अदालत ने पुलिस‑प्रशासन की मनमानी कारवाइयों पर लगाई कड़ी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी नोटिस को रद्द किया, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के मजदूर आंदोलन में आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को खारिज कर 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया। दोनों फैसलों में न्यायालयों ने मनमानी कार्रवाई को ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ की चेतावनी के साथ निंदा की और लोकतंत्र में शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार को सुदृढ़ किया।

सौजन्य से:- Pravakta.Com
ज्ञान चंद पाटनी
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने, सरकार बनाने और बहुमत के आधार पर शासन चलाने भर का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली पहचान इस बात से होती है कि सत्ता से असहमति रखने वाले नागरिकों के साथ राज्य का व्यवहार कैसा है। क्या सरकार आलोचना सुनने को तैयार है? क्या कोई छात्र, मजदूर, कर्मचारी या आम नागरिक अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकता है? किसी भी लोकतांत्रिक शासन में सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने मात्र से किसी व्यक्ति को सीखचों में बंद नहीं किया जा सकता। इस लिहाज से हाल ही आए अदालतों के दो फैसले महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शन से जुड़े मामले में एक विद्यार्थी अक्षत त्रिपाठी को जारी किए गए नोटिस को रद्द करते हुए तीखी टिप्पणी की और कार्रवाई पर सवाल उठाया। इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा में मजदूरों के आंदोलन से जुड़े मामले में एक्टिविस्ट और छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत को रद्द करते हुए कड़ी फटकार लगाई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आकृति को 5 लाख रुपए का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। न्यायालय ने कहा कि यह रकम गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट मेधा रूपम और इसके लिए जिम्मेदार अन्य पुलिस अफसरों से वसूली जाए।
कोर्ट ने कहा कि कि अफसरशाही का तानाशाहीपूर्ण रवैया जारी रहा तो उत्तर प्रदेश एक ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया ‘में बदल सकता है। ऑर्वेलियन डिस्टोपिया शब्द मशहूर अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल के नाम से बना है, जिन्होंने अपने उपन्यास “1984” में एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जहां सरकार हर नागरिक की निगरानी करती है। साथ ही सच को झूठ में बदल देती है और असहमति जताने वालों को कुचल दिया जाता है। जब भी किसी लोकतांत्रिक देश में प्रशासन मनमाने तरीके से लोगों को हिरासत में लेता है, झूठे आरोप गढ़ता है या असहमति की आवाज को दबाता है, तो उसकी तुलना अक्सर ऑर्वेलियन डिस्टोपिया से की जाती है।
दोनों मामलों का संदेश एक ही है। यानी शांतिपूर्ण असहमति लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के दौर में पुलिस—प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल लगातार गंभीर होता जा रहा है। भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होकर अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रदर्शन करने की आजादी असीमित है। हिंसा, तोड़फोड़, सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीर रूप से बाधित करना या हिंसा के लिए उकसाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
अप्रेल की शुरुआत में नोएडा में मजदूरों का बड़ा आंदोलन हुआ था। प्रदर्शन के दौरान स्थिति बिगड़ने पर हिंसा भी हुई थी। इसलिए आंदोलनकारियों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। आंदोलन के दौरान हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसके बावजूद कठोर कानूनों का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए किया जाने लगे, तो संविधान में दिए गए अधिकार कागज पर तो मौजूद रहेंगे, लेकिन उनका वास्तविक अर्थ कहीं खो जाएगा। लोकतंत्र में सरकार जनता से ऊपर नहीं होती। वह जनता के प्रति जवाबदेह होती है। इसलिए जब कोई समूह अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरता है तो पहला सवाल यह होना चाहिए कि उसकी शिकायत क्या है और उसका समाधान कैसे हो सकता है। प्रदर्शन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना ठीक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन फैसलों से यह उम्मीद जरूर बनती है कि कार्यपालिका की शक्ति पर संवैधानिक नियंत्रण अभी खत्म नहीं हुआ है। इसके बावजूद यह बात माननी पड़ेगी कि लोकतंत्र की सेहत केवल अदालतों के फैसलों से ही सुरक्षित नहीं रह सकती। यह बात समझनी होगी कि हर नागरिक में अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने की क्षमता नहीं होती। ऐसे कई लोग होंगे जो इसी तरह के मामलों में लंबे समय तक हिरासत, मुकदमे या प्रशासनिक दबाव झेलते रहते हैं और उनकी आवाज कोई नहीं सुनता। यदि किसी व्यक्ति को अंततः अदालत से राहत मिल भी जाए, तब तक उसकी पढ़ाई, नौकरी, प्रतिष्ठा और मानसिक शांति पर असर पड़ चुका होता है। इसलिए अनावश्यक पुलिस कार्रवाई भी नागरिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है।
लोकतंत्र में पुलिस और प्रशासन का काम असहमति को खत्म करना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में व्यवस्था बनाए रखना है। इसके लिए अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश देने, जवाबदेही तय करने और स्वतंत्र निगरानी की जरूरत है। किसी व्यक्ति के खिलाफ एनएसए जैसे सख्त कानून के तहत कार्रवाई से पहले यह गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि क्या वास्तव में उसके इस्तेमाल की जरूरत भी है या नहीं? क्या सामान्य कानून पर्याप्त नहीं है? क्या आरोप ठोस सबूतों पर आधारित हैं? क्या अपराध में संबंधित व्यक्ति की भूमिका स्पष्ट है? अदालतों की हालिया टिप्पणियां इसी दिशा में चेतावनी हैं। वे यह याद दिलाती हैं कि सरकारी पद पर बैठना असीमित शक्ति का लाइसेंस नहीं है।
अदालतों ने फिलहाल एक महत्वपूर्ण संवैधानिक रेखा खींची है कि नागरिकों के अधिकारों को मनमाने ढंग से नहीं कुचला जा सकता। इस रेखा का सम्मान केवल न्यायपालिका का दायित्व नहीं है। कार्यपालिका और राजनीतिक नेतृत्व को भी इसे समझना होगा। भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र में असहमति को दबाना संभव भी नहीं है।
जिस लोकतंत्र में जनता को सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार नहीं बचता, वहां चुनाव तो हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक आत्मा कमजोर पड़ जाती है।जंतर-मंतर हो या नोएडा का औद्योगिक क्षेत्र, विश्वविद्यालय परिसर हो या कोई छोटा कस्बा, शांतिपूर्ण विरोध की जगह बची रहनी चाहिए। अदालतों ने अपना संवैधानिक दायित्व निभाते हुए कार्यपालिका को आईना दिखाया है। अब सरकारों की बारी है। उन्हें यह समझना होगा कि आलोचना शासन के खिलाफ साजिश नहीं होती और शांतिपूर्ण विरोध राष्ट्र-विरोध नहीं होता। नागरिकों की आवाज को दबाने की बजाय सुनने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दोनों मामलों से युवा जुड़े हैं। यह संयोग नहीं है। भारत एक युवा देश है। युवा शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, वेतन, अवसर और भविष्य से जुड़े सवालों को लेकर सबसे अधिक मुखर हैं। उनके हाथ में स्मार्टफोन हैं, सोशल मीडिया है और अपनी बात व्यापक स्तर पर पहुंचाने की क्षमता है। ऐसे समाज में असहमति को रोकना आसान नहीं होगा। सवाल यह है कि सरकारें इस बदलते सामाजिक वातावरण को कैसे देखती हैं। यदि सरकारें युवाओं की शिकायतों को सुनने के बजाय हर विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या समझेंगी, तो असंतोष कम नहीं होगा। उलटे वह और गहरा हो सकता है। जंतर-मंतर से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक हुए आंदोलनों ने बार-बार यह दिखाया है कि जब सामान्य संस्थागत रास्तों से आवाज नहीं सुनी जाती, तो लोग सार्वजनिक स्थानों पर अपनी बात रखने के लिए मजबूर होते हैं। इसलिए लोकतांत्रिक सरकार के लिए विरोध प्रदर्शन असफलता का प्रमाण नहीं होना चाहिए। वह शासन को यह बताने वाला संकेत है कि समाज के किसी हिस्से में असंतोष मौजूद है।
ज्ञान चंद पाटनी
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