरों की विशेषज्ञता को जनहित के लिए अनमोल बताया।
कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें आरोप लगाया गया था कि राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में फीस बहुत ज्यादा है।
फीस पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
राजस्थान के एक मेडिकल छात्र ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सालाना फीस 18.90 लाख से 25 लाख रुपये के बीच है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) की आठ लाख रुपये की सालाना आय सीमा के बिल्कुल विपरीत है।
ऐसे में ईडब्ल्यूएस वर्ग का कोई मेधावी छात्र डॉक्टर कैसे बनेगा? याचिकाकर्ता छात्र ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-यूजी)-2025 में शामिल हुआ था।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस दर्द को समझा, लेकिन व्यावहारिक पक्ष रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा, 'हमें इस देश में डॉक्टरों की जरूरत है।' लेकिन इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति यह मांग नहीं कर सकता कि स्व-वित्तपोषित (प्राइवेट) संस्थान भी सरकारी संस्थानों के बराबर ही फीस वसूलें।
कोर्ट ने छात्र को याद दिलाया कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए स्कॉलरशिप (छात्रवृत्ति) का विकल्प हमेशा खुला रहता है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इन्कार कर दिया।
निजी डॉक्टरों से बेहतर स्वास्थ्य सेवा देंगे सरकारी डॉक्टर
इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने तमिलनाडु का एक और संवेदनशील मामला आया। 'तमिलनाडु मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन' ने याचिका दायर कर मांग की थी कि शैक्षणिक वर्ष 2025-2026 के लिए खाली रह गईं 152 इन-सर्विस सुपर स्पेशियलिटी मेडिकल सीटों को 'अखिल भारतीय कोटा' में सरेंडर करने से रोका जाए।
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इस मामले पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट सहमत हो गया और केंद्र एवं तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया। पीठ ने सरकारी डॉक्टरों की भूमिका की सराहना करते हुए एक बेहद भावपूर्ण टिप्पणी की - 'एक सरकारी डाक्टर अगर उच्च कौशल और विशेषज्ञता हासिल करता है, तो वह किसी निजी डॉक्टर की तुलना में सार्वजनिक स्वास्थ्य की बेहतर सेवा कर सकेगा।'
कोर्ट ने माना कि सेवा में रहते हुए पढ़ाई करने वाले डॉक्टर एक विशेष श्रेणी में आते हैं। बहरहाल, इस मामले की अगली सुनवाई अब जुलाई में होगी।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
यह भी पढ़ें- 'ईश्वर' या 'सत्यनिष्ठा' के अलावा किसी अन्य नाम पर ली गई शपथ अमान्य: केरल हाई कोर्ट
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