न कानून के नाम पर, न मजहबी रिवाजों की आड़ में - इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानून की आड़ में कोई अपराध किया जा सकता है, तो ऐसे मामलों में POCSO Act और आपराधिक कानून सबसे ऊपर हैं

सौजन्य से:- Navbharat Times
Allahabad High Court Halala & Double Halala: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में टिप्पणी में कहा है कि निकाह, तलाक, हलाला, और डबल हलाला जैसी मजहबी प्रथाओं की आड़ में किए जाने वाले दुष्कृत्य और अपराध, मजहब या व्यक्तिगत कानून के नाम पर नजरअंदाज नहीं किए जा सकते।
नई दिल्ली : मुस्लिम परिवार में क्या तलाक, हलाला, और डबल हलाला जैसे परंपराएं मनमाने यौन शोषण का जरिया बन गई हैं? हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है इन मजहबी प्रथाओं की आड़ में किए जाने वाले दुष्कृत्य और अपराध, मजहब या व्यक्तिगत कानून के नाम पर नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। हाईकोर्ट ने 2016 के कथित निकाह, हलाला और डबल हलाला के दौरान नाबालिग से दुष्कर्म और गैंगरेप के आरोपों से जुड़े मामले में दर्ज F.I.R. रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ दोहराया कि कि यदि मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानून की आड़ में कोई अपराध किया जाता है, तो ऐसे मामलों में POCSO Act और आपराधिक कानून सबसे उपर हैं।
नाबालिग से परिवार में ही दुष्कर्म और 'डबल हलाला' और गैंग रेप
मामला उत्तर प्रदेश के एक मुस्लिम परिवार का है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में जो एफआईआर लिखी गई थी उसके अनुसार, पीड़िता की साल 2015 में 15 साल छोटी उम्र में मुख्य आरोपी से निकाह कराया गया। साल 2016 में ट्रिपल तलाक के बाद कथित तौर पर 'हलाला' के नाम पर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। बाद में साल 2025 में दोबारा विवाह के लिए कथित 'डबल हलाला' के बहाने आरोपी के भाइयों और अन्य लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस संबंध में नौ लोगों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज हुई। आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने खिलाफ F.I.R. रद्द करने की मांग की।
मामले की सुनवाई जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने की।
विवाद मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा है और निकाह, हलाला, डबल हलाला जैसे रिवाज, मजहबी रिवाजों का हिस्सा है। अदालत ने इन दलीलों को प्रथम दृष्टया स्वीकार नहीं किया और जांच जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।
न्यायधीशों ने पाया कि कि पहली नजर में यह एक नाबालिग के यौन शोषण और बाद में गैंगरेप का गंभीर मामला है, जिसकी विस्तृत पुलिस जांच आवश्यक है।
कहा कि जब किसी मामले में संज्ञेय आपराधिक अपराध के आरोप हों, तब मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानूनों की आड़ लेकर कार्रवाई से बचने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि विवाह या मजहबी रिवाजों का सवाल अपनी जगह है, लेकिन यदि उसी के दौरान कोई आपराधिक कृत्य होता है तो भारतीय आपराधिक कानून लागू होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि मजहबी रिवाज किसी व्यक्ति को दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध से संरक्षण नहीं दे सकतीं। इसलिए एफआईआर को शुरुआती चरण में रद्द करना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि यदि कथित घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी तो POCSO Act पूरी तरह लागू होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्तिगत कानून या मजहबी रिवाज के कारण POCSO के प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि नाबालिगों के यौन शोषण के मामलों में कानून बेहद स्पष्ट है। यदि हलाला या किसी अन्य मजहबी रिवाजों की आड़ में नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं तो वह आपराधिक अपराध होगा।
आखिर में हाईकोर्ट ने आरोपियों की याचिका ठुकराते हुए दर्ज FIR रद्द करने से इंकार कर दिया और जांच एजेंसी को आपराधिक और पॉक्सों के प्रावधानों के तहत निष्पक्ष जांच जारी रखने की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकार सर्वोच्च हैं।
मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानून की आड़ में कुछ भी नहीं चलेगा
हर तरह से इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला स्वागत योग्य है। मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानून की आड़ में किसी भी व्यक्ति को दुष्कर्म, गैंगरेप या बाल यौन शोषण जैसे अपराधों से छूट नहीं दे सकते। यह फैसला महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा को और मजबूत करता है। भविष्य में ऐसे ही समान मामलों के लिए यह फैसला मिसाल बन सकता है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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