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रिकवरी के बाद पूछताछ के नाम पर हिरासत उचित नहीं, हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश पलटा; आरोपी को राहत - punjab haryana high court ruling on custodial interrogation bail

रिकवरी के बाद पूछताछ के नाम पर हिरासत उचित नहीं, हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश पलटा; आरोपी को राहत पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा है कि केवल अतिरिक्त जानकारी हासिल करने के लिए आरोपी की पुलिस हिरासत नहीं मांगी जा स…

Jagran के अनुसार6 जून 2026 को 06:45 pm बजे
रिकवरी के बाद पूछताछ के नाम पर हिरासत उचित नहीं, हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश पलटा; आरोपी को राहत
 - punjab haryana high court ruling on custodial interrogation bail

सौजन्य से:- Jagran

रिकवरी के बाद पूछताछ के नाम पर हिरासत उचित नहीं, हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश पलटा; आरोपी को राहत

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा है कि केवल अतिरिक्त जानकारी हासिल करने के लिए आरोपी की पुलिस हिरासत नहीं मांगी जा सकती। अदालत ने आबकारी अधिनियम माम ...और पढ़ें

HighLights

बरामदगी के बाद अतिरिक्त जानकारी हेतु हिरासत अनुचित।

हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश पलटा।

आरोपी की अंतरिम अग्रिम जमानत स्थायी की गई।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी से और अधिक जानकारी हासिल करने के लिए मात्र उसे पुलिस हिरासत में लेना कानून सम्मत नहीं है। अदालत ने कहा कि रिकवरी हो जाने के बाद केवल अतिरिक्त जानकारी निकलवाने के उद्देश्य से कस्टोडियल इंटेरोगेशन (हिरासत में पूछताछ) की मांग नहीं की जा सकती।

ऐसा करना दबाव या जबरदस्ती के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास माना जाएगा। जस्टिस संजय वशिष्ठ ने यह टिप्पणी बठिंडा जिले के फूल थाना में दर्ज पंजाब आबकारी अधिनियम के एक मामले में आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए की। अदालत ने सत्र अदालत द्वारा वापस ली गई अंतरिम अग्रिम जमानत को बहाल करते हुए उसे स्थायी कर दिया।

मामले के अनुसार आरोपी पर अवैध शराब बनाने और रखने का आरोप था। बठिंडा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने प्रारंभ में आरोपी को अंतरिम अग्रिम जमानत देते हुए जांच में शामिल होने के निर्देश दिए थे। उस समय अदालत ने माना था कि मकान के स्वामित्व और कब्जे से जुड़े कुछ पहलुओं की जांच बाकी है, लेकिन आरोपी की हिरासत आवश्यक नहीं है।

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पूछताछ के लिए फिर मांगी गई हिरासत

बाद में जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि आरोपी 19 मई को जांच में शामिल हो चुका है और उसके मामले में 400 लीटर लाहन तथा 10 लीटर अवैध शराब की बरामदगी भी हो चुकी है। हालांकि अधिकारी ने यह दलील दी कि आरोपी से यह पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है कि शराब बनाने का सामान उसे किसने उपलब्ध कराया और तैयार की गई शराब किन लोगों को बेची जानी थी।

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इस दलील के आधार पर सत्र अदालत ने अंतरिम संरक्षण वापस लेते हुए अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने इस आदेश को गलत ठहराया।

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पुलिस के आधार को बताया गलत

जस्टिस वशिष्ठ ने कहा कि सत्र अदालत ने यह जांचने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया कि रिकवरी हो जाने और आरोपी के जांच में शामिल होने के बाद वास्तव में हिरासत की जरूरत थी भी या नहीं। अदालत ने कहा कि यदि जांच एजेंसी उन लोगों की पहचान नहीं कर पा रही है जिन तक कथित रूप से शराब पहुंचाई जानी थी या जिनसे उपकरण खरीदे गए थे, तो यह आरोपी की अग्रिम जमानत समाप्त करने का वैध आधार नहीं बन सकता।

जांच एजेंसी की यह जिम्मेदारी है कि वह कानूनी और पेशेवर तरीकों से साक्ष्य जुटाए तथा अन्य संभावित आरोपियों तक पहुंचे।हाई कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी द्वारा अंतरिम जमानत का कोई दुरुपयोग नहीं किया गया था। न तो जांच में सहयोग न करने का आरोप था और न ही किसी शर्त के उल्लंघन का।

अंतरिम जमानत को किया स्थायी

ऐसे में केवल अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए हिरासत की मांग उचित नहीं थी। अदालत ने अपने पुनरीक्षण अधिकारों का प्रयोग करते हुए सत्र अदालत के आदेश का वह हिस्सा रद्द कर दिया, जिसमें अंतरिम संरक्षण वापस लिया गया था। साथ ही आरोपी को दी गई अंतरिम अग्रिम जमानत को स्थायी कर दिया और उसे आवश्यकता पड़ने पर जांच में शामिल होते रहने के निर्देश दिए।

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