सुप्रीम कोर्ट पर सवाल, मई‑जून 2025 के OBC प्रमाणपत्रों की वैधता
सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई का समय निर्धारित किया, जिसमें 8 मई से 18 मई 2025 के बीच जारी OBC प्रमाणपत्रों को अमान्य घोषित करने की माँग है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी पद खाली नहीं रखे जा सकते और नियुक्तियों को विशेष अनुमति याचिका के परिणामों के अधीन किया जाएगा। यह विवाद 2025 में जारी संशोधित OBC आरक्षण नीति और हाईकोर्ट के 2024 के पूर्व निर्णय के बाद उत्पन्न हुआ।

सौजन्य से:- Hindustan
अमान्य होंगे एक साल के बीच जारी सभी OBC सर्टिफिकेट? सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला
सरकार ने मई और जून 2025 में नई अधिसूचनाएं जारी कर संशोधित ओबीसी आरक्षण नीति पेश की थी। HC ने 17 जून 2025 को इस पर रोक रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार कार्यकारी आदेशों के जरिए न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा है कि वह कलकत्ता हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करेगी। हाईकोर्ट ने कहा था कि राज्य द्वारा 8 मई, 2025 और इस साल 18 मई के बीच जारी सभी ओबीसी सर्टिफिकेट अमान्य होंगे। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य को नोटिस जारी कर याचिका पर उनका जवाब मांगा है। इसके साथ ही पीठ ने याचिका को इसी तरह के मुद्दे वाली एक अन्य लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ से आग्रह किया कि इस बीच कुछ खाली पदों पर नियुक्तियां नहीं की जानी चाहिए। पीठ ने कहा कि हम सरकारी पदों को खाली नहीं रख सकते। पीठ ने निर्देश दिया कि की गई नियुक्तियां विशेष अनुमति याचिका (एसएलएपी) के नतीजों के अधीन होंगी। सफल उम्मीदवारों को जारी किए जाने वाले नियुक्ति पत्रों में राज्य को ऐसी शर्त शामिल करनी होगी।
क्या है मामला?
यह विवाद मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद शुरू हुआ जिसमें ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार के 2010 से 2012 के बीच जारी कार्यकारी आदेशों के तहत ओबीसी सूची में कई श्रेणियों के समावेश, ओबीसी-ए और ओबीसी-बी में उप-वर्गीकरण और उनके बीच 17 प्रतिशत आरक्षण के वितरण को रद्द कर दिया गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने मई और जून 2025 में नई अधिसूचनाएं जारी कर संशोधित ओबीसी आरक्षण नीति पेश की। हाईकोर्ट ने 17 जून 2025 को यह कहते हुए रोक लगा दी कि राज्य सरकार कार्यकारी आदेशों के जरिए न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
बाद में पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट से अपनी अपीलें वापस ले ली थीं। वर्तमान याचिकाएं हाईकोर्ट के 12 अगस्त के उस आदेश के बाद दायर हुई हैं जिसमें 2025 की अधिसूचना के तहत अप्रैल 2026 में जारी ओबीसी-ए प्रमाणपत्र के आधार पर राहत मांगने वाले उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी गई थी।
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