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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश से विधायक पेंशन पर जवाब मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य से 1980 के विधानमंडल पेंशन कानून पर जवाब मांगते हुए सुनवाई तय की। यह याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद आई है, जिसमें मौजूदा एवं पूर्व विधायकों और उनके परिवारों को दी जाने वाली पेंशन व सुविधाओं की वैधता पर प्रश्न उठाया गया था।

10 सितंबर 2026 को 05:04 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश से विधायक पेंशन पर जवाब मांगा

सौजन्य से:- Jagran

मौजूदा और पूर्व विधायकों की पेंशन-सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से मौजूदा और पूर्व विधायकों-विधानपरिषद सदस्यों की पेंशन व सुविधाओं से जुड़े 1980 के ...और पढ़ें

HighLights

- सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से विधायक पेंशन कानून पर जवाब मांगा।

- मौजूदा और पूर्व विधायकों की पेंशन व सुविधाओं की वैधता चुनौती में।

- इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी गई।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें 1980 के एक कानून के कुछ प्रविधानों की वैधता को चुनौती दी गई है। इस कानून में राज्य के मौजूदा और पूर्व विधायकों एवं विधानपरिषद सदस्यों के लिए पेंशन एवं अन्य सुविधाओं का प्रविधान है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति जताई, जिसमें इस साल मई में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ के एक फैसले को चुनौती दी गई थी।

हाई कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन-भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980 के कुछ प्रविधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि ये नियम मौजूदा और पूर्व विधायकों एवं विधानपरिषद सदस्यों को वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं प्रदान करते हैं।

इसके साथ ही, उनके जीवनसाथी और परिवार के सदस्यों को पारिवारिक पेंशन, मुफ्त यात्रा, मेडिकल सुविधाएं और अन्य लाभ भी देते हैं शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया और मामले की सुनवाई चार हफ्ते बाद के लिए निर्धारित कर दी।

याचिकाकर्ता 'लोक प्रहरी' ने हाई कोर्ट में यह दलील देते हुए याचिका दायर की थी कि राज्य विधानसभा ने असल में खुद को ‘अपने ही मामले में न्यायाधीश’ बना लिया है।

उसने खुद को और अपने पूर्व सदस्यों को इस तरह से फायदे पहुंचाए हैं जो स्पष्ट रूप से मनमाने है और उस बुनियादी संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है जिसके अनुसार सार्वजनिक पद जनसेवा के लिए होता है, न कि निजी फायदे के लिए। हाई कोर्ट ने कहा था कि ये प्रविधान संविधान के अनुच्छेद 195 के तहत मिली सीमित शक्तियों से आगे जाते हैं।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

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