न्यायिक पहुँच 24/7: सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा एसओपी पर
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक याचिका पर विचार किया, जिसमें देर रात गिरफ्तारी, सप्ताहांत या छुट्टियों के दौरान मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने पर जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर विचार करने के लिए तैयार हो गया है और उच्च न्यायालयों को नोटिस जारी किया है।

सौजन्य से:- Jagran
न्याय हर समय: सुप्रीम कोर्ट चौबीसो घंटे न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एसओपी तय करने पर करेगा विचार
सुप्रीम कोर्ट चौबीसों घंटे न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तय करने पर विचार कर रहा है। ...और पढ़ें
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट 24/7 न्याय पहुंच के लिए एसओपी पर विचार करेगा।
- देर रात गिरफ्तारी, छुट्टियों में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर याचिका।
- उच्च न्यायालयों को नोटिस जारी, प्रशासनिक समाधान पर जोर।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। न्याय चौबीस घंटे मिले। जब किसी की स्वतंत्रता या जीवन पर आसन्न संकट हो तो उस व्यक्ति के पास न्याय तक पहुंचने का विकल्प हो और इसके लिए एक एसओपी तय होनी चाहिए। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के सामने यही याचिका आयी थी और सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर विचार करने के लिए राजी हो गया है। हालांकि अभी भी आनलाइन फाइलिंग की चौबीसो घंटे सुविधा है।
मंगलवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बाग्ची और वी. मोहना की पीठ ने इस बारे में दाखिल मेहराविश रेन की याचिका पर उच्च न्यायालयों को नोटिस जारी किया है।
हालांकि सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई कि क्या अदालतों के चौबीसों घंटे खुले रहने का गलत इस्तेमाल गैर जरूरी मामलों की सुनवाई के लिए किया जा सकता है। इस बारे में सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) तैयार करने का काम सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक छोर के बजाए प्रशासनिक छोर से करना चाहिए।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि अदालतें बंद नहीं रह सकतीं, खासकर तब जब देर रात गिरफ्तारियां, सुबह-सुबह तोड़फोड़ की कार्रवाई और सप्ताहांत या छुट्टियों के दौरान डिपोर्टेशन या सरकारी कार्रवाई की विश्वस्नीय खबरें आ रही हों।
याचिकाकर्ता ने कहा कि अगर लगातार न्यायिक पहुंच सुनिश्चित करने वाला कोई व्यवस्थित संस्थागत तंत्र नहीं है, तो प्रभावित लोगों के संस्थागत अदालतों तक पहुंचने से पहले ही ऐसे नतीजे निकल सकते हैं जिन्हें बदला नहीं जा सकता। स्वतंत्रता की सुरक्षा अदालतों के कामकाज के समय की सीमाओं पर निर्भर नहीं रह सकती।
कानून के शासन से चलने वाले संवैधानिक लोकतंत्र में, संविधान रात में चुप नहीं रह सकता और न ही स्वतंत्रता की सुरक्षा अदालतों के खुलने के समय का इंतजार कर सकती हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि अदालतों का मौजूदा संस्थागत ढांचा न्यायिक उपायों तक पहुंच को काफी हद तक तय अदालती घंटों, कामकाजी दिनों और सीमित वेकेशन बेंचों तक ही सीमति रखता है।
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नतीजन स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के तत्काल उल्लंघन का सामना करने वाले नागरिक अक्सर रातों, सप्ताहांतों, सार्वजनिक छुट्टियों, और अदालती अवकाश के दौरान प्रभावी न्यायिक सहायता से वंचित रह जाते हैं। याचिका में ऐसे मामलों में न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए निर्देश मांगे गए हैं। मामले में याचिकाकर्ता ने स्वयं पेश होकर बहस की और बताया कि कैसी व्यवहारिक दिक्कतें हैं।
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