SC‑ST अत्याचार निवारण अधिनियम: दुरुपयोग के सवाल और कानूनी रोकों का विश्लेषण
1989 में दलित‑अधिवासी समुदाय के विरुद्ध अत्याचार रोकने व पीड़ितों को राहत प्रदान करने हेतु बनाया गया SC‑ST एक्ट, 2018 के संशोधन से बिना प्रारम्भिक जांच के FIR दर्ज कराना और अग्रिम जमानत पर रोक अनिवार्य की गई। जबकि व्यक्तिगत रंजिश या मुआवजा की लालच से दुरुपयोग के आरोप लगे हैं, न्यायालयें प्रथम दृष्टया फर्जी मामलों में बरी करने और झूठी शिकायतकर्ता पर दंड लगाने का अधिकार रखती हैं।

सौजन्य से:- Navbharat Times
SC-ST Act क्यों बनाया गया?
दरअसल, SC/ST समुदाय के सदस्यों के खिलाफ कथित अत्याचार रोकने, विशेष अदालतों की व्यवस्था करने और पीड़ितों को राहत व पुनर्वास देने के उद्देश्य से साल 1989 में संसद के जरिए बनाया गया था। इसके तहत अपराध, विशेष न्यायालय, विशिष्ट विशेष न्यायालय, अपील और पीडितों के राहत एवं पुनर्वास से जुड़े अनेकों अलग-अलग प्रावधान दर्ज हैं। कानून का मूल उद्देश्य केवल सजा देना नहीं बल्कि पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा भी है। इसलिए इसे सामान्य आपराधिक कानून के साथ पढ़ते समय इसके विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखना पड़ता है।
SC/ST Act के दुरुपयोग के आरोप आखिर क्यों
- बिना जांच के सीधी एफआईआर: वर्ष 2018 के संशोधन के अनुसार, इस अधिनियम के तहत शिकायत मिलने पर पुलिस को प्राथमिक जांच किए बिना सीधे एफआईआर दर्ज करनी होती है।
- अग्रिम जमानत पर पाबंदी: इस कानून के तहत दर्ज मामलों में आरोपी को आसानी से अग्रिम जमानत नहीं मिलती है।
- व्यक्तिगत रंजिश और संपत्ति विवाद: कई मामलों में यह देखा गया है कि लोग अपनी पुरानी दुश्मनी, जमीनी विवाद, या पैसों के लेन-देन के झगड़ों को सुलझाने के लिए इस अधिनियम का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करते हैं।
- मुआवजा राशि का लालच: अधिनियम के तहत पीड़ित को मिलने वाली आर्थिक सहायता और मुआवजे के प्रावधानों के कारण भी कुछ मामलों में झूठे मुकदमे दर्ज कराने की शिकायतें सामने आई हैं।
- बरी होने के आंकड़े: आलोचक अक्सर अदालतों में साक्ष्यों के अभाव में बरी होने वाले मामलों का हवाला देते हैं और यह दावा करते हैं यह इस बात का संकेत है कि कई मामले फर्जी थे।
SC/ST केस में अग्रिम जमानत मिलना मुश्किल क्यों होता है
एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अग्रिम जमानत मिलना मुश्किल है क्योंकि कानून की धारा 18 और 18A के तहत इस पर स्पष्ट कानूनी रोक है। अधिनियम की धारा 18 साफ करती है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की अग्रिम जमानत से जुड़ी धारा इस एक्ट के मामलों में लागू नहीं होगी। ऐसे में अग्रिम जमानत तभी मिल सकती है जब अदालत को यह स्पष्ट रूप से Prima Facie यानी पहली नजर में लगे कि शिकायत में एससी/एसटी एक्ट के तहत कोई भी संज्ञेय अपराध बनता ही नहीं है और मामला पूरी तरह से झूठा या निराधार है। हालांकि, ऐसे मामलों में राहत पाना बहुत दुर्लभ और कठिन होता है।
FIR के लिए एप्रूवल या शुरुआती जांच की जरूरत ही नहीं
इसमें बड़ी बात यह है कि SC/ST एक्ट (अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989) के तहत संसद द्वारा जोड़े गए धारा 18A के तहत यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस तुरंत एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्य है।इसीलिए ऐसे मामलों में FIR दर्ज करने के लिए पहले से पुलिस या किसी अन्य अधिकारी की अनुमति या शुरुआती जांच की जरूरत ही नहीं होती।
सरकार के 2018 संशोधन से और कड़ा हुआ कानून
साल 2018 में एससी/एसटी एक्ट (अत्याचार निवारण अधिनियम) में संशोधन करके धारा 18A जोड़ी थी, जिसके तहत कानून के मूल कड़े प्रावधानों को बहाल किया गया। जिसके तहत ही इसमें FIR दर्ज करने से पहले किसी भी तरह की प्रारंभिक जांच की आवश्यकता को खत्म कर दिया गया। साथ ही आरोपी की गिरफ्तारी के लिए किसी भी पूर्व अनुमति की जरूरत को खत्म कर दिया गया था। ऐसे मामलों में कानून के तहत अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक को पूरी तरह बहाल कर, इसे और कठोर बना दिया गया।
झूठा मामला होने पर अदालत का रास्ता बंद नहीं है
- एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत झूठा या फर्जी मामला दर्ज होने पर अदालत का रास्ता बिल्कुल बंद नहीं होता है और आरोपी के पास कानूनी सुरक्षा और बचाव के पूरे अधिकार होते हैं।
- Prathvi Raj Chauhan में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि शिकायत में प्रथम दृष्टया Act लागू ही नहीं होता, तो धारा 18 और 18A की रोक का लाभ अभियोजन को स्वतः नहीं मिलता। और अदालतें आरोपी को अग्रिम जमानत दे सकती हैं।
- यदि जांच में मुकदमा फर्जी साबित होता है, तो अदालत झूठी शिकायत करने वाले व्यक्ति के खिलाफ अलग से कानूनी वाद या आपराधिक कार्रवाई का निर्देश दे सकती है।
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