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लंबे वैवाहिक मुकदमे महज कागजों पर शादी बनाए रखते हैं: सुप्रीम कोर्ट

लंबे वैवाहिक मुकदमे महज कागजों पर शादी बनाए रखते हैं: सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल से ज़्यादा समय से अलग रह रहे एक दंपती की शादी खत्म कर दी है. By Sumit Saxena Published : June 3, 2026 at 7:41 PM IST नई दिल्ली :…

ETV Bharat के अनुसार3 जून 2026 को 03:55 pm बजे
लंबे वैवाहिक मुकदमे महज कागजों पर शादी बनाए रखते हैं: सुप्रीम कोर्ट

सौजन्य से:- ETV Bharat

लंबे वैवाहिक मुकदमे महज कागजों पर शादी बनाए रखते हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल से ज़्यादा समय से अलग रह रहे एक दंपती की शादी खत्म कर दी है.

By Sumit Saxena

Published : June 3, 2026 at 7:41 PM IST

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल से अलग रह रहे जोड़े के बीच शादी को समाप्त करते हुए कहा है कि वैवाहिक मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने से विवाह केवल कागजों पर ही कायम रहता है.

कोर्ट ने इस बात का संज्ञान लिया कि राजस्थान हाई कोर्ट ने कई बिंदुओं पर पति के पक्ष में तलाक को मंजूरी दी थी. तलाक मंजूर करने के उपयुक्त कारणों में से एक कारण यह भी था कि पत्नी ने कई मौकों पर यौन संबंध बनाने से मना कर दिया था, जो हाई कोर्ट की नजर में पति के प्रति क्रूरता थी.

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, ‘‘भारत की अदालतों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि यौन संबंधों से दूरी बनाए रखना गंभीर भावनात्मक तनाव पैदा करता है और विवाह की बुनियाद को कमजोर करता है.’’ साथ ही पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए, हाई कोर्ट का निष्कर्ष बरकरार रखा जाता है. प्रतिवादी-पति की अपील को स्वीकार करते हुए दी गई तलाक की डिक्री (आदेश) को बरकरार रखा जाता है.’’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके कई निर्णयों में यह माना गया है कि बिना किसी उचित कारण के लगातार यौन संबंधों से मना करने सहित विभिन्न दांपत्य अधिकारों से वंचित करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आई ए) के तहत यह तलाक का एक वैध आधार है.

पीठ ने रेखांकित किया कि चिकित्सक दंपति की शादी दिसंबर 2007 में हुई थी. पत्नी गुजरात में और पति राजस्थान में सरकारी सेवा में कार्यरत हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए कहा कि इस जोड़े के बीच वैवाहिक बंधन को खत्म किया जाना उचित है क्योंकि यह स्पष्ट था कि यह बंधन पूरी तरह से टूट चुका है और इसके अब पटरी पर आने की संभावना नहीं बची है.

कोर्ट ने हाई कोर्ट के पिछले साल फरवरी में दिए गए आदेश के खिलाफ पत्नी की अपील पर दो जून को अपना निर्णय सुनाया. हाई कोर्ट ने पति की अपील मंजूर कर ली थी और तलाक की अनुमति दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह पाया कि दोनों पक्ष 15 से अधिक साल से अलग रह रहे थे और उनसे कोई संतान नहीं थी. इतना ही नहीं, कोर्टों द्वारा बार-बार किए गए प्रयासों के बाद भी कोई सुलह नहीं हुई.

पीठ ने कहा कि विवाह, अपने कानूनी और संवैधानिक आयाम में, कभी भी व्यक्तिगत अधिकारों के मात्र एक संविदात्मक मिलन तक सीमित नहीं किया जा सकता है, और न ही इसे वैवाहिक अधिकारों की याचिका के संकीर्ण दृष्टिकोण से देखा जा सकता है.

कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक अधिकार एकतरफा अस्तित्व में नहीं होते हैं और वे वैवाहिक कर्तव्यों के संरचनात्मक प्रतिरूप हैं. इसने कहा कि मानसिक क्रूरता के आरोपों का मूल्यांकन करते समय विवाह के बुनियादी पहलुओं से लगातार पीछे हटना कानूनी परिणामों का कारण बन सकता है.

इसी क्रम में पीठ ने कहा कि इस मामले में पक्षों के आचरण से यह स्पष्ट था कि सहवास की छोटी अवधि के दौरान भी वे अपनी वैवाहिक जिम्मेदारियों को निभाने में असफल रहे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘यह कोर्ट इस दृष्टिकोण के प्रति सचेत है कि कोर्टों का रुख विवाह की पवित्रता को बनाए रखने का होना चाहिए और किसी भी एक पक्ष के केवल कहने भर से तलाक देने में कोर्ट को संकोच करना चाहिए.’’

पीठ ने कहा कि इस मामले में, दंपति बहुत लंबे समय से अलग रह रहे थे और इस विवाह में कोई पवित्रता नहीं बची थी. हालांकि पत्नी द्वारा यह दावा किया गया था कि उसने गुजरात में अपनी नौकरी छोड़ दी थी और राजस्थान में रहने लगी थी, लेकिन इस दावों की पुष्टि करने के लिए रिकॉर्ड के तौर पर कोई सबूत नहीं आया है.

पीठ ने कहा, ‘‘इसके विपरीत रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत इस दलील के विपरीत हैं और इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि वह (पत्नी) अब भी गुजरात में अपनी नौकरी जारी रखे हुए है. उसके द्वारा पति के साथ रहने की किसी भी तरह की कोई मंशा प्रतीत नहीं होती है, क्योंकि कथनी और करनी में फर्क है.’’ पीठ ने पत्नी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दंपति के विवाह को खत्म कर दिया.

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