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सुप्रीम कोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला: पत्नी का करियर महत्वाकांक्षा जिम्मेदारी का हिस्सा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी का करियर महत्वाकांक्षा पति के मौन वीटो के अधीन नहीं है, और उसे पति या ससुराल वालों की उम्मीदों के आगे झुकने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

3 जुलाई 2026 को 05:26 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला: पत्नी का करियर महत्वाकांक्षा जिम्मेदारी का हिस्सा

सौजन्य से:- AajTak

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सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मंगलवार को वैवाहिक विवाद के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया. शीर्ष अदालत ने कहा कि एक योग्य महिला का अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे के लिए स्थिर वातावरण सुनिश्चित करने का निर्णय 'क्रूरता' या 'तलाक का आधार' नहीं हो सकता. साथ ही कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट और फैमिली कोर्ट के उन निष्कर्षों को खारिज कर दिया, जिनमें महिला के डेंटिस्ट करियर को 'रेग्रेसिव' और 'अल्ट्रा-कंजर्वेटिव' तरीके से देखा गया था. न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि पत्नी की पेशेवर पहचान पति के 'मौन वीटो' के अधीन नहीं है.

दरअसल, ये पूरा मामला लेफ्टिनेंट कर्नल और उनकी डेंटिस्ट पत्नी के बीच था, जिनकी शादी साल 2009 में हुई थी. शुरुआत में पत्नी पुणे में अपनी प्रैक्टिस छोड़कर पति के साथ कारगिल शिफ्ट हो गई, लेकिन बेटी के जन्म के बाद बच्ची को होने वाले दौरे (seizure episodes) के कारण उसे विशेष चिकित्सा सुविधाओं की जरूरत पड़ी तो वह बेहतर इलाज के लिए अहमदाबाद शिफ्ट हो गई. जहां उन्होंने स्थिर वातावरण में बच्ची का पालन-पोषण करने के साथ-साथ अपना डेंटल क्लिनिक भी स्थापित कर लिया. इसके बाद पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ गया और तलाक की नौबत आ गई. इस पर फैमिली कोर्ट ने महिला के काम को वैवाहिक कर्तव्य का उल्लंघन करार दिया, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था. जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह गलत करार दिया.

'हम 21वीं सदी में हैं'

सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट की इस दलील की कड़ी आलोचना की कि पत्नी का कर्तव्य है कि वह वहीं रहे, जहां उसका पति तैनात है. जस्टिस मेहता ने फैसले में लिखा कि हम 21वीं सदी में हैं, फिर भी एक महिला द्वारा सालों की मेहनत से हासिल डिग्री को बर्बाद न होने देने और अपना क्लिनिक खोलने को अदालतों ने 'क्रूरता' माना.

कोर्ट ने कहा कि महिला को पति या ससुराल वालों की उन उम्मीदों के आगे झुकने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो उसकी अपनी आकांक्षाओं को खत्म करती हों.

'व्यक्तिगत पहचान खत्म नहीं करती शादी'

पीठ ने कहा कि शादी किसी महिला की व्यक्तिगत पहचान को खत्म नहीं करती है. एक शिक्षित महिला को केवल वैवाहिक दायित्वों की सीमाओं में कैद रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती. अदालत ने जोर देकर कहा कि महिला अब केवल घर की एक 'उपांग' (appendage) नहीं है, उसकी बौद्धिक और व्यावसायिक आकांक्षाओं को सम्मान मिलना चाहिए.

कोर्ट के अनुसार, जिसे अदालतों ने 'अवज्ञा' कहा, वह वास्तव में स्वतंत्रता का दावा था और जिसे 'त्याग' कहा गया, वह पेशेवर प्रतिबद्धता और बच्चे के कल्याण का परिणाम था.

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पति की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने पत्नी पर झूठी गवाही (perjury) का मुकदमा चलाने की मांग की थी. शीर्ष अदालत ने पाया कि पति ने पुनर्विवाह कर लिया है और अब सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है. अदालत ने निचली अदालतों द्वारा महिला के चरित्र और फैसलों पर की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को ये कहते हुए हटा दिया कि ऐसी धारणाएं प्रगतिशील समाज के विकास के साथ मेल नहीं खातीं, जहां महिलाओं की गरिमा और स्वायत्तता मौलिक अधिकार हैं.

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