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डिजिटल ज़मीन म्यूटेशन अनिवार्य नहीं, पर ऑनलाइन आवेदन को बढ़ावा – झारखंड हाई कोर्ट का फैसला

झारखंड हाई कोर्ट ने कहा कि राजस्व अधिकारी जमीन के दाखिल‑खारिज के लिये ऑनलाइन आवेदन करवा सकते हैं और यह 1973 के टेनेंट्स होल्डिंग्स एक्ट की धारा 11 का उल्लंघन नहीं है। न्यायालय ने डिजिटल युग में पारदर्शिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया, साथ ही ग्रामीण एवं डिजिटल सुविधा‑रहित क्षेत्रों के लिए पंचायत, प्रज्ञा केंद्र या वैकल्पिक सहायता के प्रावधानों का उल्लेख किया।

10 सितंबर 2026 को 06:05 pm बजे
डिजिटल ज़मीन म्यूटेशन अनिवार्य नहीं, पर ऑनलाइन आवेदन को बढ़ावा – झारखंड हाई कोर्ट का फैसला

सौजन्य से:- Jagran

जमीन म्यूटेशन पर ऑनलाइन आवेदन मांगना कानून का उल्लंघन नहीं, झारखंड हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला

झारखंड हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि राजस्व अधिकारी जमीन के दाखिल-खारिज के लिए ऑनलाइन आवेदन पर जोर दे सकते हैं।

HighLights

- ऑनलाइन दाखिल-खारिज आवेदन पर जोर देना कानून का उल्लंघन नहीं।

- डिजिटल युग में पारदर्शिता हेतु ऑनलाइन प्रक्रिया को बढ़ावा देना उचित।

- डिजिटल सुविधा वंचितों के लिए वैकल्पिक सहायता का भी प्रावधान।

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने जमीन के म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि राजस्व अधिकारी आवेदक से ऑनलाइन म्यूटेशन आवेदन जमा करने पर जोर दे सकते हैं।

ऐसा करना बिहार टेनेंट्स होल्डिंग्स (मेंटेनेंस आफ रिकार्ड्स) एक्ट, 1973 की धारा 11 का उल्लंघन नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में भले ही ऑनलाइन आवेदन शब्द का उल्लेख नहीं है, लेकिन वर्तमान डिजिटल युग में आवेदन की प्रक्रिया को केवल आफलाइन यानी भौतिक आवेदन तक सीमित नहीं किया जा सकता।

इस संबंध में जमशेदपुर निवासी मदन मोहन प्रसाद की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता ने मानगो के वार्ड नंबर 10 स्थित खाता नंबर 427, प्लाट नंबर 2160, 2.40 हेक्टेयर जमीन का म्यूटेशन अपने नाम करने की मांग की थी।

सर्किल ऑफिसर ने केवल इस आधार पर आफलाइन आवेदन लेने से इनकार कर दिया था कि आवेदन ऑनलाइन जमा नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कानून की धारा 11 में केवल निर्धारित प्रपत्र में आवेदन देने की बात कही गई है।

इसमें ऑनलाइन आवेदन अनिवार्य करने का कोई प्रविधान नहीं है। राज्य सरकार ने ऑनलाइन व्यवस्था का बचाव करते हुए कहा कि इससे अवैध रसीद जारी करने पर रोक, पारदर्शिता और म्यूटेशन की प्रक्रिया की निगरानी सुनिश्चित होती है।

हाई कोर्ट ने कहा कि 1973 में जब कानून बनाया गया था, उस समय डिजिटल व्यवस्था की कल्पना भी नहीं थी। आज रिकार्ड का डिजिटलीकरण और ऑनलाइन व्यवस्था पारदर्शिता बढ़ाने के साथ फाइलों की आवाजाही में होने वाली देरी और भौतिक रिकार्ड में हेरफेर की संभावना को कम करती है।

हालांकि, अदालत ने डिजिटल सुविधा से वंचित लोगों की परेशानी को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में डिजिटल सुविधाएं समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं।

ऐसे आवेदक पंचायतों के सुविधा केंद्र, प्रज्ञा केंद्र, मोबाइल ई-सेवा केंद्र या विधिक सेवा प्राधिकरण के पैरा लीगल वालेंटियर की मदद ले सकते हैं।

अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए मदन मोहन प्रसाद को तत्काल ऑनलाइन आवेदन करने का निर्देश दिया। किसी प्रकार की परेशानी होने पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से सहायता लेने को कहा गया। ऑनलाइन आवेदन दाखिल होने के बाद संबंधित अधिकारी को उस पर निर्णय लेकर आवेदक को सूचित करना होगा।

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