कोर्ट सम्मन का वास्तविक अर्थ और अनदेखी पर संभावित दण्ड
समान (Summons) अदालत की ओर से जारी किया गया औपचारिक नोटिस है, जिससे व्यक्ति को निर्धारित तिथि और स्थान पर उपस्थिति के लिए कहा जाता है, यह आरोप या गिरफ्तारी का आदेश नहीं है। सम्मन में दी गई जानकारी को ध्यानपूर्वक पढ़कर, आवश्यकतानुसार वकील से सलाह लेकर या न्यायालय को आवेदन करके अनुपस्थिति की वजह बताना चाहिए, क्योंकि BNSS 2023 की धारा 90 के तहत अनदेखी करने पर गिरफ्तारी वारंट और अन्य कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

सौजन्य से:- navbharattimes.indiatimes.com
न्यायालय से आने वाला Summons या सम्मन एक औपचारिक कानूनी सूचना है। इसके जरिए अदालत किसी व्यक्ति को तय तारीख और समय पर उसके सामने उपस्थित होने के लिए कहती है।
नई दिल्ली: कानूनी प्रक्रियाओं में सम्मन या Summons को एक अहम कानूनी कार्यवाही माना जाता है। कई लोगों को जब कोर्ट से सम्मन मिलता है तो वे इसे गिरफ्तारी का आदेश समझ लेते हैं, जबकि दोनों अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। सम्मन का मूल उद्देश्य संबंधित व्यक्ति को अदालत के सामने उपस्थित होने की सूचना देना है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि सम्मन को नजरअंदाज किया जा सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS, 2023 में अदालत को सम्मन का पालन नहीं होने पर कुछ परिस्थितियों में गिरफ्तारी वारंट जारी करने की भी पॉवर दी गई है।
कोर्ट का 'सम्मन' आखिर होता क्या है?
दरअसल सम्मन को लेकर जो भ्रम है वह गलत है। सम्मन, अदालत की ओर से जारी किया गया औपचारिक आदेश या नोटिस है, जिसके जरिए किसी व्यक्ति को निर्धारित समय और स्थान पर अदालत में उपस्थित होने के लिए कहा जाता है। आपराधिक प्रक्रिया में यह आरोपी, गवाह या मामले से संबंधित अन्य व्यक्ति को अदालत के समक्ष बुलाने का माध्यम हो सकता है। सम्मन में सामान्यतः संबंधित मामले और अदालत में उपस्थिति से जुड़ी आवश्यक जानकारी होती है। इसलिए इसे सामान्य डाक या किसी निजी नोटिस की तरह नजरअंदाज करना सही नहीं है।
सम्मन मिलने के बाद क्या करना चाहिए?
सम्मन में क्या लिखा गया है, वह खास है। इसलिए सबसे पहले सम्मन को ध्यान से पढ़कर केस नंबर, अदालत का नाम, तारीख और उपस्थिति का उद्देश्य समझना चाहिए। इसके बाद संबंधित मामले की स्थिति जानने और यह तय करने के लिए कि व्यक्तिगत उपस्थिति जरूरी है या किसी कानूनी प्रावधान के तहत छूट मिल सकती है। यदि न समझ आए तो मामले में वकील से सलाह लेना उचित है। यदि किसी खास वजह से तारीख पर खुद हाजिर होना संभव नहीं है, तो अदालत के सामने उचित आवेदन देकर राहत मांगी जा सकती है। बिना कोई कार्रवाई किए तारीख निकल जाने देना सबसे जोखिम भरा विकल्प हो सकता है।
सम्मन आने का मतलब क्या व्यक्ति आरोपी है?
ऐसा होना कोई जरूरी ही नहीं है। किसी व्यक्ति को अदालत में गवाही देने या किसी कार्यवाही में उपस्थित होने के लिए भी बुलाया जा सकता है। दूसरी ओर, यदि किसी आपराधिक मामले में आरोपी के रूप में सम्मन जारी हुआ है तो उसे तय तारीख पर अदालत के निर्देश का पालन करना होगा। इसलिए सबसे पहले सम्मन में यह देखना जरूरी है कि व्यक्ति को आरोपी, गवाह या किसी अन्य भूमिका में बुलाया गया है।
सम्मन को 'नजरअंदाज' करने की गलती नहीं करें
ऐसे मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, BNSS 2023 की धारा 90 के तहत अदालत कुछ परिस्थितियों में सम्मन के बजाय या उसके साथ गिरफ्तारी वारंट जारी कर सकती है।
खास तौर पर यदि अदालत को लगे कि व्यक्ति सम्मन का पालन नहीं करेगा या सम्मन विधिवत तामील होने के बावजूद वह तय तारीख पर उपस्थित नहीं हुआ और कोई उचित कारण नहीं बताया गया, तो वारंट जारी किया जा सकता है।
मतलब साफ है। सम्मन की अनदेखी या नजरअंदाज करने की लापरवाही ठीक नहीं। सम्मन की अनदेखी आगे चलकर गिरफ्तारी की स्थिति पैदा कर सकती है।
यदि व्यक्ति लगातार अदालत के आदेशों का पालन नहीं करता और उसके खिलाफ आगे की प्रक्रिया शुरू होती है, तो मामला केवल सम्मन तक सीमित नहीं रह सकता। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, BNSS 2023 में ऐसे व्यक्ति के खिलाफ प्रोक्लेमेशन यानी उद्घोषणा और कुछ परिस्थितियों में संपत्ति की अटैच किए जाने की भी प्रक्रियाओं का प्रावधान है। हालांकि ये कदम हर गैरहाजिरी के मामले में स्वतः नहीं उठते और इनके लिए कानून में निर्धारित शर्तें पूरी होना जरूरी है। इसलिए सम्मन मिलने के बाद समय पर कानूनी कदम उठाना कहीं सुरक्षित है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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