2 बच्चों का नियम बेकार: सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के नियम की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया
सुप्रीम कोर्ट ने भारत के बदलते जनसांख्यिकीय प्रोफाइल को देखते हुए 'दो बच्चों के नियम' की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया. अदालत ने टिप्पणी की कि अब इस नियम का कोई महत्व नहीं रह गया है. इससे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम के तहत इंगले को अयोग्य ठहराए जाने के फैसले को सही माना था.

सौजन्य से:- ETV Bharat
पंचायत चुनाव में 2 बच्चों का नियम बेकार, महाराष्ट्र मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने ने देश की घटती प्रजनन दर का हवाला देते हुए कहा कि केरल-तमिलनाडु की स्थिति यूरोप जैसी हो गई है.
By Sumit Saxena
Published : July 14, 2026 at 9:43 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पंचायत चुनावों के लिए महाराष्ट्र के 'दो बच्चों के नियम' को "बेकार" करार दिया. अदालत ने टिप्पणी की कि भारत के बदलते जनसांख्यिकीय प्रोफाइल को देखते हुए अब इस नियम का कोई महत्व नहीं रह गया है. इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने की.
पीठ महाराष्ट्र की एक पूर्व सरपंच, मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने तीसरा बच्चा होने पर खुद को चुनाव के लिए अयोग्य ठहराए जाने के फैसले को चुनौती दी है. याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रतीक आर बोम्बार्डे अदालत में पेश हुए. इससे पहले, बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम के तहत इंगले को अयोग्य ठहराए जाने के फैसले को सही माना था.
जस्टिस नरसिम्हा की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि वे आम तौर पर हाई कोर्ट के इस फैसले को खारिज कर देते, लेकिन निर्वाचित पंचायत का कार्यकाल अब लगभग समाप्त होने वाला है. पीठ को यह भी जानकारी दी गई कि सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में ही हाई कोर्ट के इस आदेश पर रोक लगा दी थी.
जस्टिस नरसिम्हा ने ध्यान दिलाया कि भारत की प्रजनन दर घटकर करीब 1.7 पर आ गई है. उन्होंने आगे कहा कि तमिलनाडु और केरल जैसे तटीय राज्यों में तो यह दर कुछ स्कैंडिनेवियाई (यूरोपीय) देशों से भी कम दर्ज की गई है. इंगले के वकील ने दलील दी कि प्रशासन ने उनकी मुवक्किल को तीसरा बच्चा होने की बात तय होने के बाद सरपंच के पद से अयोग्य घोषित कर दिया था.
जस्टिस नरसिम्हा ने भारत के बदलते जनसांख्यिकीय प्रोफाइल (आबादी के ढांचे) को देखते हुए दो बच्चों के नियम की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए. जस्टिस नरसिम्हा ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, "यह किस तरह की बेकार नीति है? 'जावेद बनाम हरियाणा राज्य' मामले के फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। देश बदल चुका है."
पीठ ने जनसंख्या वृद्धि को कम करने के उद्देश्य से बनाई गई इस नीति को जारी रखने के तर्क पर सवाल उठाए. वर्तमान जनसांख्यिकीय स्थिति का हवाला देते हुए पीठ ने कहा, "मौजूदा हालात में आबादी कम करने के लिए इस नीति को बनाए रखना पूरी तरह से असंवैधानिक है." पीठ ने यह भी जांचा कि क्या अन्य राज्यों में भी इसी तरह के दो बच्चों वाले अयोग्यता के नियम लागू हैं, और वकीलों को इस स्थिति की पुष्टि करने का निर्देश दिया.
पीठ ने महाराष्ट्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहीं वकील रुक्मिणी बोबडे को न्यायमित्र नियुक्त किया है, ताकि वे अन्य राज्यों में इस नियम के चलन के बड़े मुद्दे पर अदालत की सहायता कर सकें. पीठ ने ध्यान दिलाया कि कुछ राज्य अभी भी ऐसी अयोग्यता के प्रावधानों को जारी रखे हुए हैं, जबकि कुछ अन्य राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा देना (प्रोत्साहन देना) शुरू कर दिया है. पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, पीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई तय की है.
यह पूरा मामला महाराष्ट्र की काकोड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच के रूप में इंगले के चुने जाने से शुरू हुआ था. एक शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्यता मोल ली है, जो दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्तियों को पंचायत सदस्य या सरपंच का पद संभालने से रोकती है.
अक्टूबर 2024 में, बुलढाणा के अतिरिक्त कलेक्टर ने इंगले को अयोग्य घोषित कर दिया था. इसके बाद अमरावती संभाग के अतिरिक्त आयुक्त ने उनकी अपील को खारिज कर दिया था. हाई कोर्ट ने अगस्त 2025 में इन दोनों आदेशों को बरकरार रखा. इसके बाद इंगले ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
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